अंडमान और निकोबार के मैंग्रोव
- फोटो : Vyacheslav Argenberg
डॉ. प्रभाकरण के अनुसार-
2004 की सुनामी के बाद अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में मैंग्रोव वनों में भारी गिरावट देखी गई थी। अपनी प्राकृतिक पुनर्जीवित होने की क्षमता के कारण, कई स्थानों पर मैंग्रोव ने स्वयं को फिर से स्थापित कर लिया है। वन विभाग द्वारा किए गए वृक्षारोपण अभियानों ने भी कुछ क्षेत्रों में मैंग्रोव के सफल पुनर्स्थापन में योगदान दिया है।
हालांकि, प्राकृतिक पुनर्जीवन क्षमता और वन विभाग के प्रयासों के बावजूद, कई कारण ऐसे हैं जिन्होंने मैंग्रोव के अस्तित्व को और अधिक बाधित, एवं उसके सीमित पुनर्जीवन में योगदान दिया है। विशेष रूप से, आक्रामक प्रजाति ‘स्पॉटेड डियर’ (चित्तीदार हिरण) द्वारा चराई ने मैंग्रोव के प्राकृतिक पुनर्जीवन को गंभीर रूप से बाधित किया है, खासकर राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों जैसे संरक्षित क्षेत्रों में।
इसके अतिरिक्त, दक्षिण अंडमान के कुछ हिस्सों में भूमि पुनर्ग्रहण (land reclamation) ने भी मैंग्रोव के पुनर्जीवन को सीमित कर दिया है। इसलिए, अंडमान द्वीपों में स्पॉटेड डियर की आबादी को नियंत्रित करना और तटीय क्षेत्रों को नियंत्रित करने वाले उपलब्ध कानूनों और नीतियों का कड़ाई से पालन करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में मैंग्रोव का प्राकृतिक पुनर्जीवन सुचारू रूप से हो सके।”
मैंग्रोव क्षेत्र का संरक्षण जरूरी
इन परिस्थितियों में, संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाना समय की मांग है। स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना, संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण कार्यों पर सख्त निगरानी और प्रभावी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) लागू करना ज़रूरी है। साथ ही प्राकृतिक पुनर्जनन कार्यक्रमों के माध्यम से नष्ट हुए मैंग्रोव क्षेत्रों में पुनः पौधारोपण किया जाना चाहिए।
तटीय क्षेत्रों में समुद्री कचरे की सफाई, प्लास्टिक-मुक्त अभियान और उपग्रह मॉनिटरिंग से भी स्थिति में सुधार लाया जा सकता है।
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