nathuram godse and mahatma gandhi
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तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के गांधी विचार विभाग से महात्मा गांधी के सामाजिक योगदान पर शोध कर चुके डॉ. सत्यम कहते हैं कि आजादी के बाद देश के विभाजन के लिए नाथूराम गांधीजी को जिम्मेदार मानता था। गोडसे को लगता था कि गांधीजी ने ब्रिटिश आलाकमान, मुसलमानों के बीच अपनी अहिंसा और शांति वाली छवि बनाने के चक्कर में देश का बंटवारा होने दिया।
गोडसे का मानना था कि तत्कालीन सरकार महात्मा गांधी के दबाव में मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ऐसा कर रही है। गोडसे इस बात पर भी तनाव में था कि कश्मीर समस्या के बावजूद मोहम्मद जिन्ना ने गांधीजी के पाकिस्तान दौरे की सहमति दी है। गांधीजी का मुस्लिमों के प्रति दया भाव से वह नफरत करता था। उसका मानना था कि गांधीजी को हिंदुओं की भावनाओं की परवाह नहीं है।
गोडसे ने खुद गांधीजी के बारे में कहा था कि वह एक साधु हो सकते हैं लेकिन एक अच्छे राजनीतिज्ञ नहीं है। गौतम बताते हैं कि गांधीजी की हत्या के पीछे एक तर्क पाकिस्तान को दिए जाने वाले सरकारी कोष के संबंध में भी दिया जाता है। कांग्रेस पाकिस्तान को वादे के बावजूद 55 करोड़ रुपये नहीं देना चाहती थी, जबकि गांधीजी ने पाकिस्तान को पैसे देने के लिए आमरण अनशन करने की भी बात कही थी। गोडसे को लगता था कि गांधीजी मुस्लिमों के लिए ऐसा कर रहे हैं।
महात्मा गांधी की हत्या के बाद गोडसे को गिरफ्तार कर उस पर मुकदमा चलाया गया। पंजाब हाई कोर्ट में 8 नवंबर, 1949 को उसका ट्रायल हुआ और 15 नवंबर, 1949 को उसे अंबाला जेल में फांसी की सजा दी गई।
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