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उत्तराखंड पंचायत चुनाव 2019: अब दो से अधिक बच्चे वाले लोग भी लड़ सकेंगे चुनाव

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सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। - फोटो : सोशल मीडिया
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सुप्रीम कोर्ट ने नैनीताल स्थित उत्तराखण्ड हाइकोर्ट के पिछली तिथि से कानून लागू करने के राज्य सरकार के कानून को असंवैधानिक घोषित करने के साथ ही दो से अधिक बच्चों के माता-पिता को भी पंचायत चुनाव लड़ने की छूट देने के फैसले को सही ठहराया है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से उत्तराखण्ड ही नहीं बल्कि देश के उन करोड़ों दंपत्तियों को ग्राम सरकार और लोकतंत्र की इस बुनियादी इकाई में सीधी भागीदारी का मार्ग खोल दिया है जिनके कानून बनने से पहले ही दो से अधिक बच्चे हैं।

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कहां-कहां लागू है ये कानून 
उत्तराखण्ड के अलावा राजस्थान, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, उड़ीसा, हिमाचल प्रदेश एवं मध्य प्रदेश में पहले से ही दो अधिक बच्चे वाले दम्पत्तियों के पंचायत और निकाय चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध है और कुछ अन्य राज्य इसी राह पर अग्रसर हैं।

नैनीताल हाइकोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार द्वारा पंचायत चुनाव में दो से अधिक बच्चे वाले तथा दसवीं से कम पढ़े-लिखे दम्पत्तियों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध को तो कानूनन सही ठहराया मगर इस कानून को पिछली तारीख से लागू करने को असंवैधानिक ठहरा दिया। मतलब यह कि जिस तिथि को कानून बना है उसके बाद तो दो बच्चों वाला नियम लागू हो सकता है मगर जिनके पहले से ही दो से अधिक बच्चे हों उन्हें चुनाव लड़ने से रोका नहीं जा सकता।
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वर्ष 2016 में राज्य में राष्ट्रपति शासन को लागू करने के तरीके को असंवैधानिक घोषित करने के बाद इसी हाइकोर्ट ने यह दूसरा ऐतिहासिक फैसला दिया है जोकि सारे देश के लिए नजीर बनेगा। इस बार भी सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट के फैसले को उचित मान कर राज्य सरकार द्वारा इसे रद्द करने की अपील ठुकरा दी।

पिछली तिथि से कानून लागू करना असंवैधानिक
देशभर के उन पंचायत नेताओं के लिए उत्तराखण्ड से खुशखबरी यह है कि अगर उनके राज्य में दो से अधिक बच्चों पर पंचायत चुनाव लड़ने पर रोक का कानून बनने जा रहा है या बन गया है तो कानून बनने से पहले उनके चाहे कितने भी बच्चे क्यों न हों उन्हें चुनाव लड़ने या पद पर बने रहने से कोई नहीं रोक सकता है।

हाइकोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले पर अभी सुप्रीम कोर्ट की मुहर लग गई है। नैनीताल स्थित उत्तराखण्ड हाइकोर्ट ने उत्तराखण्ड पंचायतीराज (संशोधन) अधिनियम 2019 को चुनौती देने वाली पंचायत जनाधिकार मंच के संस्थापक संयोजक जोतसिंह बिष्ट की याचिका पर फैसला देते हुए राज्य सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 243-जी के तहत दो बच्चों के सिद्धान्त को पंचायत चुनाव में लागू करने को तो सही ठहराया मगर साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि सरकार पिछली तारीख से यह नियम लागू नहीं कर सकती है।

मतलब यह कि नया कानून 25 जुलाई 2019 को अस्तित्व में आया था इसलिए यह उसके बाद तो लागू हो सकता है, मगर इसे 25 जुलाई से पहले लागू नहीं माना जा सकता और उससे पहले अदालत ने पंचायत प्रतिनिधियों के लिए शैक्षिक योग्यता के निर्धारण को भी सही माना है। नए कानून से लाखों की संख्या में लोग चुनाव  प्रक्रिया से बाहर हो रहे थे।
 

पंचायत चुनावः प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : social media
हाइकोर्ट ने जगाई देशभर के पंचायत नेताओं की उम्मीद 
हाइकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लगने से अन्य राज्यों के उन करोड़ों लोगों के लिए भी लोकतंत्र की बुनियादी इकाई पंचायतीराज सहित अन्य निकायों में सक्रिय भागीदारी के लिए रास्ता खुल जाएगा जिनके कि कानून लागू होने से पहले ही दो से अधिक बच्चे हों। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 34 करोड़ विवाहिताओं के 92 करोड़ बच्चे थे।

जाहिर है कि देश में दो से अधिक बच्चे वाले दंपत्तियों की संख्या कई करोड़ में है। हालांकि राजस्थान एवं हरियाणा जैसे जिन राज्यों में दो बच्चों का सिद्धान्त पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों में काफी पहले से लागू है वहां इसका अधिक लाभ तो नहीं मिलेगा मगर जहां यह व्यवस्था हाल ही में लागू हुई या जहां अब लागू होनी है उन राज्यों में पहले से ही दो से अधिक बच्चे वाले दंपत्तियों के लिए एक कानूनी मार्ग तो खुल ही गया।

हाइकोर्ट के फैसले का सारे देश में असर
देश के सबसे कम उम्र वाले उच्च न्यायालयों में से एक नैनीताल हाइकोर्ट का यह दूसरा ऐसा ऐतिहासिक फैसला होगा जो कि सारे देश के लोकतंत्र को प्रभावित करेगा। इससे पहले इसी हाइकोर्ट ने 21 अप्रैल 2016 को केन्द्र सरकार द्वारा बर्खास्त उत्तराखण्ड की हरीश रावत सरकार को बहाल कर राज्य में लागू राष्ट्रपति शासन को असंवैधानिक तरीके से लगाया गया घोषित कर दिया था।

यही नहीं हाइकोर्ट ने राष्ट्रपति पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि वह कोई राजा नहीं जिनके फैसले की समीक्षा न हो सके। बाद में सुप्रीमकोर्ट में भी हाइकोर्ट का फैसला न्याय की कसौटी पर खरा उतरा था और अपनी देखरेख में विधानसभा में विश्वास मत की प्रक्रिया शुरू कराई थी। देश के राजनीतिक इतिहास में वह अभूतपूर्व घटनाक्रम था। 
 
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नया नहीं है देश में दो बच्चों वाला सिद्धान्त 
त्रिस्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था में दो बच्चों का सिद्धान्त नया नहीं है। सन् 1991 की जनगणना में 1981 की तुलना में 17.70 प्रतिशत दशकीय वृद्धि से चिन्तित राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) ने केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. करुणाकरण की अध्यक्षता में सन् 1992 में जनसंख्या नियंत्रण के उपाय सुझाने के लिए एक कमेटी का गठन किया था जिसने 1993 में अपनी रिपोर्ट एनडीसी को सौंपी थी।

रिपोर्ट में जनसंख्या नियंत्रण के लिए दिए गए सुझावों में पंचायतों, नगर निकायों एवं सहकारी समितियों आदि के चुनाव में दो से अधिक बच्चे वालों को प्रतिबंधित करने जैसे कुछ सुझाव दिए गए थे। जबकि इस रिपोर्ट से पहले ही राजस्थान ने पंचायत चुनाव में दो बच्चों का सिद्धान्त लागू कर दिया था। उसके बाद जनसंख्या नियंत्रण को राष्ट्रीय जरूरत एवं प्रतिबद्धता मानकर आन्ध्र प्रदेश एवं हरियाणा ने 1993 में, उड़ीसा ने 1994, हिमाचल प्रदेश एवं मध्य प्रदेश ने 2000 में तथा महाराष्ट्र ने 2004 में अपने यहां पंचायतीराज में दो बच्चों का सिद्धान्त लागू कर दिया था। स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित समिति ने जनसंख्या नीति का मसौदा तैयार किया था। दरअसल, मिश्र की राजधानी कैरो में सम्पन्न जनसंख्या नियंत्रण पर एक अन्तर्राष्ट्रीय संधि हुयी थी जिसमें हस्ताक्षरकर्ता भारत भी था।

दो बच्चों के सिद्धान्त को चुनौती
पंचायतों में दो बच्चों की सीमा के सिद्धान्त का काफी विरोध भी हुआ इसलिए कुछ लोग इस व्यवस्था के खिलाफ अदालत में भी गए लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। पहली बार इस सिद्धान्त को चुनौती देने वाली याचिका पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट द्वारा खारिज की गई तो पराजित पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

इस अपील पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति आर.सी. लाहोटी, न्यायमूर्ति अशोक भान एवं न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खण्ड पीठ ने 30 जुलाई 2003 को फैसला देते हुए हाइकोर्ट के फैसले को सही ठहराया और कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243 जी के तहत राज्य सरकार को पंचायतों को और अधिक प्रभावशाली एवं लोकोपयोगी बनाने के लिए कानून बनाने का अधिकार है और इसीलिए सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के अनुसार दो बच्चों वाले कानून का प्रतिपादन किया है।

दूसरा मामला उड़ीसा के नौपाड़ा जिले के एक सरपंच मीनासिंह मांझी का था जिसे तीन बच्चे होने पर उड़ीसा हाइकोर्ट द्वारा पद के अयोग्य ठहरा दिया गया था। मांझी का तर्क था कि उसकी तीन सन्तानें तो अवश्य हुई मगर उसने पहली सन्तान को निकट संबंधियों को गोद दे दिया था जो कि हिन्दू दत्तक तथा भरण पोषण अधिनियम 1956 के तहत वैधानिक है, इसलिए वह अब तीन बच्चों के बजाय दो ही बच्चों का पिता रह गया है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 25 अक्टूबर 2018 को उड़ीसा हाइकोर्ट के फैसले पर सहमति जताते हुए कहा कि उक्त कानून का उद्देश्य कम सन्तान पैदा करने से है। 

आपत्ति कानून पर नहीं बल्कि लागू करने के तरीके पर इस बार आपत्ति कानून पर नहीं बल्कि नियम को लागू करने के तरीके पर थी। जिसे उत्तराखण्ड हाइकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया। चूंकि उत्तराखण्ड का संशोधित पंचायती राज एक्ट राज्यपाल के अनुमोदन के बाद 25 जुलाइ को सरकार के राजपत्र में प्रकाशित हुआ था इसलिये उसी तिथि को अदालत ने ‘डेडलाइन’ या ‘‘कट आॅफ डेट’’ मान लिया और उससे पहले जन्मे दो से अधिक बच्चों के माता पिता को चुनाव लड़ने का अधिकार दे दिया।

अब तक सुप्रीम कोर्ट में पिछली तिथि से यह नियम लागू किये जाने का मामला नहीं पहुंचा था। अदालत ने इसके साथ ही पंचायत जनाधिकार मंच की पंचायत चुनाव में कम से कम दसवीं पास होने की अनिवार्यता को समाप्त करने मांग को खारिज कर दिया था। अब तक दो बच्चों वाले सिद्धान्त को चुनौती देने वाली याचिकाएं राज्यों के हाइकोर्ट द्वारा खारिज की गई थीं और उन फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लग गई थी। इस बार हाइकोर्ट में हारने वाला पक्ष सरकार थी जिसे सुप्रीम कोर्ट में भी झटका लग गया। 

ज्यादातर ग्रामीण महिलाओं के दो से अधिक बच्चे
एक तरफ तो पिछली तारीख से दो बच्चों की सीमा और शैक्षिक योग्यता के कानून से अकेले उत्तराखण्ड में लाखों लोग बुनियादी लोकतांत्रिक प्रकृया में सक्रिय भागीदारी से वंचित हो रहे हैं और दूसरी तरफ इन बंदिशों के चलते पंचायत चुनाव में प्रत्याशी नहीं मिल रहे हैं। उत्तराखण्ड में कुल 27.32 लाख विवाहित ग्रामीण महिलाओं में से 10.75 लाख महिलाओं के दो से अधिक बच्चे हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में 21 प्रतिशत महिलाओं के 3 से अधिक, 16 प्रतिशत के 4 से अधिक और 18 प्रतिशत ग्रामीण विवाहिताओं के 5 से अधिक बच्चे हैं। इसलिये भी उत्तराखण्ड सहित कई राज्यों में दो बच्चों के सिद्धान्त का विरोध हो रहा है। 

समानता एवं स्वतंत्रता के हनन का आरोप
तर्क यह भी है कि जो कानून निर्माता विधायक और सांसद खुद पर आदर्श लागू करने के बजाय पंचायतों पर जनसंख्या नियंत्रण की जिम्मेदारी थो रहे हैं, उनके लिए शैक्षिक योग्यता ज्यादा जरूरी है। इसी तरह दो बच्चों का सिद्धान्त भी उन पर लागू हो तो लोग जनसंख्या नियंत्रण के लिये ज्यादा प्रेरित होंगे।

इस तरह की बंदिश के भेदभावपूर्ण होने तथा इनसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 21, 29, 42 एवं 47 को उल्लंघन होने के साथ ही  18 दिसम्बर 1979 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा महिलाओं के विकास एवं प्रजनन स्वास्थ्य सम्बन्धी बिल की धारा 14 एवं 16 का भी उल्लंघन होने का आरोप लगता रहा है। उत्तराखण्ड में दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर राष्ट्रीय दर 12.3 से कहीं कम 11.5 प्रतिशत है। इसी प्रकार केरल और तमिलनाडू में भी यह दर काफी कम होने के कारण वहां जनसंख्या नियंत्रण का विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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