ऐतिहासिक फिल्म ‘गांधी’ और इससे संबंधित घटना
‘गांधी’ एक ऐतिहासिक फिल्म है, इसके कस्ट्यूम आप किसी स्टोर के शो रूम से उठा कर नहीं ला सकते हैं। इस फिल्म के सारे अभिनेताओं के वस्त्र उन्होंने डिजाइन किए थे, जो एक बहुत कठिन कार्य था। जब वे इसके लिए ऑस्कर लेकर लौटी तो यहां लोग उनसे पूछते, ‘आपको यह क्यों मिला है?’ यहां के लोगों को यह काम कोई विशिष्ट काम न लगता। लेकिन समारोह में अन्य प्रतियोगियों, वस्त्र विशेषज्ञों ने भानू के काम की अहमियत समझी और कहा, ‘उनका कैनवास इतना विशाल है कि उनकी तुलना में उन लोगों का काम कहीं नहीं ठहरता है।
भानू ने जब फिल्मों में कदम रखा उसके पहले निर्देशक एवं सेट डिजायनर मिल कर कुछ सोचते और दर्जी को अपनी बात समझा कर कपड़े बनवाते थे। भानू ने पूरा परिदृश्य बदल कर रख दिया। वे निर्देशक की बात ध्यान से सुनतीं, उसके अनुकल स्केच बनातीं, अभिनेताओं से मिलतीं, खुद बाजार जातीं, खरीददारी करतीं, ड्रेस बनवातीं। नतीजा हुआ सबका तनाव दूर और चरित्रानुकूल वस्त्र विन्यास तैयार। फिल्म की सफलता में वस्त्रों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
भानू अथैया को कभी किसी निर्देशक अथवा अभिनेता से कोई दिक्कत नहीं हुई। उन्होंने गुरुदत्त, राजकपूर, आशुतोष गवारिकर, रिचर्ड एटनबरो जैसे निर्देशकों एवं मीना कुमार, नरगिस, शाहरुख खान, वहीदा रहमान, मुमताज, साधना, वैजंतिमाला, आमीर खान जैसे अभिनेताओं के साथ काम किया। सब उनका सम्मान करते, उनकी कला पर भरोसा-विश्वास करते थे।
भानू अथैया को अपने काम पर गर्व था, वे बड़े विश्वास के साथ कहती थीं, ‘इस देश में मेरे काम की बराबरी कोई नहीं कर सकता है। मेरा काम सर्वोत्तम है।’ वास्तव में उनका काम सर्वोत्तम है। उस समय तक भारत में कस्ट्यूम डिजाइन पर कोई साहित्य उपलब्ध न था, अत: वे जब भी बाहर जातीं, ढ़ेर सारा साहित्य खरीद लातीं और खूब अध्ययन करतीं।
उनके पहले फिल्म के हर दृश्य में चमकीले-भड़कीले कपड़ों का चलन था, भले ही दृश्य सोग का हो। उन्होंने यह ट्रेंड बदला। कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग फैशन डिजाइनिंग नहीं होता है। यह चरित्र सृजित करने की एक कला है। भानू ने श्वेत-श्याम एवं रंगीन दोनों फिल्मों में कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग की।
वे फिल्म के अनुकूल वस्त्रों के डिजाइन हेतु खूब यात्रा भी करतीं, ‘साहेब, बीवी और गुलाम’ फिल्म हेतु कलकत्ता गईं, फिल्म ‘लगान’ हेतु इंग्लैंड गईं। जब भी मौका मिलता वे म्युजियम जाती और वहां विभिन्न काल के वस्त्रों का अध्ययन करतीं।
भानू अथैया कभी पार्टी में नहीं जाती थीं, अगर बाहर जातीं तो प्रदर्शनी या फिर फिल्म के लिए जातीं। दिन में कई घंटे जम कर अपना काम करती थीं। उनका अभिवावकों से कहना है कि वे अपने बच्चों की रुचि को पहचाने और उसके अनुकूल उन्हें काम करने दें। उनका मानना था कि हर व्यक्ति कार्य विशेष केलिए पैदा होता है, उसे यह पता करना चाहिए और अपने दिल की बात सुन कर वही कार्य करना चाहिए, ईमानदारी और लगन से करना चाहिए। फिर उनका काम बोलेगा। ठीक उस तरह जैसे भानू अथैया का काम बोलता है।
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