'एक थाली और एक थैला' अभियान
'एक थाली और एक थैला' अभियान में साधु-संतों और संस्थाओं का योगदान सराहनीय रहा है। उन्होंने इस अभियान को न केवल हाथों-हाथ लिया, बल्कि ऐसी व्यवस्था की कि भक्त स्वयं थालियां को साफ करें और सुरक्षित रखकर जाएं। यही कारण है कि मेला क्षेत्र प्लास्टिक की थाली या गिलास नजर नहीं आए।
दूसरा, प्रशासन ने दोना-पत्तल, कुल्हड़ और कपड़े के थैलों को बहुत अधिक बढ़ावा दिया, जो बायोडिग्रेडेबल हैं। पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचते हैं। मेला प्रशासन ने अपनी ओर से अखाड़ों को दोना-पत्तल, कुल्हड़ और जूट-कपड़े के थैले मुफ्त में वितरित किए। सभी 25 सेक्टरों में इनके स्टॉल्स लगाए। प्लास्टिक मुक्त महाकुंभ को लेकर जनजागरुकता अभियान चलाया। पूरे मेला क्षेत्र को प्लास्टिक फ्री घोषित किया।
प्लास्टिक कचरा एक बड़ा खतरा
आज देश के आगे प्लास्टिक एक गंभीर समस्या बना हुआ है। खासकर प्लास्टिक की थाली, गिलास और चम्मच पर्यावरण को बेहद नुकसान पहुंचा रहे हैं। प्लास्टिक, जो बरसों-बरस तक डिकम्पोज नहीं होता है। इस समस्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी कई बार टिप्पणी कर चुका है, लेकिन कोई भी राह इस दिशा में नजर नहीं आ रही है, लेकिन जिस तरह से महाकुंभ में स्टील की थाली व गिलास और कपड़े के थैले ने राह दिखाई है, वो काबिलेतारीफ है।
देश इसका अनुसरण कर एक बड़ी समस्या से निजात पा सकता है। देश में हर वर्ष अरबों प्लास्टिक की थाली, गिलास, चम्मच आदि का इस्तेमाल विभिन्न अवसरों पर होता है। इनकी जगह यदि स्टील का इस्तेमाल हो तो बड़ी राहत मिल सकती है। स्टील को न केवल बार-बार प्रयोग में लिया जा सकता है, बल्कि खराब होने पर ये आसानी से रि-साइकिल भी हो जाता है।
महाकुंभ में आए करोड़ों लोगों ने इस अभियान को देखा है। निश्चित रूप से वो इससे प्रेरित हुए होंगे। आगामी दिनों में हमें शादी, भंडारों और अन्य अवसरों पर प्लास्टिक के बजाय स्टील के बर्तनों का इस्तेमाल देखने को मिल सकता है। कपड़े के थैले को लेकर अभियान देश भर में चलता रहता है। बहुत से संगठन इससे जुड़े हुए हैं, लेकिन स्टील की थाली एक क्रांतिकारी कदम साबित होने वाला है। निश्चित ही महाकुंभ से निकला यह संदेश देश भर में पहुंचेगा।
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