मणिपुरी होली, कार्यक्रम का एक दृश्य
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राधा-कृष्ण संग मनाई जाती है होली
चैत्र माह के प्रथम छह दिनों तक मणिपुर की घाटियों में ढोलक के थापों की आवाज गूंजती रहती है। वैष्णव धर्म के प्रभाव के कारण मंदिरों में जाकर भजन गाना अनिवार्य है। लोग सफेद धोती और पीली कमीज पहनकर कृष्ण मंदिर में जमा होते हैं और भजन गाते हैं। उस दौरान वे एक-दूसरे को जमकर गुलाल लगाते हैं और मदमस्त होकर वापस लौटते हैं। अंतिम दिन कृष्ण मंदिर से शोभायात्रा निकलती है।
मणिपुर की मैतेई जनजाति के लोग कृष्ण के भक्त हैं। उन पर मथुरा और वृंदावन का गहरा प्रभाव है। इसलिए वे राधा और कृष्ण के साथ होली खेलने में विश्वास करते हैं। इस मौके पर तरह-तरह के खेलों का आयोजन किया जाता है। जिसमें मल्लयुद्ध, मार्शल आर्ट, दौड़ प्रतियोगिता शामिल हैं। इसके लिए उम्र की कोई बाधा नहीं होती है। बूढ़े-बुजुर्ग भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
असम में भी पारंपरिक ढंग से होली मनाने की परंपरा रही है। यहां पर लोग इसे ‘डोल यात्रा’ के नाम से मनाते हैं। यह फाल्गुन पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। कृष्ण के उपासक श्रीमंत शंकर देव ने नाम घरों की स्थापना की थी और डोल यात्रा का आरंभ वहीं से हुआ। राज्य सरकार दो दिनों का सार्वजनिक अवकाश देती है। इसमें गुलाल का प्रयोग ही होता था, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में उत्तर भारत के रंग खेलने का प्रभाव देखकर यहां भी अब रंग का प्रयोग होने लगा है।
असम में होली के दूसरे दिन कीचड़ की होली होती है। असम के बरपेटा सत्र की होली विशेष रूप से उल्लेखनीय है। बरपेटा सत्र की होली कई दिनों तक चलती है। वहां की सामूहिक होली में हजारों लोग भाग लेते हैं। लोग फगुवा गाने की बजाय संकीर्तन गाते हैं, जिसमें राधा-कृष्ण से जुड़े होली के गीत गाए जाते हैं।
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