अदालत से मिली पुलिस कस्टडी में मीडिया को बाइट देते पूर्व सांसद अतीक अहमद और उनके पूर्व विधायक भाई अशरफ अहमद की हत्या असल में कानून व्यवस्था की हत्या है। इसे जंगल राज कहा जाए तो किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए। जब अतीक के बेटे असद के एनकाउंटर पर ही सवाल थे, ऐसे में उमेश पाल हत्याकांड से जघन्य ये वारदात कानून, पुलिस और योगीराज पर ही बड़ा सवाल है।
गांधी के हत्यारे गोडसे लेकर मुंबई पर हमले के आरोपी अजमल कसाब तक को सुरक्षित रखा जा सका, अदालत से सजा हुई। अतीक और अशरफ को सुरक्षित नहीं रख पाना उप्र सरकार, पुलिस और तंत्र की साफ तौर पर नाकामी है। इसे किसी भी तरह न ढका जा सकता न इसकी जिम्मेदारी से बचा जा सकता।
उप्र में बीते दोनों विधानसभा और लोकसभा चुनाव में कानून व्यवस्था ही सबसे बड़ा मुद्दा था। योगी और मोदी की लगातार दो बार ताजपोशी में सबसे बड़ा योगदान उप्र की करीब 30 करोड जनता का कानून व्यवस्था के मामले में भाजपा पर भरोसे का था। यह भरोसा बीती रात के उन 40 सेकंड मे बुरी तरह हिल गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बतौर सांसद उप्र का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। वे दुनिया में भारत का प्रतिनिधित्व बाद में करते हैं, संसद में उप्र के वाराणसी का प्रतिनिधित्व पहले करते हैं।
2024 के चुनाव में मोदी बनाम ऑल करने में जुटे विपक्षी दलों को अतीक-अशरफ की हत्या और उन्हें अपनी कस्टडी में उप्र पुलिस की नाकामी से एक बड़ा मुद्दा मिल गया है।
उमेश पाल हत्याकांड के पीछे अतीक था, अतीक-अशरफ की हत्याकांड के पीछे कौन?
बीच प्रयागराज शहर में बसपा विधायक राजू पाल हत्याकांड और फरवरी में इस हत्याकांड के सरकारी गवाह उमेश पाल की पुलिस सुरक्षा में हत्या के पीछे अतीक अहमद था, लेकिन उसके और अशरफ अहमद की पुलिस कस्टडी में हत्याकांड के पीछे कौन है? इस सवाल का जितना सही, ईमानदार और त्वरित जवाब उप्र पुलिस और योगी सरकार की तरफ से आएगा, उसी पर सियासत और जनमत का रूख करवट लेगा। 2024 के चुनाव में करीब 11 महीने बाकी हैं, इस बीच आधा दर्जन राज्यों के चुनाव होने हैं, जहां से लोकसभा की करीब डेढ़ सौ सीटें आती हैं।
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