वैवाहिक बलात्कार को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 में बलात्कार की श्रेणी में रखा जाए न कि 377 के तहत प्राकृतिक यौन संबंध की श्रेणी में।
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भारत में स्थिति और कानून
भारत में इस कानून पर पुनर्विचार किया गया। न्यायमूर्ति जे.एस.वर्मा ने भी निर्भया बलात्कार के बाद कानून में संशोधन के लिए तैयार रिपोर्ट में वैवाहिक बलात्कार को अपराध माने जाने की सिफारिश की। वैवाहिक बलात्कार पर न्यायालय में भी वकील इंदिरा जयसिंह ने रिपोर्ट पेश की।
“वैवाहिक बलात्कार को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 में बलात्कार की श्रेणी में रखा जाए न कि 377 के तहत प्राकृतिक यौन संबंध की श्रेणी में। उन्होंने अपील की, कि पति द्वारा पत्नी के साथ बलात्कार के लिए कठोर से कठोर सजा का भी प्रावधान किया जाए।”
भारत में इस पर बहस के बावजूद 2013 अपराधिक संशोधन अधिनियम में शामिल नहीं किया गया। इस संशोधन से पूर्व तक बिना सहमति के किसी महिला के साथ यौन संबंध स्थापित करना बलात्कार की श्रेणी में आता था। मगर उसमें भी विरोधाभास था कि 15 साल से अधिक उम्र की अपनी पत्नी के साथ जबरदस्ती किया गया यौन संबंध बलात्कार नहीं माना जाता है।
हाल ही में महिला एवं बाल विकास मंत्री ने मेनका गांधी के वैवाहिक बलात्कार को कानूनन अपराध ठहराए जाने की संभावना से इंकार किया है।
उन्होंने कहा-
''दुनियाभर में वैवाहिक बलात्कार को जैसे समझा जाता है, उस तरह से भारत में नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे शिक्षा का स्तर, निरक्षरता, गरीबी, सामाजिक संस्कार, धार्मिक विश्वास और विवाह को एक धार्मिक संस्कार मानना आदि प्रमुख कारण हैं।''
मेनका गांधी का यह बयान पुनः निर्भया कांड के बाद वैवाहिक बलात्कार के मुद्दे को उठाता है। गायत्री आर्य अपने लेख वैवाहिक बलात्कार विमर्श की जरूरत में सेक्सोलॉजिस्ट प्रकाश कोठारी के कथन को उठाती हैं।
“सेक्सोलॉजिस्ट प्रकाश कोठारी का कथन बेहद प्रासंगिक है कि ‘ज्यादातर भारतीय मर्द अपनी पत्नियों को स्लीपिंग पिल की तरह इस्तेमाल करते हैं!’(लड़कों/ पुरुषों की नई पीढ़ी में अपवादों की संख्या बढ़ रही है ।) लेकिन अभी भी उस सोच के पति ही ज्यादा हैं, जिनका मानना है कि पत्नी आजीवन उनकी ख़ुशी, सुख-सुविधा और जरूरत का ध्यान रखने वाली एक सहायिका भर है”। इस तरह वैवाहिक बलात्कार पर आज बहस की बहुत आवश्यकता है ।
भारतीय दंड सहिता की धारा-376 के अनुसार किसी महिला के साथ बलात्कार करने वाले को आजीवन कारावास की सजा दी जा सकती थी। लेकिन यदि 12 से 15 साल की अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करता तो अधिकतम सजा में ‘विशेष छूट’ थी, यानि सिर्फ दो साल की जेल या जुर्माना या दोनों भी हो सकती थी। यहां बलात्कार गैर जमानती अपराध था परंतु वही वैवाहिक बलात्कार अर्थात पत्नी के साथ बलात्कार में जमानत थी।
अरविंद जैन लिखते हैं-
“पिछले दिनों दिल्ली की एक अदालत का फैसला चर्चा में रहा, जिसमें कहा गया था कि अपनी पत्नी से जबरन यौन संबंध बलात्कार का अपराध नहीं है।”
2013 में लागू आपराधिक संशोधन अधिनियम में इस मानसिकता का पुख्ता रूप सामने आया। इस संशोधन अधिनियम के तहत सहमति से संबंध बनाने की उम्र 16 साल से बढ़ा कर 18 कर दी गई। धारा 375 में एक बदलाव लाया गया और वह था 15 साल से कम उम्र की पत्नी से बलात्कार के मामले में अब सज़ा का प्रावधान खत्म कर दिया गया।
अब पति को पत्नी से संबंध बनाने की छूट मिल गई । वैवाहिक बलात्कार कानून के प्रति राज्य और सरकार की नीति से उसकी पितृसत्तात्मक मानसिकता को समझा जा सकता है, जिसने वैवाहिक बलात्कार संबंधी न विधि आयोग की रिपोर्ट को माना न वर्मा कमेटी की सिफारिशों को ।
वैवाहिक बलात्कार पर बहस के दौरान बहुत से विचार सामने आए। एक विचार भारत के गृह राज्यमंत्री हरिभाई परथीभाई चौधरी का था। हरिभाई परथीभाई चौधरी कहते हैं-
“विदेश की तरह भारत के परिप्रेक्ष्य में शादी में रेप की अवधारणा को लागू नहीं किया जा सकता, ऐसा नहीं करने के अनेक कारण हो सकते है जैसे कि शिक्षा का स्तर, अशिक्षा, गरीबी, सामाजिक रीति–रिवाज, लोगों की शादी को पवित्र मानने वाली सोच है”। भारतीय परंपरा और संस्कृति में विवाह का संबंध धर्म आस्था और मूल्यों से है और वैवाहिक बलात्कार का कानून उस मूल्य को चोट पहुंचाता है।
शादी के बाद तो कानून ही पति को ये हक देता है कि वो पत्नी के साथ सेक्स कर सके।
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इसी कारण भारतीय कानून में बलात्कार कानून की समीक्षा के दौरान 172 वी रिपोर्ट में “भारतीय पीनल कोड की धारा 375 को बदल कर शादी में होने वाले रेप को आपराधिक बताने की सिफारिश नहीं की थी”।
वैवाहिक बलात्कार पर बहस के दौरान आम लोगों की मानसिकता भी उभरकर सामने आती है। जैसा कि बी.बी.सी. की ‘बलात्कार की शिकायत भी जिन्हें चुभती है’ रिपोर्ट में सामने आती हैं । आखिर ‘विवाह’ का क्या संदर्भ है और क्यों वैवाहिक बलात्कार कानून का विरोध हो रहा है, जैसा कि ‘शंभू सारान कहते हैं शादी का मतलब ही है यौन संतुष्टि’।
शादी के बाद तो कानून ही पति को ये हक देता है कि वो पत्नी के साथ सेक्स कर सके। या फिर ‘गंगाराम जांगिड़ की ये बात कि शादी सिर्फ सेक्स के लिए की जाती है, अगर सेक्स नहीं तो शादी क्यों’। यह सोच विवाह संस्था पर बहस की गुंजाइश को पैदा करती है। ऐसी ही कितनी सोच व उसे सोचने वाले हमारे आसपास मौजूद है। लेकिन हम उन पक्षों में सुधार की अपेक्षा कानून के नकारात्मक पक्ष को अधिक मजबूती से पकड़ लेते हैं। यही कारण है कि यह कानून आज भी बहस के केंद्र में हैं।
वैवाहिक बलात्कार की बढ़ती घटनाएं
वैवाहिक बलात्कार की बढ़ती घटनाओं ने भी महिला आंदोलन में इस सवाल को केंद्रीयता दी। वैवाहिक संबंधों के दौरान यह संबंध अधिकार और शक्ति के रूप में क्यों बदल जाते हैं? क्यों जब भी महिलाएं इस की शिकायत करती हैं तो उन्हें परिवार, मूल्यों और वैवाहिक संस्था को बचाने का उत्तराधिकारी बना दिया जाता है या परिवार संस्था के नाम पर चुप करा दिया जाता है। अन्यथा उन्हें बुरी औरत कहकर समाज में अपमानित किया जाता है।
यह आंदोलन जेंडर के स्तर पर महिला और पुरुष की मानसिकता को समझने पर ज़ोर देता है। आखिर क्यों पुरुषों के लिए विवाह यौन संबंधों की कानूनी स्वीकृति मात्र है। जैसा कि न्यायालय में पत्नी द्वारा संबंध न बनाने के अधिकार पर पति को तलाक लेने का पूरा अधिकार देता है। लेकिन जबरन बनाए गए संबंधों पर परिवार संस्था के नाम पर चुप्पी साध लेता है। वह स्त्री के आत्मसम्मान को परिवार व मूल्यों की कसौटी पर तौलता है और उन्हें अनदेखा कर देता है।
यह वास्तविकता है कि कानून को देखने के दो नजरिए होते हैं एक उन्हें अपने पक्ष में गलत तरीके से इस्तेमाल करता है तो एक शोषण की स्थिति में उस कानून तक पहुँच पाता है। हमारे देश में अक्सर मीडिया के बड़े प्लेटफोर्म से लेकर छोटे सोशल मीडिया के प्लेटफोर्म व व्यवहारिक से लेकर वैचारिक स्तर महिलाओं की सुरक्षा से संबंधित कानूनों के सामाजिक पक्ष पर बहस होती है।
इसमें कानून के उपयोग और दुरूपयोग संबंधित पक्षों पर चर्चा होती है। लेकिन उपयोग व उसके सकारात्मक पहलू चर्चा के विषय कम ही बन पाते हैं और बहस कुछ दुरूपयोग की घटनाओं तक केंद्रित होकर अपना मूल औचित्य खो देती है।
मीडिया की एक पक्षीय दृष्टि से समाज भी सकारात्मक व्यवहार नहीं अपनाता है और कानून पुनः बहस के बाद ठंडे बस्ते में समा जाता है। दबाव की यह स्थितियां न्यायिक व्यवस्था को प्रभावित करती है और न्यायालय यह मानता है कि यह स्थिति पति को मानसिक और भावनात्मक ठेस पहुंचाती है। यहां पत्नी की भावनाओं और उसकी मनः स्थिति को नजरअंदाज किया गया। जेंडर के स्तर पर इस विषय पर अधिक बहस की आवश्यकता है।
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