हैरानी की बात यह है कि हिंदी फिल्मों में नायकों की जो जोड़ियां चर्चा में रही हैं, वो प्राय: नकारात्मक चरित्रों से सम्बन्धित ही हैं।
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शिवराज सिंह चौहान की श्याम छेनू की जोड़ी
उधर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने जब जय-वीरू की दो व्याख्याएं सामने आईं तो उन्होने तुरंत ट्रैक बदला और कमलनाथ- दिग्विजय की जोड़ी को गुलजार की यादगार फिल्म ‘मेरे अपने’ की जोड़ी ‘श्याम- छेनू’ से कर दी। ये जोड़ी भी गांव के रंगदारों की थी, जिनमें मोहल्ले पर कब्जे को लेकर प्रतिस्पर्द्धा चलती है।
ये चरित्र भी समाज के लिए नकारात्मक ही थे। इस पर कमलनाथ का पलटवार था कि शिवराजजी अपनी अदाकारी के लिए मशहूर हैं। अब नरेन्द्र तोमर भी फिल्मी पात्रों पर शोध कर रहे हैं। उन्होंने कटाक्ष किया कि अब भाजपा इमर्जेंसी मीटिंग बुलाकर तय कर ले कि इन दोनो में गब्बर है और सांभा है।
यानी मामला अब चोरी, रंगदारी से बढ़कर डाका डालने वाले चरित्रों तक पहुंच गया। चरित्र हनन के आरोप- प्रत्यारोपों के बीच भाजपा नेता और केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी सभा में जनता से पूछा कि ‘जय वीरू’ कौन थे तो जवाब आया ‘चोर थे।‘ यही नहीं एक सभा में ज्योतिरादित्य ने खुद को ऐसा काला कौआ बताया जो झूठ बोलने वाले को काटता है। उनका निशाना भी उनकी पूर्व पार्टी कांग्रेस के शीर्ष नेता थे। अब यह अलग बात है कि झूठ बोलने वाले कौव्वे का कोई इलाज शास्त्रों में नहीं बताया गया है।
हैरानी की बात यह है कि हिंदी फिल्मों में नायकों की जो जोड़ियां चर्चा में रही हैं, वो प्राय: नकारात्मक चरित्रों से सम्बन्धित ही हैं। भले ही महिमा मंडित करने के लिए बाद में उनसे सत्कर्म कराने पर दिया गया हो। मसलन फिल्म ‘विक्टोरिया नंबर 203 के किडनैपर राजा और राना की जोड़ी हो या फिर गुमशुदा करोड़पति लड़की को खोजने वाले कथित ‘दो जासूस’ धरमचंद करमचंद की जोड़ी हो। एक हिट जोड़ी फिल्म ‘छोटे मियां, बड़े मियां’ के दो पुलिस इंस्पेक्टर दोस्तों ‘अर्जुनसिंह और प्यारेमोहन’ की भी है, लेकिन उनसे अपनी तुलना कोई राजनेता नहीं करना चाहता।
अब सवाल यह है कि राजनेताओं को ‘जय- वीरू टाइप चरित्र ही क्यों भाते हैं? ऐसी दोस्तियां ही उन्हें अनुकरणीय क्यों लगती हैं? इसका राजनेताओं के मनोविज्ञान और नैतिकता से कितना और कैसा सम्बन्ध है? क्या वो जनता के मानस को बेहतर ढंग से समझते हैं और क्या जनता भी ऐसे ही चरित्रों और दोस्तियों को सत्ता सिंहासन पर विराजमान होना क्यों देखना चाहती है? और अगर ऐसे ही चरित्र समाज को स्वीकार्य हैं तो हमे राजनीति में नीतिमत्ता की बात क्यों कर करना चाहिए?
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