डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
2019 में भारत ने आधिकारिक तौर पर प्रत्यर्पण की मांग की, जिसे अमेरिका की अदालतों में कड़े तर्कों और साक्ष्यों के आधार पर प्रस्तुत किया गया। राणा की टीम ने "डबल जोपर्डी" (एक ही अपराध के लिए दो बार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता) का तर्क देकर बचने की कोशिश की, लेकिन भारत सरकार के मजबूत पक्ष ने उस दलील को खारिज कर दिया। अंततः अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने भारत के पक्ष में अपना फैसला दिया।
14 वर्षों की प्रतीक्षा, सैकड़ों बेगुनाहों की कुर्बानी और न्याय के लिए लगातार प्रयास, अंततः 26/11 मुंबई हमलों के एक प्रमुख साजिशकर्ता तहव्वुर हुसैन राणा को अमेरिका से भारत प्रत्यर्पित कर लाया गया। यह केवल एक आतंकवादी की गिरफ्तारी नहीं है, बल्कि यह उस संकल्प की जीत है जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में "आतंक के विरुद्ध जीरो टोलरेंस" की नीति का प्रतिबिंब है।
यह प्रत्यर्पण केवल राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों की सफलता नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक कूटनीतिक ताकत का भी परिचायक है। अमेरिका की जेलों और अदालतों में राणा ने वर्षों तक प्रत्यर्पण का विरोध किया, लेकिन मोदी सरकार के सतत प्रयासों, विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय और एनआईए की सक्रिय भूमिका के चलते आज वह भारत की धरती पर न्याय के कठघरे में खड़ा है।
जब 26/11 जैसा जघन्य हमला हुआ था, तब भारत की सेना कार्रवाई के लिए तैयार थी। उस समय के एयर फोर्स प्रमुख एयर चीफ मार्शल फली होमी मेजर ने स्वयं कहा था कि भारत ने 9/11 की तरह जवाब देने की योजना बनाई थी। सेना तैयार थी, संसाधन थे, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं थी। उस समय की सरकार ने कार्रवाई के आदेश नहीं दिए। आज जब भारत की सेना सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक जैसे निर्णायक कदम उठा रही है। यह इस अंतर का प्रमाण है कि राजनीति में नेतृत्व अगर निर्णायक हो तो राष्ट्रीय सुरक्षा भी निर्णायक होती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
पिछले 5 वर्षों में मोदी सरकार ने 23 अपराधियों और आतंकियों का सफलतापूर्वक प्रत्यर्पण कराया है। इनमें कई बड़े आर्थिक अपराधी, आतंकी और भगोड़े शामिल हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत अब केवल शब्दों में नहीं, कर्मों से आतंक के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ रहा है। राणा की गिरफ्तारी केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, यह उन सैकड़ों परिवारों को भी आश्वस्त करती है जिन्होंने 26/11 में अपनों को खोया। 2008 के उस काले दिन में 166 निर्दोष नागरिक मारे गए थे, जिनमें 6 अमेरिकी भी शामिल थे। तहव्वुर राणा न केवल इन हमलों की साजिश में शामिल था, बल्कि डेविड हेडली को भारत भेजने, उसे वीजा दिलाने और ताज होटल जैसे लक्ष्यों की रेकी में मदद करने में भी उसकी अहम भूमिका थी।
अब जब राणा भारत की न्यायिक प्रक्रिया में है, तो देशवासियों की निगाहें डेविड कोलमैन हेडली की ओर भी हैं। भारत सरकार ने पहले ही संकेत दिया है कि हेडली के प्रत्यर्पण के लिए भी प्रयास जारी हैं। यह एक लंबा और जटिल प्रक्रिया है, लेकिन जिस तरह से तहव्वुर राणा को भारत लाया गया, उससे यह उम्मीद बनती है कि हेडली को भी न्याय के कठघरे में खड़ा किया जाएगा।
तहव्वुर राणा का प्रत्यर्पण सिर्फ एक कार्रवाई नहीं, यह भारत की सुरक्षा नीति की परिपक्वता और मोदी सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम है। जो काम कांग्रेस सरकार ने नहीं किया, वह काम मोदी सरकार ने करके दिखाया। यह उन आलोचकों के लिए भी करारा जवाब है जो कहते हैं कि "सरकार सिर्फ बातें करती है, काम नहीं।" आज भारत आतंकवाद को लेकर दुनिया को स्पष्ट संदेश दे रहा है, चाहे जितना भी वक्त लगे, लेकिन दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा।