राज्य में लगातार हुए किसान आंदोलनों से फडणवीस सरकार पर दबाव बढ़ा है।
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किसान आंदोलन बढ़ा रहा सिरदर्द
इधर राज्य में लगातार हुए किसान आंदोलनों से फडणवीस सरकार पर दबाव बढ़ा है। मराठवाड़ा और विदर्भ के किसान तो पानी के संकट से जूझ ही रहें लेकिन इस बार सरकार को उत्तर पश्चिम के किसानों ने भी घेरा है। सरकार की कोशिश होगी कि वे किसानों के अंसतोष का फायदा विपक्षियों को ना लेने दे और वोटर्स पर इसका असर ना पड़े। खास बात यह है कि राज्य के किसान आंदोलन ने एनसीपी और कांग्रेस के बीच आई दरार को भरने का काम किया है। दोनों ही पार्टियां 2019 के लोकसभा चुनावों को साथ लड़ने का फैसला कर चुकी हैं।
दलित भी हैं नाराज
उधर दूसरी ओर भीमा कोरे गांव की घटना के बाद से ही राज्य सरकार से दलित नाराज हैं। इस जातीय हिंसा से जहां राज्य सरकार को पूरे देश में घेरा गया था, वहीं राज्य का दलित समुदाय भाजपा से अब भी नाराज है जबकि विपक्षी दल कांग्रेस, एनसीपी, बीएसपी और यहां तक कि एसपी भी इस मामले को लेकर सरकार पर हमलावर रही है। बता दें कि राज्य की 288 विधानसभा सीटों में से तकरीबन 10 फीसदी से ज्यादा दलित वोटर्स हैं और एक तरह से 60 सीटों पर दलित मतदाता अपना अहम रोल प्ले करते हैं। वैसे इस बात में भी कोई दो राय नहीं कि ये 60 सीटें लोकसभा चुनाव में भाजपा को प्रभावित कर सकती हैं।
हर मामले से अपनी तरह से निपटे हैं फडणवीस
हालांकि बड़े से बड़े मामले को भी फडणवीस ने अपने तरीके से हल किया है। यही वजह है कि कई मामलों में सीएम के फैसले विपक्ष पर भारी पड़ते दिखाई दिए हैं। किसानों के सबसे बड़े आंदोलन को मुख्यमंत्री ने आश्वासन देकर मुंबई में शांत कराया था जबकि कर्जमाफी की घोषणा के बाद किसानों का आक्रोश कुछ कम करने में सफलता मिली।
हालांकि विदर्भ में किसानों की आत्महत्या अब भी गले की फांस बनी है। इसके अलावा फडणवीस ने कुछ मुद्दों पर मास्टर स्ट्रोक लगाया है। 80 के दशक में मराठा आरक्षण की मांग करते हुए कर्मचारियों के नेता अन्ना साहेब पाटिल की भूख हड़ताल के दौरान जान चली गई थी। इसके बाद जब फडणवीस सरकार के समय मुद्दा उठा, तो उन्होंने आंदोलन के बाद कहा था कि वो समाज को गिफ्ट देंगे। सरकार ने विधेयक लाकर उसे विधानमंडल में पास कराया। बड़ा दांव खेलकर मराठाओं को नौकरी और शिक्षा में 16 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला लिया गया।
हालांकि आरक्षण भाजपा के लिए एक नई मुसीबत बनता नजर आ रहा है। मराठा आरक्षण के साथ ही दूसरे समाज भी रिजर्वेशन की मांग कर रहे हैं वहीं अलग-अलग जातियों के आंदोलन से न निपट पाना सरकार के सामने अड़चन खड़ी कर सकता है। इन आंदोलनों में मुस्लिम, धनगर, जैसे कई वर्गों के साथ लाना और उनसे निपटना फडणवीस के लिए नई चुनौतियां हैं।
भाजपा चाहेगी कि राज्य में चुनाव लड़ते समय पार्टी एनडीए के घटक दलों के प्रति सॉफ्ट नजरिया अपनाए।
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शिवसेना की नाराजगी
उधर भाजपा चाहेगी कि राज्य में चुनाव लड़ते समय पार्टी एनडीए के घटक दलों के प्रति सॉफ्ट नजरिया अपनाए। विशेष रूप से भाजपा, शिवसेना की तल्खियां दूर सकती हैं। बता दें कि भाजपा ने पिछले चुनावों में पहली बार सबसे ज्यादा 124 सीटें जींती और सीएम पद को लेकर दोनों ही पार्टियों में लंबे समय तक खींचतान चली थी। नौबत पुराना गठबंधन टूटने तक आ गई थी।
बता दें कि चुनाव रुझान आते ही शिवसेना पहले ही बीजेपी को नसीहत दे चुकी है। विपक्ष की भूमिका में नजर आए शिवसेना नेता संजय राउत ने तो यहां तक कह दिया था कि राहुल गांधी तो अब नेता बन चुके हैं। उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को वन मैन आर्मी बताया और कहा कि अब भी वक्त है, बीजेपी को इन परिणामों से सबक लेने की भी जरूरत है। उधर मुंबई में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने चुनाव परिणामों पर खुशी जताते हुए, “फिर कौन होगा विकल्प?” जैसे उठने वाले सवालों को फिजूल करार दिया।
सीएम देवेंद्र के हैं कई रिकॉर्ड
बहरहाल, महाराष्ट्र में बीजेपी भले ही पहली बार सत्ता में आई हो, लेकिन देखा जाए तो पूरे 5 साल तक सरकार चलाने में फडणवीस का अच्छा खासा अनुभव रहा है। गठबंधन में शिवसेना के साथ लाख खींचतान के बावजूद फडणवीस अपना कार्यकाल लगभग पूरा करने में सफल रहे हैं। बतौर सीएम वो लगातार रिकॉर्ड बना रहे हैं। पिछले चार सालों में राज्य की 27 महानगर पालिकाओं में भाजपा के सबसे ज्यादा 1097 नगर सेवक चुनकर आए हैं। जबकि सत्ता में भागीदार शिवसेना 487 नगरसेवकों के साथ दूसरे नंबर पर हैं। इसके पहले भी फडणवीस के नाम एक और रिकॉर्ड दर्ज हुआ कि वे राज्य में ज्यादा दिन तक मुख्यमंत्री पद पर रहने वाले दूसरे सीएम बन गए। उन्होंने दिवंगत विलासराव देशमुख का भी रिकार्ड तोड़ा है।
महज 44 वर्ष की उम्र में महाराष्ट्र के 18वें मुख्यमंत्री बने सीएम फडणवीस की राहें इतनी आसान नहीं है।
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आसान नहीं होगी राहें
महज 44 वर्ष की उम्र में महाराष्ट्र के 18वें मुख्यमंत्री बने सीएम फडणवीस की राहें इतनी आसान नहीं है। सत्ता में भागीदार शिवसेना कई मुद्दों पर बीजेपी को घेरती रही, कई बार शिवसेना की तरफ से ऐसे तीखे बयान आए, लगा मानों अब गठबंधन टिकेगा भी की नहीं। जबकि इसे शिवसेना की प्रैशर पॉलिटिक्स भी माना जाता है। लेकिन वैचारिक तौर पर बीजेपी ही एक ऐसी पार्टी है, जिसे शिवसेना के करीब कहा जा सकता है। रुख में नर्मी दिखी, तो कभी बीजेपी एक कदम पीछे हटी।
चुनौतियों के बीच मुश्किलें
बहरहाल, महाराष्ट्र में विपक्ष फडणवीस के सामने कोई खास बड़ी चुनौती नहीं खड़ी कर सका है, एनसीपी-कांग्रेस भले ही साथ-साथ हों, लेकिन इन पार्टियों के मुद्दे भी अपने-अपने हैं। सहयोगी पार्टी शिवसेना की बात करें, तो उसका रुख सरकार के प्रति नरम-गरम रहा है। जैसे चुनाव करीब आ रहे हैं, नाणार परियोजना को लेकर सरकार के खिलाफ आक्रामक रही शिवसेना अब अयोध्या में मंदिर बनाने की बात करने लगी है। लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं कि एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव परिणामों ने महाराष्ट्र में भाजपा और सीएम फडणवीस दोनों को अलर्ट कर दिया है। देखना यह है कि क्या महाराष्ट्र में भी भाजपा के लिए किसानों की नाराजगी चिंता बढ़ाएगी।
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