महाकुंभ में स्नान के लिए उमड़ा जनसैलाब
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रीवा तक पहुंचते उससे पहले ही टैक्सी वाले ने फोन पे पर एडवांस रिटर्न कर दिया। यह बोलकर कि रीवा हाईवे जाम है। गाड़ी से नहीं जा सकते, आप वापस इंदौर लौट जाए। सभी ने सोच रखा था कि जाएंगे तो जरूर। आखिर इंदौरी पीछे हटने वालों में से नहीं है। टिकिट रीवा तक था, लेकिन हम सतना में ही उतर गए, क्योंकि वहां से ट्रेनें ज्यादा थी। वन्दे भारत से रात साढ़े 11 बजे स्टेशन पर उतरे तो प्लेटफार्म पर बैठने की जगह नहीं मिली। तीन घंटे खड़े रहे। ट्रेन आ जा रही थी, लेकिन लोगों ने भीतर से गेट बंद कर रखे थे। तीन ट्रेनें गुजर गई,एक भी दरवाजा खुला नहीं मिला। लगा कि अब प्रयागराज नहीं जा पाएंगे। जिस प्लेटफार्म पर खड़े थे, वहां उल्टी दिशा से एक ट्रेन आकर खड़ी हो गई। खाली ट्रेन देख कर अर्पणा ने बोला कि काश इसका इंजन मुड़ जाए और ये ट्रेन प्रयागराज ले चले। पांच मिनट के बाद उसका सोचा सच हो गया।
उसी ट्रेन को लेकर अनाउंसमेंट हुआ -
जो यात्रीगण प्रयागराज जाना चाहते है' वे प्लेटफार्म नंबर तीन की ट्रेन में सवार हो जाए। वो ट्रेन हमारे सामने ही खड़ी थी। उसका दरवाजा खुला और हम ट्रेन के भीतर, लेकिन संघर्ष बाकी था। वो ट्रेन प्रयागराज नहीं गई। उसने सभी को प्रयागराज से 100 किलोमीटर पहले उतार दिया। हम फिर भीड़ भरे मानिकपुर स्टेशन पर थे। दो ट्रेन आई और गुजर गई। लोग दरवाजे पर लटक कर सफर कर रहे थे। टॉयलेट के कैबिन तक में लोग बैठे थे। एक ट्रेन रुकी। गलती से एक डिब्बे का दरवाजा खुला। बस फिर क्या था। हमने ट्रेन में जगह बना ली। धक्के मार-मारकर गेट पर छह लोगों के लिए जगह बना दी। ट्रेन चल पड़ी। तीन घंटे खड़े -खड़े सफर, फिर आ गई मंजिल। प्रयागराज की धूल ने हमारा स्वागत किया।
20 किलोमीटर पैदल चले, आस्था की डुबकी लगाई और उसी रात फिर भीड़ से भरी ट्रेनें में सवार हो गए। तीन घंटे खड़े खड़े ट्रेन के सफर के बाद सतना स्टेशन आया। रात एक बजे स्टेशन पर खाना खाया। स्टेशन पर ही रात गुजारी और सुबह छह बजे वहां से वंदे भारत ट्रेन भोपाल के लिए पकड़ी। दोपहर दो बजे भोपाल उतरे। फिर भोपाल में घूमे और इंदौर आए।
तीन रात जागने के बाद घर पर फिर उसी बिस्तर पर कमर सीधी हुई जिससे उठ कर हम तीन दिन पहले प्रयागराज के लिए निकले थे। फिर भी ये ट्रीप यादगार रही क्योंकि उत्साह था, दोस्तों का साथ था और जिद थी, जो पूरी हुई। त्रिवेणी संगम की गोद में आस्था की सुकून भरी डुबकी के अहसास को शब्दों में बांधा नहीं जा सकता।
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