देश के सबसे धनी राज्य माने जाने वाले महाराष्ट्र में सत्ता के लिए खेले गए पार्ट थ्री एपिसोड का अंत क्या होगा? यह देखना दिलचस्प होगा, क्योंकि यह सियासी धारावाहिक अभी चल ही रहा है। इस देश में काका के खिलाफ भतीजे की राजनीतिक बगावत नई बात नहीं है। लेकिन नई बात अगर कुछ है तो ये कि इस देश में आर्थिक और नैतिक भ्रष्टाचार अब कोई मुददा नहीं है और यह भी कि अब भारतीय राजनीति में ‘थूक कर चाटना’ भी सर्वमान्य कल्चर बन चुका है।
सत्ता स्वार्थ के लिए कभी भी यू-टर्न ले लेना अब राजनीतिक राजमार्ग पर चलने का अलिखित ट्रैफिक नियम बन गया है और कुछेक को छोड़ कोई भी इसका अपवाद नहीं है। महाराष्ट्र का ताजा राजनीतिक घटनाक्रम इसका बड़ा उदाहरण है। कल को यही बिहार में भी दोहराया जा सकता है। इस खेल में अगर कोई मूर्ख बन रही है तो वो है जनता, जिसके पास निरीह विवशता के अलावा और कोई विकल्प शायद विकल्प नहीं छोड़ा गया है।
भारतीय समाज में भ्रष्टाचार शब्द अब एक सियासी फुटबॉल की तरह है, जिसे हर कोई अपनी सुविधा और मकसद से किक मारता रहता है। कभी-कभी यह सेल्फ गोल में भी बदल जाती है। इस खेल का अजब नियम यह है कि भ्रष्टाचार की यह बॉल जब तक दूसरे के पाले में होती है, तब तक ‘भ्रष्टाचार’ होती है और जब वह अपनी ‘डी’ में होती है तो शिष्टाचार का रूप ले लेती है। यहां तक कि उसका रंग और राजनीतिक तासीर तक बदल जाती है।
क्या बोले शरद पवार?
गौर करें कि बरसों से काका शरद पवार के राजनीतिक पोषण आहार पर पले भतीजे अजित पवार के भाजपा शिवसेना महायुति के साथ सत्ता में जाने के फैसले से दुखी राकांपा अध्यक्ष (कम से कम अभी तक तो हैं हीं) शरद पवार ने कहा कि मेरे जिन लोगों पर भाजपा ने बरसों गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, वो अब भाजपा के साथ मिलते ही ‘दोषमुक्त’ हो गए हैं।
उनका कहने का आशय यह था कि भाजपा अब एक ‘राजनीतिक गंगा’ है, जिसमें स्नान करते ही स्वत: पाप प्रक्षालन हो जाता है। इस हिसाब से उस अजित पवार एंड कंपनी, जिसके पीछे ईडी लगी है, भाजपा के हमकदम होते ही ईमानदारी का बाना धारण कर चुकी है। ये वही कंपनी है, जिसके खिलाफ भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस भ्रष्टाचार के खुले आम आरोप लगाया करते थे। लेकिन अब भाजपा के ‘सुरक्षा चक्र ‘में आते ही इन सभी कथित भ्रष्टाचारियों ने राहत की गहरी सांस ले ली है।
जो कल तक थे अपने, आज वो भ्रष्टाचारी
एक दिलचस्प बात और कि जो शरद पवार ‘अजित एंड कंपनी’ को अब परोक्ष रूप से ‘भ्रष्टाचारी’ बता रहे हैं, वो कल तक इन सबको अपने परिवार का ही हिस्सा मानते रहे हैं। यानी उनकी छत्रछाया में चलने वाला भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार नहीं था, ‘परफॉर्मेंस’ था। (कुछ लोगों का तो अभी भी मानना है कि यह सब काका भतीजे का मिला जुला गेम है) राजनीतिक छत्र बदलते ही वह फिर भ्रष्टाचार में तब्दील हो गया है।
इसका अर्थ यही है कि अपने भ्रष्टाचार करें तो वह भ्रष्टाचार हो ही नहीं सकता। यह शब्द और भाव केवल ‘गैरों’ के लिए है। हालांकि, खुद काका शरद पवार पर भी उनके केन्द्रीय कृषि मंत्री रहते कदाचार के आरोप लगे हैं। लेकिन कभी किसी ने उसकी जांच इसलिए नहीं कराई, क्योंकि विरोध के झीने पर्दे में शरद पवार निजी रिश्तों का सौजन्य कायम रखते आए हैं।
साथ ही राजनीति में उनका सत्ता के अलावा कभी कोई वैचारिक आग्रह नहीं रहा। इस हिसाब से अजित पवार उसी ‘शरदवाद’ को आगे बढ़ा रहे हैं तो इसमें गलत क्या है? आज शरद पवार अपने सियासी गणित के हिसाब से विपक्ष की राजनीति कर भले कर रहे हों, लेकिन सियासी अक्षत वर्षा करने वाले हर दल में हैं, जिनमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी शामिल हैं, जो उन्हें ‘शरदराव’ कहते आए हैं। उनकी पार्टी भाजपा तो काफी पहले से विरोधियो के राजनीतिक पिंडदान के लिए राकांपा के ‘काकस्पर्श’ की आस लगाए बैठी थी।