भगवान शंकर के इस तीसरे नेत्र का रहस्य समझकर ही कोई नेतृत्व समाज को समृद्धि और सुरक्षा देकर सर्वप्रिय बन सकता है।
- फोटो : Amar Ujala
भगवान शिव नित्य शुद्ध हैं। शुद्धता का संधारण मन, वाणी और कर्म से होता है। शिव की कथाओं में कोई प्रसंग ऐसा नहीं मिलता जब उन्होंने कहीं किसी से कोई छल किया हो। समाज का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति भी यदि शुद्ध हो, छल-फरेब न करे, झूठ न बोले तो उसकी विश्वसनीयता समाज में स्वतः बढ़ जाती है और तब उसकी सर्वप्रियता का पथ प्रशस्त होने लगता है।
नेतृत्व की शुचिता समाज में भी सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करके समाज से भ्रष्टाचार दूर कर सकती है। लोकजीवन में आचरण की पवित्रता नेतृत्व के शिवत्व की शुचिता पर निर्भर है। शुद्धता के अभाव में सामाजिक लोकप्रियता संभव नहीं।
निजी आवश्यकताओं में न्यूनता शिव का आदर्श है। अन्न, वस्त्र और आवास लोकजीवन की अनिवार्य आवश्यकताएं हैं। शिव सबके लिए इन आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। शिव की पत्नी भगवती पार्वती का एकनाम अन्नपूर्णा भी है। माता अन्नपूर्णा की शिवगृह में उपस्थिति सबका पेट भरने की गारंटी है। अन्नपूर्णा सुख समृद्धि देकर लोक में वस्त्र और आवास की लौकिक आवश्यकताओं की पूर्ति का भी प्रतीकार्थ हैं। शिव और अन्नपूर्णा की यह पौराणिक युति नेतृत्व और नीति में सामंजस्य को संकेतित करती है।
लोक का कल्याण चाहने वाले नेता की नीति ऐसी होनी चाहिए जो सबकी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। स्वयं शिव इन अनिवार्यताओं से भी परे हैं। वे दिगम्बर हैं, उन्हें अन्न और आवास भी नहीं चाहिए । वस्त्र के नाम पर बाघम्बर, भोजन के लिए बिल्वपत्र-भांग-धतूरा और आवास के लिए कैलाश अथवा श्मशान।
शिव से संदर्भित ये उपादान संकेतित करते हैं कि सर्वप्रिय होने के लिए त्याग का निर्वाह परम आवश्यक है। नेता को अपने लिए वे सुविधाएं भी नहीं चाहिए जिनकी व्यवस्था वह अन्य के लिए अनिवार्य रूप से करता है।
विरोधों और विषमताओं के बीच समन्वय और सामंजस्य स्थापित करने की संज्ञा ही शिव है।
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शिव का विषपान लोक कल्याण के लिए आवश्यक शर्त है। अमृत सब चाहते हैं, विष कोई नहीं चाहता। यश की अभिलाषा सब करते हैं किन्तु लोक की भलाई के लिए अपयश स्वीकार करने को कोई विरला ही तैयार होता है। जो नेता निर्भय होकर समाज के कल्याण के लिए अपमान और अपयश का विष पचा जाता है, वही सर्वप्रिय बन पाता है। समाज को नेतृत्व के लिए सदा शिव की प्रतीक्षा रहती है क्योंकि शिव ही स्वयं विष पीकर औरों को अमृत प्राप्त करने का अवसर प्रदान करते हैं।
शिव करुणावतार हैं। अतः नेता को भी करुणा से समृद्ध होना चाहिए जब तक नेतृत्व में जनता के प्रति करुणा का कोमल भाव नहीं होगा. तब तक वह उसके दुख दूर करने के लिए सच्चे प्रयत्न भी नहीं कर पाएगा । शिव की भाँति करुणा करके सबकी पीड़ा हरने बाला नेता ही सबका प्रिय बन सकता है। आज अभावों से जूझती, असुरक्षित अनुभव करती डर-डर कर जीती जनता अपने नेताओं से करुणा की आशा करती है।
विरोधों और विषमताओं के बीच समन्वय और सामंजस्य स्थापित करने की संज्ञा ही शिव है। शिव-परिवार में उनके पुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर शिव के कंठ में पड़े नाग का घोर शत्रु है। शिवपत्नी पार्वती का वाहन सिंह शिव के वाहन नंदी का विरोधी है, फिर भी शिव परिवार में सब साथ-साथ हैं, सुखी हैं और अपने-अपने कार्य में व्यस्त हैं। विरोधों में सामंजस्य की यही सामर्थ्य शिव- नेतृत्व के माध्यम से समाज में संघर्ष का शमन कर सकती है।
शिव अर्थात् कल्याण के लिए शक्ति चाहिए, सामर्थ्य चाहिए। शक्ति दो प्रकार की है- बुद्धि की और देह की, शास्त्र की और शस्त्र की। दोनों ही प्रकार की शक्तियाँ शिव की दो संतानों के रूप में उनकी वशवर्ती हैं। गणेश और कार्तिकेय के रुप, गुण और कार्य में इन शक्तियों की प्रतीकात्मकता के दर्शन होते हैं।
इस प्रकार शिव सर्वप्रिय नेतृत्व के लिए आदर्श प्रतिमान हैं। आज लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोक के नेतृत्व का सूत्रधार वही बन सकता है जो सर्वप्रिय हो, सर्वप्रिय न हो तो बहुप्रिय अवश्य हो। नेतृत्व की बहुप्रियता शिव की सर्वप्रियता के अनुकरण में ही संभव है। शिवरात्रि के इस पावन पर्व पर यदि हमारे नेता भगवान शिव के गुणों का अनुसरण करें तो वे भी सर्वप्रिय और जगतवन्द्य बन कर सबका कल्याण कर सकते हैं।
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