मालेगांव बम विस्फोट मामला
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मालेगांव बम विस्फोट की जांच में जो सबसे बड़ा सत्य शुरू में सामने आया था, वह कांग्रेस और उसके समर्थकों द्वारा जानबूझकर दफन कर दिया गया। सबसे पहली गिरफ्तारी सिमी के आतंकवादियों की हुई थी, और उन आतंकियों ने अपने बयान में मालेगांव बम धमाकों में संलिप्तता स्वीकार भी की थी। इतना ही नहीं, जिन स्थानों पर विस्फोटक तैयार किए गए थे, वहां की सॉइल टेस्टिंग और फॉरेंसिक रिपोर्ट्स में भी यह सिद्ध हो गया था कि उसी जगह विस्फोटक सामग्री को असेम्बल किया गया था।
फिर भी, इस वैज्ञानिक और स्वीकारोक्ति आधारित साक्ष्य को एक साजिश के तहत मिटा दिया गया और इसकी जगह एक वैकल्पिक, मनगढ़ंत कथा गढ़ी गई, जिसमें साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित, रमेश उपाध्याय और सुधाकर चतुर्वेदी आदि के नाम शामिल कर दिए गए। यह केवल जांच में चूक नहीं थी, यह योजनाबद्ध वैचारिक अपराध था।
ठीक यही पैटर्न समझौता एक्सप्रेस बम कांड में भी देखने को मिला। लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी सफदर नागोरी ने अपने नार्को एनालिसिस टेस्ट में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि समझौता एक्सप्रेस धमाका पाकिस्तान प्रायोजित इस्लामिक आतंकवाद का हिस्सा था। लेकिन इस नार्को स्टेटमेंट को जांच एजेंसियों ने दबा दिया और स्वामी असीमानंद को गिरफ्तार कर हिंदू आतंकवाद की नई स्क्रिप्ट लिख दी गई। इन दोनों मामलों में पैटर्न एक जैसा था।
पहले इस्लामिक आतंकवादियों की गिरफ्तारी, फिर वैज्ञानिक व स्वीकारोक्ति-आधारित साक्ष्य, फिर राजनीतिक दखल और फिर हिंदू प्रतीकों को आरोपी बनाने की कोशिश। यह सिद्ध करता है कि कांग्रेस का उद्देश्य सच्चाई खोजना नहीं, ‘हिंदू आतंकवाद’ का झूठा नैरेटिव गढ़ना था। ये घटनाएं यह प्रमाणित करती हैं कि कांग्रेस ने सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए आतंकवाद जैसे गंभीर विषय पर सांप्रदायिक विभाजन का बीज बोना था।
राष्ट्र निर्माण समर्पित संगठनों को बदनाम करने की साजिश
फैसला आने के बाद जांच में शामिल रहे अधिकारी महबूब मुजावर के खुलासों ने अधिक स्पष्टता से बताया कि कांग्रेस का एकमात्र उद्देश्य इस हमले की आड़ में सनातन, हिंदू और राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित संगठनों को बदनाम करना था क्योंकि यही संगठन उसके वोटबैंक तुष्टिकरण के एजेंडे के आड़े आ रहे थे। महबूब मुजावर ने स्पष्ट रूप से कहा कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जांच एजेंसियों पर दबाव बनाया कि आरएसएस प्रमुख श्री मोहन भागवत को इस केस में फंसाया जाए। यह बयान दिखाता है कि कांग्रेस अपने षड्यंत्र को सफल बनाने के लिए सिर्फ झूठे बयान देने तक ही नहीं बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ने तक नीचे गिर गई थी।
कांग्रेस की राजनीति हमेशा से वोटबैंक के इर्द-गिर्द घूमती रही है। वह रामसेतु को काल्पनिक कहती है, श्रीराम के अस्तित्व पर सवाल उठाती है, कांवड़ियों को गुंडा कहती है और भगवा वस्त्रधारियों को आतंकी बताती है। साध्वी प्रज्ञा जैसी सन्यासी को बिना सबूत जेल में डाल दिया गया। कर्नल पुरोहित जैसे सम्मानित सैन्य अधिकारी को आतंकवादी बताकर राष्ट्रभक्ति की परिभाषा को ही कलंकित किया गया।
कांग्रेस ने जांच एजेंसियों पर दबाव डालकर मनचाहे आरोप और बयान दिलवाए, जिससे पूरा मामला एक राजनीतिक एजेंडे में बदल गया। लेकिन अंततः सत्य की जीत हुई। 2019 में साध्वी प्रज्ञा ने कांग्रेस को उसके ही गढ़ भोपाल में हराकर संसद में प्रवेश किया, यह जनमत की निर्णायक प्रतिक्रिया थी।
कांग्रेस को हिन्दू समाज से न केवल परहेज है, बल्कि घृणा है। ‘भगवा आतंकवाद’ कांग्रेस की हिन्दू विरोधी मानसिकता और तुष्टिकरण आधारित राजनीति की ही उपज थी। यही कारण है कि यह फैसला केवल आरोपियों की नहीं, बल्कि पूरे सनातन की विजय है।
मालेगांव केस में अदालत का फैसला प्रमाण है कि कितनी भी बार झूठ बोला जाए, सत्य एक दिन सामने आता ही है। कांग्रेस अभी भी अपने पापों को स्वीकार नहीं करेगी और अपने हिन्दू विरोधी एजेंडे में अड़ी रहेगी। लेकिन देश ने देख लिया है कि भगवा आतंकवाद एक कुत्सित, झूठा और खतरनाक षड्यंत्र था जिसका उद्देश्य देश में सामाजिक वैमनश्य फैलाना था। अब कांग्रेस को उस विमर्श नैरेटिव को हमेशा के लिए तिलांजलि देनी ही पड़ेगी जो उसने सत्ता के लोभ में रचा था।
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