कनाडा के सिनेमा की बात चलते ही सबसे पहले वहां का खूबसूरत लोकेशन याद आता है। ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे’, ‘द केबिन इन द वुड’ आदि फिल्मों में वेंकोवर नजर आता है, तो न मालूम कितनी फिल्मों में हमने न्याग्रा जलप्रपात की फुहारों का आनंद लिया है। आईएमडीबी की मानें तो कम-से-कम 142 फिल्मों में इसे दिखाया गया है। इसी तरह कनैडियन रोकीज कई फिल्मों में दिखाई पड़ते हैं। मगर ये अधिकांशत: हॉलीवुड सिनेमा में नजर आते हैं।
कनाडा की पहली मूक फिल्म जो स्टूडियो में नहीं लोकेशन पर फिल्माई गई थी वह थी, ‘बैक टू गॉड’स कंट्री’। यह अपने समय की एक सफलतम फिल्म थी। इसमें एक बहादुर, स्वतंत्र तथा खुद को साबित करने वाली स्त्री को दिखाया गया है, जो मुसीबत में फंसे एक आदमी का उद्धार भी करती है। जेम्स फ्रीर ने प्रेइरीज में किसान के जीवन को प्रदर्शित करती फिल्म बनाई। उसी ने ‘अराइवल ऑफ सीपीआर एक्सप्रेस एट विनिपेग’ तथा ‘पैसिफिक एंड एटलांटिक मेल ट्रेन’ जैसी फिल्में भी बनाईं। ये फिल्में कैनेडियन पैसिफिक रेलवे द्वारा प्रायोजित थीं। वह इन फिल्मों को लेकर इंग्लैंड भी गया। इनकी सफलता का नतीजा हुआ, 1902 में फेडरल सरकार ने फ्रीर के एक और टूर को प्रायोजित किया।
हाल के वर्षों में कनाडा से जो फिल्में आई हैं उन्होंने सिने-विश्व का ध्यान खींचा है। 2001 में वहां के आदिवासियों को लेकर जकरियाज कुनुक ने ‘इनुक्टिटुट: द फास्ट रनर’ एक मिथिकल गाथात्मक फिल्म बनाई, इसमें मात्र बर्फ के बीच का जीवन प्रदर्शित है। इस फिल्म ने इस जीवन के प्रति दुनिया की आंखें खोल दीं। इसमें एक योद्धा अपने पूरे समुदाय को बुरी आत्मा से बचाता है। 2007 में सररियलिस्ट फिल्म मेकर गाई मैडिन ने ‘माई विनीपेग’ डॉक्यूमेंट्री-फंतासी फिल्म बनाई, जिसने समीक्षकों और दर्शकों का ध्यान खींचा।
2010 में कनाडा के लोकप्रिय निर्देशक डेनिस विलेनेउव ने ‘इंसेन्डीज’ बनाई जिसमें जुड़वां नवल मारवान तथा जीन मारवान अपने पारिवारिक इतिहास को जानने के लिए मिडिल ईस्ट की यात्रा करते हैं तथा अपनी मां की अंतिम इच्छा पूरी करते हैं। एक ऑस्कर (सर्वोत्तम अभिनेत्री: वाली ब्री लार्सन) के साथ कुल 108 पुरस्कार जीतने 2015 की करीब दो घंटे की ‘रूम’ फिल्म ऐसी ही है।
लेनी एब्राहम निर्देशित इस फिल्म में जन्म से एक छोटा लड़का जैक (जैकब ट्रैम्बले) और उसकी मां (ब्री लार्सन) अपहरण के बाद बरसों एक छोटे-से कमरे में कैद रखे जाते हैं। मां बच्चे को इस स्थान पर भी कैसे खुश रखती है, शिक्षित करती है, कैसे वे इस कैद से निकलते हैं, यह देखने और अनुभव करने की बात है।
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