फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

किसानों के मित्र: रेड-वेंटेड बुलबुल का मानसूनी जीवन चक्र और जैव विविधता संतुलन में इनकी भूमिका

सार

  • रेड-वेंटेड बुलबुल को वैज्ञानिक भाषा में Pycnonotus cafer कहा जाता है। यह भारत, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, और म्यांमार में बहुतायत से पाया जाता है।
  • मानसून के मौसम में यह पक्षी न केवल अधिक सक्रिय हो जाता है, बल्कि इसके व्यवहार, खानपान और प्रजनन प्रक्रिया में कई रोचक बदलाव भी देखने को मिलते हैं।
विज्ञापन
रेड वेंटेड बुलबुल - फोटो : गरिमा भाटिया ( Garima Bhatia)
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

मानसून की आहट नवजीवन और वन्यजीवों की अठखेलियों का एक मनोरम न्योता है l पक्षियों की दुनिया में भी एक नई हलचल देखी जाती है। ऐसे ही एक आम लेकिन आकर्षक पक्षी का नाम है रेड-वेंटेड बुलबुल, जिसे वैज्ञानिक भाषा में Pycnonotus cafer कहा जाता है। हमारे छतों के कोनों, बिजली के तारों, बगीचों और मोहल्लों के पेड़ों पर फुदकते हुए यह बुलबुल अपने खास चटक लाल रंग के अंडरटेल पंखों और तेज स्वर की आवाज से आसानी से पहचाना जा सकता है। असल में हमारे घरों के आंगन और आस पास पेड़ों पर सहजता से दिख जाने वाले लाल-वेंटेड बुलबुल को नज़रअन्दाज़ करना ज़रा मुश्किल है l

विज्ञापन


यह भारत, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, और म्यांमार में बहुतायत से पाया जाता है। यह एक निवासी पक्षी है, यानी यह प्रवास नहीं करता और साल भर एक ही क्षेत्र में रह सकता है। भारत में यह लगभग सभी प्रकार के आवासों में पाया जाता है, शहरी बस्तियों, गांवों, खेतों, बगीचों और यहां तक कि जंगलों में भी।

यह पक्षी पर्यावरणीय लचीलापन (ecological adaptability) का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो हर मौसम के साथ अपनी जीवनशैली में परिवर्तन करने में सक्षम है। वैसे तो मानसून जीवन के पुनर्जागरण का समय होता है लेकिन पक्षियों के लिए यह मौसम कई चुनौतियां लेकर आता है, जैसे लगातार बारिश, भोजन की खोज में कठिनाई, और घोंसले को सुरक्षित रखना आदि l
विज्ञापन

 

मानसून की समय और रेड-वेंटेड बुलबुल

मानसून के मौसम में यह पक्षी न केवल अधिक सक्रिय हो जाता है, बल्कि इसके व्यवहार, खानपान और प्रजनन प्रक्रिया में कई रोचक बदलाव भी देखने को मिलते हैं। यही समय इसका मुख्य प्रजनन काल होता है। आमतौर पर अप्रैल से सितंबर के बीच रेड वेंटेड बुलबुल नरम घास, तंतुओं और पत्तियों से प्याले के आकार का घोंसला बनाता है l

अध्ययन के अनुसार, लाल-वेंटेड बुलबुल घोंसला बनाने के लिए छोटे पत्तेदार, सघन झाड़ियों और पेड़ों को प्राथमिकता देती है। ये प्रायः बेर, गुड़हल (Hibiscus rosa-sinensis), कीकर (Acacia nilotica), शहतूत (Morus alba), बेल (Aegle marmelos), आंवला (Emblica officinalis), झिंझा (Bauhinia racemosa), जामुन (Syzygium cumini), अशोपाला (Polyalthia longifolia), रोहिडा (Tecomella undulata) और खेजड़ी (Prosopis cineraria) जैसे वृक्षों में घोंसला बनाती है।

मादा बुलबुल एक बार में दो से तीन अंडे देती है और दोनों अभिभावक मिलकर उनकी देखभाल करते हैं। अंडों से चूजों के निकलने में लगभग 12–14 दिन लगते हैं और लगभग दो हफ्तों के भीतर वे उड़ने योग्य हो जाते हैं। मानसून की लगातार बारिश के कारण बुलबुल जैसे पक्षियों को अपने शरीर को सूखा और स्वस्थ रखने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने होते हैं।

बारिश रुकने के बाद ये पक्षी प्रूनिंग करते हैं अर्थात अपनी चोंच से पंखों को संवारते हैं ताकि वे साफ, मजबूत और जलरोधक बने रहें। साथ ही यह देखा गया है कि वे अपने पंखों को फड़फड़ाकर तेजी से सूखाने का प्रयास भी करते हैं।

विज्ञापन

बुलबुल - फोटो : गरिमा भाटिया ( Garima Bhatia)
बुलबुल का आहार और जीवन

लाल-वेंटेड बुलबुल का आहार मानसून में विशेष रूप से विविध हो जाता है। यह सर्वाहारी है, और इस मौसम में यह जामुन, अमरूद, अंजीर जैसे फल, फूलों का पराग, अमृत, कीट, कैटरपिलर और अन्य छोटे कीटों का सेवन करता है। यह पक्षी न केवल अपने लिए भोजन जुटाता है, बल्कि बीजों को दूर-दूर तक फैलाकर वनस्पतियों के बीजों का प्रकीर्णन (seed dispersion) में भी मदद करता है, जिससे इसे पारिस्थितिक तंत्र में एक अहम भूमिका निभाने वाला पक्षी माना जाता है।

भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, बुलबुल स्थानीय जैव विविधता के संतुलन को बनाए रखने में सहायक होता है और यह कीट नियंत्रण में भी भागीदारी निभाता है, जिससे किसान वर्ग को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ होता है। इसके अतिरिक्त, यह फूलों से पराग ले जाने में भी भूमिका निभाता है जिससे परागण की प्रक्रिया में सहायक होता है।

बुलबुल की आवाज मानसून के मौसम में अधिक स्पष्ट, विविध और मधुर हो जाती है। नर बुलबुल प्रजनन काल में अपनी विशेष चहचहाहट से मादा को आकर्षित करता है। इनकी आवाज़ में कभी तेज चटकारा होता है तो कभी मधुर गीत जैसा स्वर सुनाई देता है, जो मानसून की पृष्ठभूमि में एक अलग ही राग उत्पन्न करता है।

यह पक्षी केवल पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। भारतीय लोककथाओं, कविताओं और गीतों में बुलबुल को सौंदर्य, प्रेम और भावनाओं का प्रतीक माना गया है। परंतु यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि इसे 1997 में न्यूज़ीलैंड जैसे देशों में आक्रामक प्रजाति घोषित किया गया था क्योंकि वहां यह स्थानीय जैव विविधता के लिए खतरा बन गया था। हालांकि, भारतीय उपमहाद्वीप में यह पक्षी पारिस्थितिक संतुलन में सहायक, सौंदर्य से भरपूर और मानसून की जटिलता में अपनी विशेष भूमिका निभाता है।

मानसून में जब सारी प्रकृति भीगती है, तभी बुलबुल अपनी पुकार और जीवन शैली से हमें यह याद दिलाता है कि प्रकृति को समझने के लिए कभी-कभी सिर उठाकर पेड़ों की ओर देखना और चहचहाहट को सुनना काफी होता है।



---------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें