भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के रिश्ते अब बेहद नाज़ुक दौर में हैं।
- फोटो : PTI
महाराष्ट्र में सबकुछ ठीक नहीं
भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के रिश्ते अब बेहद नाज़ुक दौर में हैं। समान विचारधारा के चलते अटल और आडवाणी जिस तरह से अपने इस बड़े भाई को मना लेते थे, पुचकार लेते थे, बीजेपी आलाकमान फ़िलहाल इस मूड में नज़र नहीं आता, इसलिए शिवसेना को अतीत के गर्वबोध से उबरकर अपने भविष्य की स्थायी राह अब तलाशनी ही होगी। इसके लिए अक्टूबर के विधानसभा से बढ़कर कोई अवसर उसके लिए नहीं है।
पिछले विधानसभा चुनाव में दोनों पुराने मित्र दल आमने-सामने थे, लेकिन मगर अब 2014 से गंगा में पानी बहुत बह चुका है। भले ही उम्मीदवारों के मामले में देर सबेर तालमेल हो जाए, लेकिन एक बाटी साफ़ है कि शिवसेना को अपने अस्तित्व के लिए ऊबड़-खाबड़ पृथक रास्ते का ही चुनाव करना होगा।
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने रविवार को अपनी चुनाव सभा में एनडीए का ज़िक्र तो किया, लेकिन शिवसेना का नाम लेने से परहेज़ किया। यह बताता है दोनों दलों के बीच सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है।
कांग्रेस एनसीपी का हाल
इसी तरह कांग्रेस और एनसीपी के रिश्तों का हाल है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने हाल के वर्षों में अपनी परंपरागत् छबि को तोड़ते हुए अनेक अवसरों पर बीजेपी के प्रति उदार और समर्थक रवैया अपनाया। मोदी और शरद पवार एक दूसरे को लाड़ करते भी दिखे हैं, पर अब एक बार फिर इस पार्टी ने कांग्रेस के साथ ही जाने का फ़ैसला किया है।
यह अलग बात है कि इतिहास जब भी एनसीपी का मूल्यांकन करेगा तो इस तथ्य को भी ध्यान में रखा जाएगा कि यूपीए के साथ सत्ता में रहते हुए भी एनसीपी ने कांग्रेस को नुक़सान पहुंचाने कोई अवसर नहीं छोड़ा है। शायद पार्टी सुप्रीमो को अब यह बात समझ में आ गई होगी। हालांकि अब एनसीपी ने हर ज़िले में एक अपनी सीट की मांग कर दी है। कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं थी। देखना दिलचस्प होगा कि अपने अपने रिश्तों को जलेबी बना चुके दोनों गठबंधन किस तरह आगे जाते हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।