पुराणों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र वज्रनाभ ने अपने पूर्वजों की स्मृति में चार देव विग्रह स्थापित कराए थे। इनमें से एक दाऊजी मंदिर भी है। इस मंदिर के बारे में तमाम किंवदंतियां हैं, लेकिन अचंभित करने वाला एक किस्सा न केवल दस्तावेजों में दर्ज है, बल्कि सरकारी तौर पर आज भी इसका पालन हो रहा है। दाऊजी मंदिर को तोड़ने के लिए औरंगजेब की सेना ने कूच किया था। पर औरंगजेब की सेना को मंदिर पहुंचने से पहले ही घुटने टेकने पड़े।
इतिहास के पन्ने आज भी मथुरा में बलदेव स्थित दाऊजी मंदिर की मान्यता की गवाही दे रहे हैं। दाऊजी को ‘ब्रज का राजा’ कहा जाता है। उनका यह ऐसा मंदिर है, जहां तक पहुंचने के लिए औरंगजेब की सेना को घुटने टेकने पड़े थे। मथुरा से लगभग बीस कि.मी. दूर यह स्थान पुराणों में 'विद्रुमवन' के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम की विशाल मूर्ति तथा उनकी धर्मपत्नी रेवतीजी का विग्रह स्थापित है।
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पुराणों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र वज्रनाभ ने अपने पूर्वजों की स्मृति में चार देव विग्रह स्थापित कराए थे। इनमें से एक यह भी है, जो द्वापर युग के बाद भूमिस्थ हो गया था। बाद में मध्यकाल में इसका प्रकटीकरण हुआ, जिसके बारे में कई मत हैं। मंदिर के चारों ओर सर्प की कुंडली जैसा परिक्रमा मार्ग है। मंदिर के चार दरवाजे हैं, जिन्हें मुख्य दरवाजा, सिंहपौर, ड्योढी एवं गोशाला द्वार के नाम से जाना जाता है। पीछे की ओर ही एक विशाल कुंड है, जिसे बलभद्र कुंड कहते हैं। इस मंदिर के बारे में तमाम किंवदंतियां हैं, लेकिन अचंभित करने वाला एक किस्सा न केवल दस्तावेजों में दर्ज है, बल्कि सरकारी तौर पर आज भी इसका पालन हो रहा है। कहते हैं कि वर्ष 1668 में इस मंदिर को तोड़ने के लिए औरंगजेब की सेना ने इस तरफ कूच किया था। भारी-भरकम फौज कई दिन चलती रही। शाम होने पर पड़ाव डालती और लोगों से पूछती कि मंदिर कितनी दूर है। जवाब आता-तीन कोस। सेना सुबह फिर आगे बढ़ती, लेकिन मंदिर तीन कोस दूर ही बताया जाता।
कई दिनों तक यही क्रम चला। इसी दौरान अचानक फौज पर मधमुक्खियों और ततैयों ने हमला बोल दिया, जिसमें सैनिक और घोड़े बुरी तरह से हताहत हो गए। वे आगे बढ़ने लायक ही नहीं बचे। आखिरकार औरंगजेब ने घुटने टेक दिए। उसने दाऊजी से माफी मांगी और शाही फरमान जारी किया कि मंदिर को पांच गांव का मालिकाना हक दिया जाता है। बाद में औरंगजेब के नाती शाह आलम ने इस फरमान में ढाई गांव और बढ़ा दिए। नूरपुर, चौथाई, खड़ेरा, छबरऊ, अरतौनी इन पांच गांवों के अलावा बलरामपुर, रीढ़ा के साथ खड़ेरा और पीपरी के बीच का आधा गांव भी शामिल किया गया। शाह ने इस बाबत चैत्र 3 संवत 1840 को अपनी मुहर एवं हस्ताक्षर से आदेश जारी किया। बाद में इस क्षेत्र पर सिंधिया राजवंश का अधिकार हुआ। उन्होंने भी इस पर अमल जारी रखा और आज भी साढ़े सात गांवों की मालगुजारी की 32 हजार रुपये की ग्रांट हर वर्ष दाऊजी को दी जाती है। इसे देवालय सरदेही टैक्स कहा जाता था। इससे दाऊजी के लिए माखन-मिश्री की व्यवस्था होती है एवं यहां काम करने वालों का मेहनताना दिया जाता है। माना जाता है कि यहां का विग्रह ब्रज क्षेत्र के सबसे पुरातन विग्रहों में शामिल है।