नया नहीं है देश में दो बच्चों वाला सिद्धान्त
त्रिस्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था में दो बच्चों का सिद्धान्त नया नहीं है। सन् 1991 की जनगणना में 1981 की तुलना में 17.70 प्रतिशत दशकीय वृद्धि से चिन्तित राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) ने केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. करुणाकरण की अध्यक्षता में सन् 1992 में जनसंख्या नियंत्रण के उपाय सुझाने के लिए एक कमेटी का गठन किया था जिसने 1993 में अपनी रिपोर्ट एनडीसी को सौंपी थी।
रिपोर्ट में जनसंख्या नियंत्रण के लिए दिए गए सुझावों में पंचायतों, नगर निकायों एवं सहकारी समितियों आदि के चुनाव में दो से अधिक बच्चे वालों को प्रतिबंधित करने जैसे कुछ सुझाव दिए गए थे। जबकि इस रिपोर्ट से पहले ही राजस्थान ने पंचायत चुनाव में दो बच्चों का सिद्धान्त लागू कर दिया था। उसके बाद जनसंख्या नियंत्रण को राष्ट्रीय जरूरत एवं प्रतिबद्धता मानकर आन्ध्र प्रदेश एवं हरियाणा ने 1993 में, उड़ीसा ने 1994, हिमाचल प्रदेश एवं मध्य प्रदेश ने 2000 में तथा महाराष्ट्र ने 2004 में अपने यहां पंचायतीराज में दो बच्चों का सिद्धान्त लागू कर दिया था। स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित समिति ने जनसंख्या नीति का मसौदा तैयार किया था। दरअसल, मिश्र की राजधानी कैरो में सम्पन्न जनसंख्या नियंत्रण पर एक अन्तर्राष्ट्रीय संधि हुयी थी जिसमें हस्ताक्षरकर्ता भारत भी था।
दो बच्चों के सिद्धान्त को चुनौती
पंचायतों में दो बच्चों की सीमा के सिद्धान्त का काफी विरोध भी हुआ इसलिए कुछ लोग इस व्यवस्था के खिलाफ अदालत में भी गए लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। पहली बार इस सिद्धान्त को चुनौती देने वाली याचिका पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट द्वारा खारिज की गई तो पराजित पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
इस अपील पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति आर.सी. लाहोटी, न्यायमूर्ति अशोक भान एवं न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खण्ड पीठ ने 30 जुलाई 2003 को फैसला देते हुए हाइकोर्ट के फैसले को सही ठहराया और कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243 जी के तहत राज्य सरकार को पंचायतों को और अधिक प्रभावशाली एवं लोकोपयोगी बनाने के लिए कानून बनाने का अधिकार है और इसीलिए सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के अनुसार दो बच्चों वाले कानून का प्रतिपादन किया है।
दूसरा मामला उड़ीसा के नौपाड़ा जिले के एक सरपंच मीनासिंह मांझी का था जिसे तीन बच्चे होने पर उड़ीसा हाइकोर्ट द्वारा पद के अयोग्य ठहरा दिया गया था। मांझी का तर्क था कि उसकी तीन सन्तानें तो अवश्य हुई मगर उसने पहली सन्तान को निकट संबंधियों को गोद दे दिया था जो कि हिन्दू दत्तक तथा भरण पोषण अधिनियम 1956 के तहत वैधानिक है, इसलिए वह अब तीन बच्चों के बजाय दो ही बच्चों का पिता रह गया है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 25 अक्टूबर 2018 को उड़ीसा हाइकोर्ट के फैसले पर सहमति जताते हुए कहा कि उक्त कानून का उद्देश्य कम सन्तान पैदा करने से है।
आपत्ति कानून पर नहीं बल्कि लागू करने के तरीके पर इस बार आपत्ति कानून पर नहीं बल्कि नियम को लागू करने के तरीके पर थी। जिसे उत्तराखण्ड हाइकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया। चूंकि उत्तराखण्ड का संशोधित पंचायती राज एक्ट राज्यपाल के अनुमोदन के बाद 25 जुलाइ को सरकार के राजपत्र में प्रकाशित हुआ था इसलिये उसी तिथि को अदालत ने ‘डेडलाइन’ या ‘‘कट आॅफ डेट’’ मान लिया और उससे पहले जन्मे दो से अधिक बच्चों के माता पिता को चुनाव लड़ने का अधिकार दे दिया।
अब तक सुप्रीम कोर्ट में पिछली तिथि से यह नियम लागू किये जाने का मामला नहीं पहुंचा था। अदालत ने इसके साथ ही पंचायत जनाधिकार मंच की पंचायत चुनाव में कम से कम दसवीं पास होने की अनिवार्यता को समाप्त करने मांग को खारिज कर दिया था। अब तक दो बच्चों वाले सिद्धान्त को चुनौती देने वाली याचिकाएं राज्यों के हाइकोर्ट द्वारा खारिज की गई थीं और उन फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लग गई थी। इस बार हाइकोर्ट में हारने वाला पक्ष सरकार थी जिसे सुप्रीम कोर्ट में भी झटका लग गया।
ज्यादातर ग्रामीण महिलाओं के दो से अधिक बच्चे
एक तरफ तो पिछली तारीख से दो बच्चों की सीमा और शैक्षिक योग्यता के कानून से अकेले उत्तराखण्ड में लाखों लोग बुनियादी लोकतांत्रिक प्रकृया में सक्रिय भागीदारी से वंचित हो रहे हैं और दूसरी तरफ इन बंदिशों के चलते पंचायत चुनाव में प्रत्याशी नहीं मिल रहे हैं। उत्तराखण्ड में कुल 27.32 लाख विवाहित ग्रामीण महिलाओं में से 10.75 लाख महिलाओं के दो से अधिक बच्चे हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में 21 प्रतिशत महिलाओं के 3 से अधिक, 16 प्रतिशत के 4 से अधिक और 18 प्रतिशत ग्रामीण विवाहिताओं के 5 से अधिक बच्चे हैं। इसलिये भी उत्तराखण्ड सहित कई राज्यों में दो बच्चों के सिद्धान्त का विरोध हो रहा है।
समानता एवं स्वतंत्रता के हनन का आरोप
तर्क यह भी है कि जो कानून निर्माता विधायक और सांसद खुद पर आदर्श लागू करने के बजाय पंचायतों पर जनसंख्या नियंत्रण की जिम्मेदारी थो रहे हैं, उनके लिए शैक्षिक योग्यता ज्यादा जरूरी है। इसी तरह दो बच्चों का सिद्धान्त भी उन पर लागू हो तो लोग जनसंख्या नियंत्रण के लिये ज्यादा प्रेरित होंगे।
इस तरह की बंदिश के भेदभावपूर्ण होने तथा इनसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 21, 29, 42 एवं 47 को उल्लंघन होने के साथ ही 18 दिसम्बर 1979 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा महिलाओं के विकास एवं प्रजनन स्वास्थ्य सम्बन्धी बिल की धारा 14 एवं 16 का भी उल्लंघन होने का आरोप लगता रहा है। उत्तराखण्ड में दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर राष्ट्रीय दर 12.3 से कहीं कम 11.5 प्रतिशत है। इसी प्रकार केरल और तमिलनाडू में भी यह दर काफी कम होने के कारण वहां जनसंख्या नियंत्रण का विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
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