फडणवीस सत्ता वापसी को तैयार
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स्थानीय पार्टियां और परिवारवाद
मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी हो या मायावती की बहुजन समाज पार्टी, अकाली दल (एस) हो या तृणमूल कांग्रेस, डीमके हो या फिर नेशनल कांफ्रेंस या पीडीपी। सब जगह व्यक्ति केंन्द्रित राजनीति और परिवार के राजनीतिक हित-पोषण का आग्रह सर्वोपरि है। केवल कम्युनिस्ट पार्टियां इससे बची हैं, लेकिन उनका राजनीतिक वजूद हाशिए पर है। कांग्रेस भले विचारधारा वाली पार्टी हो लेकिन उसने भी परिवारवाद का स्थायी मास्क पहन रखा है।
शिवसेना में शिंदे गुट की बगावत दरअसल ठाकरे परिवार के स्थायी परिवारवाद के खिलाफ बगावत भी है। एकनाथ शिंदे अच्छी तरह जानते हैं कि 2019 में उन्हें मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनने दिया गया, क्योंकि ऐसा करने से ठाकरे परिवार का औरा घटता। यह संदेश जाता कि पार्टी किसी खानदान की बपौती नहीं है। शिंदे गुट की बगावत का दूसरा और जायज कारण जनाधार का है।
राज्य में भाजपा और शिवसेना बीते 27 सालों से मिलकर लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ती आई है। उनका काॅमन फैक्टर हिंदुत्व ही रहा है। यही कारण है कि दोनो पार्टियों के बीच आसानी से वोट ट्रांसफर भी होता रहा है। बागी विधायकों के सामने संकट यह था कि महाविकास आघाडी में रहकर अगर वो चुनाव लड़ेंगे तो एनसीपी और कांग्रेस का वोट उनके पक्ष में ट्रांसफर कैसे होगा क्योंकि सत्ता के गोंद के अलावा बाकी दलों के मतदाताओं को जोड़ने का कोई जरिया नहीं है।
जाहिर है कि भाजपा की बैसाखी के बगैर उनका चुनाव जीतना मुश्किल था। तीसरे, भाजपा और शिवसेना में सीट शेयरिंग आसानी से हो जाती है, लेकिन तीन दलों में सीट का बंटवारा आसान नहीं था और कई बागी विधायकों की तो सीट ही बंटवारे में चली जाने का खतरा था। ऐसे में उनकी राजनीतिक साधना पर पानी फिरने का प्रबल अंदेशा था।
अब सवाल यह है कि क्या शिंदे गुट ठाकरे परिवार के बगैर राजनीतिक रूप से जिंदा रह पाएगा या नहीं ? इसका जवाब भविष्य में मिलेगा, उधर शिवसेना भी अपने बड़े सिपहसालारों को गंवाने के बाद संघर्ष के मैदान में कैसे टिकेगी, यह देखना भी दिलचस्प होगा।
शिवसेना में परिवारवाद को खुली चुनौती
बहरहाल बागी विधायकों ने विधायकों ने शिवसेना में परिवारवाद को खुली चुनौती देकर नया जोखिम लिया है। जनता उनके साथ कितनी खड़ी होती है, इसका खुलासा आगे चलकर होगा, लेकिन भाजपा ने देश में राजनीतिक परिवारवाद के खिलाफ जो चिंगारी सुलगाई है, उसका आम जनता में असर हो रहा है।
मध्यप्रदेश की ही बात करें तो यहां जारी पंचायत चुनावों में मतदाताओं ने सभी पार्टियों के बड़े नेताओं को चुनाव में खड़े नाते-रिश्तेदारों को जमकर धूल चटाई है। इन नतीजों को देखकर वो तमाम नेता हतप्रभ हैं, जो अपनी बैसाखी के सहारे बेटे-बेटी, भैया- भाभी आदि को सियासत की सीढ़ी पर चढ़ाना चाहते थे।
शिवसेना की इस बगावत के बहाने अगर भारतीय राजनीति में परिवारवाद पर लगाम कसाती है तो यह देश के दूरगामी हित में होगा, इसके संकेत मिलने भी लगे हैं। मतदाता का मानस बनने लगा है कि देश में राजनीतिक जमींदारियां खत्म होनी ही चाहिए। जिन्होंने राजनीति में रहकर सचमुच संघर्ष किया है, उन्हें उसके फल चखने का पूरा हक है, लेकिन जो केवल बाप दादों के पुण्य का फल पीढ़ियों तक खाते रहना चाहते हैं, उनकी विदाई ही बेहतर है।
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