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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: भानू अथैया- भारत के लिए ऑस्कर लाने वाली पहली महिला

सार

जिस फिल्म के लिए भानू अथैया को 1983 का ऑस्कर मिला वह असल में एक विदेशी ने बनाई थी। जिसकी वस्त्र सज्जा का जिम्मा देश की एक स्त्री ने लिया था और उसने अपने काम से भारत का नाम विश्व में सदा के लिए ऊंचा कर दिया। ऑस्कर के इतिहास में भारत का नाम लिख दिया। फिल्म थी, ‘गांधी’ और निर्देशक थे रिचर्ड एटनबरो।
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भानू अथैया - फोटो : Twitter
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विस्तार
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भारत के लिए कितने गर्व की बात है कि ऑस्कर जैसा सम्मानित पदक पहली बार आया तो एक महिला के द्वारा आया। यह उसके डिजाइन किए वस्त्रों के लिए आया। भारत प्रतिवर्ष सैंकड़ों फिल्म बनाता है, अगर उनमें गुणवत्ता खोजने निकलेंगे तो अधिकांश समय निराशा हाथ लगेगी। जिस फिल्म के लिए भानू अथैया को 1983 का ऑस्कर मिला वह असल में एक विदेशी ने बनाई थी। जिसकी वस्त्र सज्जा का जिम्मा देश की एक स्त्री ने लिया था और उसने अपने काम से भारत का नाम विश्व में सदा के लिए ऊंचा कर दिया। ऑस्कर के इतिहास में भारत का नाम लिख दिया। फिल्म थी, ‘गांधी’ और निर्देशक थे रिचर्ड एटनबरो।

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भानू अथैया वस्त्र विन्यास करती थीं, साथ ही वे सेट डिजाइनिंग हेतु भी जानी जाती थीं। कितने दु:ख की बात है, हम अपने कलाकारों एवं उनके कार्य को संभालने में कदाचित रुचि लेते हैं। यदि आप उनकी बेटी का इंटरव्यू देखेंगे तो यह स्पष्ट होगा। देश में पदक की न तो कद्र है न ही सुरक्षा।

जब टैगोर का नोबेल पदक चोरी हो गया तो इसी के मद्देनजर भानू अथैया ने अपना ऑस्कर पदक लॉस एंजेलस के मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेस को 2012 में सुरक्षित रखने के लिए लौटा दिया, इतना ही नहीं, उन्होंने ‘गांधी’ फिल्म के समस्त कस्ट्यूम भी उन्हें सौंप दिए। उस व्यक्ति की अकूत नाजुक विरासत को संजोने कोई आगे नहीं आ रहा है, जिसने सर्वोत्तम का खिताब देश को दिलाया।
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इसके बाद उन्हें दो बार सिल्वर लोटस अवार्ड मिला फिल्म ‘लेकिन’ (1991) एवं ‘लगान’ (2002) हेतु। फिल्मफेयर ने उन्हें 2009 में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया। उन्होंने दूरदर्शन के प्रसिद्ध धारावाहिक ‘महाभारत’ की ड्रेस डिजाइनिंग की और 2014 में सर्वोत्तम कॉस्टूम का इंडियन टेली अवार्ड जीता।

हिन्दी-विदेशी फिल्मों के लिए किया कॉस्टयूम डिजाइन

28 अप्रैल 1929 को कोल्हापुर में जन्मी भानू के माता-पिता (अन्नासाहेब-शांतिबाई राजोपाध्ये) पेंटर थे और स्वयं उन्होंने जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से शिक्षा ग्रहण की, गोल्ड मेडल पाया और सदा पेंटिग करती रहीं। उन्होंने फिल्म में आने से पहले ‘ईव्स वीकली’ एवं ‘फैशन एंड ब्यूटी’ फैशन-पत्रिकाओं के लिए फैशन इल्सट्रेसन्स किए।

भानू प्रोग्रेसिव ग्रुप से भी जुड़ी थीं। वे कॉस्टूम भी हाथ से रेखांकित करती थी, क्योंकि उन दिनों कम्प्यूटर की सुविधा नहीं थी। पति गीतकार सत्येंद्र अथैया से उनकी एक बेटी है। उनकी अंतिम फिल्म ‘नागरिक’ (मराठी 2015) थी, उन्होंने सबसे पहले 1956 केलिए फिल्म ‘सीआईडी’ हेतु कार्य किया। ब्रेन कैंसर से 15 अक्टूबर 2020 उनका मुंबई में निधन हुआ। ‘दि आर्ट ऑफ कॉस्टूम डिजाइन’ उनकी लिखित किताब का नाम है, यह कॉफी टेबल बुक है। इसका दूसरा भाग वे पूरा न कर पाईं।

असल में उन्हें कभी काम मांगने कहीं नहीं जाना पड़ा। ‘ईव्स वीकली’ वालों ने जब बुटीक खोला तो वहां उन्होंने वस्त्र डिजाइन किए, इन्हीं वस्त्रों को फिल्म वालों ने देखा, कामिनी कौशल एवं नर्गिस जैसी प्रसिद्ध अभिनेत्रियां उनकी प्रशंसक और ग्राहक थीं। और इस तरह उन्हें फिल्म केलिए कॉस्ट्यूम डिजाइन करने का न्योता मिला। फिर तो उन्होंने हिन्दी, प्रादेशिक तथा विदेशी फिल्मों केलिए कॉस्टूम डिजाइन किए। उन्होंने नाटकों केलिए भी यह काम पचास वर्षों तक किया। कला जगत के लिए भले ही यह हानि थी पर फिल्म जगत को इसका लाभ मिला।

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ऑस्कर अवार्ड - फोटो : ANI

ऐतिहासिक फिल्म ‘गांधी’ और इससे संबंधित घटना

‘गांधी’ एक ऐतिहासिक फिल्म है, इसके कस्ट्यूम आप किसी स्टोर के शो रूम से उठा कर नहीं ला सकते हैं। इस फिल्म के सारे अभिनेताओं के वस्त्र उन्होंने डिजाइन किए थे, जो एक बहुत कठिन कार्य था। जब वे इसके लिए ऑस्कर लेकर लौटी तो यहां लोग उनसे पूछते, ‘आपको यह क्यों मिला है?’ यहां के लोगों को यह काम कोई विशिष्ट काम न लगता। लेकिन समारोह में अन्य प्रतियोगियों, वस्त्र विशेषज्ञों ने भानू के काम की अहमियत समझी और कहा, ‘उनका कैनवास इतना विशाल है कि उनकी तुलना में उन लोगों का काम कहीं नहीं ठहरता है।

भानू ने जब फिल्मों में कदम रखा उसके पहले निर्देशक एवं सेट डिजायनर मिल कर कुछ सोचते और दर्जी को अपनी बात समझा कर कपड़े बनवाते थे। भानू ने पूरा परिदृश्य बदल कर रख दिया। वे निर्देशक की बात ध्यान से सुनतीं, उसके अनुकल स्केच बनातीं, अभिनेताओं से मिलतीं, खुद बाजार जातीं, खरीददारी करतीं, ड्रेस बनवातीं। नतीजा हुआ सबका तनाव दूर और चरित्रानुकूल वस्त्र विन्यास तैयार। फिल्म की सफलता में वस्त्रों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

भानू अथैया को कभी किसी निर्देशक अथवा अभिनेता से कोई दिक्कत नहीं हुई। उन्होंने गुरुदत्त, राजकपूर, आशुतोष गवारिकर, रिचर्ड एटनबरो जैसे निर्देशकों एवं मीना कुमार, नरगिस, शाहरुख खान, वहीदा रहमान, मुमताज, साधना, वैजंतिमाला, आमीर खान जैसे अभिनेताओं के साथ काम किया। सब उनका सम्मान करते, उनकी कला पर भरोसा-विश्वास करते थे।

भानू अथैया को अपने काम पर गर्व था, वे बड़े विश्वास के साथ कहती थीं, ‘इस देश में मेरे काम की बराबरी कोई नहीं कर सकता है। मेरा काम सर्वोत्तम है।’ वास्तव में उनका काम सर्वोत्तम है। उस समय तक भारत में कस्ट्यूम डिजाइन पर कोई साहित्य उपलब्ध न था, अत: वे जब भी बाहर जातीं, ढ़ेर सारा साहित्य खरीद लातीं और खूब अध्ययन करतीं।

उनके पहले फिल्म के हर दृश्य में चमकीले-भड़कीले कपड़ों का चलन था, भले ही दृश्य सोग का हो। उन्होंने यह ट्रेंड बदला। कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग फैशन डिजाइनिंग नहीं होता है। यह चरित्र सृजित करने की एक कला है। भानू ने श्वेत-श्याम एवं रंगीन दोनों फिल्मों में कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग की।

वे फिल्म के अनुकूल वस्त्रों के डिजाइन हेतु खूब यात्रा भी करतीं, ‘साहेब, बीवी और गुलाम’ फिल्म हेतु कलकत्ता गईं, फिल्म ‘लगान’ हेतु इंग्लैंड गईं। जब भी मौका मिलता वे म्युजियम जाती और वहां विभिन्न काल के वस्त्रों का अध्ययन करतीं।

भानू अथैया कभी पार्टी में नहीं जाती थीं, अगर बाहर जातीं तो प्रदर्शनी या फिर फिल्म के लिए जातीं। दिन में कई घंटे जम कर अपना काम करती थीं। उनका अभिवावकों से कहना है कि वे अपने बच्चों की रुचि को पहचाने और उसके अनुकूल उन्हें काम करने दें। उनका मानना था कि हर व्यक्ति कार्य विशेष केलिए पैदा होता है, उसे यह पता करना चाहिए और अपने दिल की बात सुन कर वही कार्य करना चाहिए, ईमानदारी और लगन से करना चाहिए। फिर उनका काम बोलेगा। ठीक उस तरह जैसे भानू अथैया का काम बोलता है।



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