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जन्मदिन विशेष: मलयालम सिनेमा के शानदार अभिनेता हैं मम्मूट्टि, हर भूमिका में उतरे खरे

सार

मम्मूट्टि ने मलयालम के अलावा तमिल, तेलगु, इंग्लिश में भी काम किया है। मम्मूट्टि और उनकी फ़िल्मी भूमिकाओं पर किताब लिखी जा सकती है। स्वयं उनका मानना है अभी उन्हें बहुत दूर जाना है, उनका स्वप्न बड़ा है और जुनून बहुत गहरा।
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मलयालम फ़िल्मों के अभिनेता है मम्मूट्टि - फोटो : Instagram
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विस्तार
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हमारे देश में कई ऐसे दिग्गज कलाकार हैं जो विश्व सिनेमा के किसी भी श्रेष्ठ अभिनेता से कम नहीं हैं। ऐसे ही एक अभिनेता हैं- मम्मूट्टि। मलयालम फ़िल्मों के इस अभिनेता का जन्म केरल के त्रावणकोर में 7 सितम्बर 1951 को हुआ था। मम्मूट्टि खेतिहर पनपरम्बिल इस्माइल तथा फ़ातिमा के घर पैदा हुए। कई सालों के इंतजार के बाद पैदा हुए मम्मूट्टि का पूरा नाम पी. आई. (पनपरम्बिल इस्माइल) मोहम्मद कुट्टी है।

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मां के लिए आज भी वे मम्मून्ज हैं, नजदीकी लोग प्यार से उन्हें मम्मुक्का पुकारते हैं। मां अपने लाड़ले बेटे की हर फ़िल्म अवश्य देखती हैं। जैसा कि अक्सर होता है पिता की इच्छा थी कि बेटा पढ़-लिख कर डॉक्टर बने, बेटे ने एरणाकुलम लॉ कॉलेज से वकालत की पढ़ाई की, वकालत की प्रेक्टिस भी की और उसे छोड़कर बन बैठा नंबर वन अभिनेता।

अभिनय में उनकी बचपन से रुचि थी। पहली फ़िल्म दिखाने पिता ले गए थे, जल्द ही अपने छोटे भाइयों के साथ फ़िल्म देखने जाने लगे। जो फ़िल्म देखकर आते, अभिनय के साथ उसकी कहानी घर में मां-बहनों तथा अन्य सदस्यों को सुनाते, हालांकि परिवार का दूर-दूर तक अभिनय या फ़िल्म से नाता न था। मम्मूट्टि को कोई आभास न था कि वे सिनेमा में इस ऊंचाई तक पहुंचेंगे।
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आश्चर्य नहीं कि महत्वाकांक्षी मम्मूट्टि को सर्वोत्तम अभिनेता के तीन नेशनल अवॉर्ड प्राप्त हो चुके हैं। दो ऑनरेरी डॉक्ट्रेट की पदवियां भी मिल चुकी हैं। उन्हें खुद भी पहले अपने भीतर की इस आग और जुनून का कुछ पता नहीं था। अब उनका बेटा दुल्कर रहमान न केवल फ़िल्मों में प्रवेश कर चुका है वरन खूबसूरत दुल्कर अभिनय के क्षेत्र में नई धड़कन है। 
 

मम्मूट्टि को जिन लोगों ने फ़िल्म जगत में स्थापित होने में सहायता दी है, वे उन्हें भूले नहीं हैं। उनकी पहली दो फ़िल्मों– ‘अनुभवंगल पालिच्चकल’ (के. एस. सेतुमाधवन) तथा ‘कलाचक्रम’ (के. नायारणन) में उनका नाम नहीं आया था। नाम 1979 में बनी फ़िल्म ‘देवलोकम’ में भी नहीं आया, एम. टी. वासुदेवन नायर (एम.टी.) द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म रिलीज नहीं हुई। फ़िर भी वे एम. टी. वासुदेवन नायर तथा के. जी. जॉर्ज को अपना मेन्टोर मानते हैं।


एम. टी. वासुदेवन नायर ने उन्हें खोज निकाला और के. जी. जॉर्ज ने उन्हें आगे बढ़ाया। एम.टी. लिखित, एम. आज़ाद निर्देशित फ़िल्म ‘विल्कानुन्डु स्वप्नंगल’ से मम्मूट्टि की पहचान बनी। के. जी. जॉर्ज की ‘मेला’ फ़िल्म में वे सर्कस कलाकार बने। 1981 में ‘तृष्णा’ (आई. वी. शशि) सुपरहिट साबित हुई जिसके वे नायक हैं।

मम्मूट्टि और शशि की जोड़ी ने कई हिट फ़िल्में दीं। मम्मूट्टि की सैंकड़ों फ़िल्मों के नाम गिनाना संभव नहीं है। कुछ फ़िल्में जो मैंने देखी हैं, उनकी बात यहां करती हूं। उसके पहले मम्मूट्टि का एक और रूप।


समाज को लेकर संवेदनशील हैं मम्मूट्टि

मम्मूट्टि एक बेहतरीन इंसान हैं। कहते हैं, उनका इरादा सदा नेक रहा है, स्वयं को एक आम इंसान मानते और कहते हैं, वे भी कभी-कभी जिंदगी तथा फ़िल्मों में गलतियां करते हैं। समाज को प्रमुखता देते हैं और मानते हैं कि एक अभिनेता समाज के लिए बहुत कुछ कर सकता है, वह लोगों का रवैया, जीवनशैली तक परिवर्तित कर सकता है।

सामाजिक जिम्मेदारी के तहत वे कई कार्यों से जुड़े हुए हैं, चैरिटेबल संस्था ‘पेन एंड पालिएटिव केयर सोसायटी’ के संरक्षक हैं। संस्था कैंसर पीड़ित लोगों की सहायता का कार्य करती है। वे स्वयं को भाग्यशाली मानते हैं क्योंकि उनके हर संघर्ष में उनका परिवार उनके साथ खड़ा रहा है।

उन्होंने विश्व प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन की कई फ़िल्मों जैसे ‘अनंतरम’, ‘माटिलुकल’, ‘विधेयन’ आदि में काम किया है। ‘माटिलुकल’ (दीवारें) मलयालम के प्रसिद्ध रचनाकार वाई एम बशीर के काम पर आधारित है, इस फ़िल्म में प्रमुख भूमिका के लिए मम्मूट्टि को सर्वोत्तम अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। दूसरी बार यह सम्मान उन्हें ‘विधेयन के लिए मिला, इस फ़िल्म में उनके साथ तन्वी आज़मी भी हैं। तीसरी बार यह उन्हें जब्बार पटेल की फ़िल्म ‘डॉक्टर बाबा साहब अम्बेडकर’ में अम्बेडकर की भूमिका के लिए मिला।

इसके अलावा उन्हें राज्य स्तर पर कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। ‘कथा परयुम्बोल’ का हिन्दी संस्करण ‘बिल्लु बारबर’ तो आपने देखा ही होगा, बस शाहरुख खान के स्थान पर एम मोहन की इस मूल फ़िल्म में मम्मूट्टि को रख दें।

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मम्मूट्टि को गंभीर भूमिका में देखना एक भिन्न अनुभव है - फोटो : Instagram
 

हास्य और गंभीर दोनों भूमिकाओं में खतरे उतरते हैं-

फ़िल्मी जीवन में उतार-चढ़ाव के बावजूद मम्मूट्टि की कुछ भूमिकाएं सदैव याद की जाएंगी। जिस सहजता से वह हास्य भूमिकाएं करते हैं उसी कुशलता से वे गंभीर भूमिकाएं भी कर सकते हैं। ब्राह्मण की भूमिका कर सकते हैं तो पुलिस की वर्दी में भी जंचते हैं। ‘एऴकिय रावणन’  में उनका काम काफ़ी कठिन था, यहां उन्हें गंभीर रहना था साथ ही हास्य उत्पन्न करना था।

‘कोट्टयम कुंजाचन’, ‘राजधि राजा’, ‘नंदी वींदम वारीका’, ‘अंकल मनु’, ‘कुट्टेतन’ कुछ ऐसी ही फ़िल्में हैं जहाँ उन्होंने हास्य भूमिकाएं की हैं। हंसते-हंसते पेट में बल पड़ जाने की बात आती है तो मम्मूट्टि की ‘राजमाणिकम’ देखनी चाहिए। ट्रिवेंद्रम बोली बोलने वाले बेल्लारी राजा (मम्मूट्टि) ने लोगों को पागल कर दिया था। ‘तुरुप्प गुलाम’ और ‘प्रांचिएट्टन एंड द सेंट’ को जब दर्शक याद करता है तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। इसी तरह ‘कामत एंड कामत’ में उनकी मुद्रा और पार्श्व संगीत मिलकर जो कॉमेडी उत्पन्न करते हैं, वह लाजवाब है।
 
मम्मूट्टि को गंभीर भूमिका में देखना एक भिन्न अनुभव है। उन्हें सीबीआई ऑफ़ीसर की भूमिकाओं में देखें। ‘उरु सीबीआई डायरी कुरिप्पु’ की सफ़लता से प्रेरित होकर ‘जगराता’, ‘सेतुराम अय्यर सीबीआई’, ‘नेरियन सीबीआई’ तथा इसी साल आई ‘सीबीआई 5: द ब्रेन’ फ़िल्म बनीं। बुद्धिमान ऑफ़ीसर सेतुराम अय्यर नम्र मगर जरूरत पर कठोर है। महाभारत से साम्य रखती मलयालम के प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक साजी कैलास की फ़िल्म ‘वलीएट्टन’ जिसे कन्नड भाषा में सुरेश कृष्णा ने ‘ज्येष्ठ’ नाम से बनाया उनकी एक अन्य फ़िल्म है।

उनके अभिनय का चरम छ: पुरस्कार पाने वाली फ़िल्म ‘ओरु वडक्कन वीरगाथा’ में नजर आता है। एम. टी. की कहानी (कहानी में ऐतिहासिक खलनायक चरित्र को नायक बनाया गया है) पर टी हरिहरन निर्देशित इस ऐतिहासिक ड्रामा फ़िल्म में चंदु तथा उनियारच (माधवी) की कहानी के विषय में समीक्षकों का कहना है कि इसे विश्व की सर्वोत्तम फ़िल्म में शामिल किया जाना चाहिए। अगर आज चंदु खुद आ जाए तो मम्मूट्टि को अपनी भूमिका में देख कर गर्व से भर उठे। इस फ़िल्म का ‘कलरी दृश्य’ अविस्मरणीय है।

मम्मूट्टि ने मलयालम के अलावा तमिल, तेलगु, इंग्लिश में भी काम किया है। मम्मूट्टि और उनकी फ़िल्मी भूमिकाओं पर किताब लिखी जा सकती है। स्वयं उनका मानना है अभी उन्हें बहुत दूर जाना है, उनका स्वप्न बड़ा है और जुनून बहुत गहरा। उनका स्वप्न साकार हो यही कामना है।


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