ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 2018 में मप्र की सीएम कुर्सी पर उन्होंने पूरी दम से अपना दावा दिल्ली दरबार मे ठोका।
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माधवराव सिंधिया ने घोषणा कर दी थी कि वह दिग्विजयसिंह का समर्थन इसलिए नही करेंगे क्योंकि वह विधायक नहीं है। उस समय अमर सिंह सिंधिया के ओएसडी हुआ करते थे उनके हवाले से वीर संघवी ने 'ए लाइफ ऑफ माधवराव सिंधिया' पुस्तक में खुलासा किया है कि अर्जुन सिंह और माधवराव सिंधिया के बीच सिंधिया को सीएम बनाने का समझौता हो चुका था, जिस दिन भोपाल में नेता चुनने के लिए विधायक दल की बैठक हो रही थी दिल्ली में एक विशेष प्लेन तैयार करके रखा गया था।
यह लगभग तय लग रहा था कि सिंधिया मप्र के सीएम होने जा रहे हैं, लेकिन अमर सिंह ने माधवराव को भोपाल नहीं जाने दिया क्योंकि उन्हें भरोसा था कि वहां जरूर कुछ गड़बड़ हो सकती है। बैठक में कमलनाथ औऱ अर्जुन सिंह ने दिग्विजयसिंह के नाम पर मुहर लगवा दी। माधवराव सिंधिया इस घटनाक्रम को जीवनपर्यंत नही भूल पाए।
पत्रकार औऱ माखनलाल चतुर्वेदी विवि के कुलपति दीपक तिवारी ने अपनी पुस्तक 'राजनीतिनामा' में लिखा है कि माधवराव सिंधिया कहा करते थे 'दो लोग मेरी जिंदगी में ऐसे हैं जिनकी विनम्रता मेरी जान ले लेती है। एक दिग्विजयसिंह औऱ दूसरी राजमाता"
असल में माधवराव सिंधिया दुश्मनी भुलाने में भरोसा रखते थे और सियासी गिले शिकवों को घर नही करते थे।1989 में भी वह मोतीलाल वोरा की जगह सीएम बनने से चूक गए थे।
बहरहाल, पिता की तुलना में ज्योतिरादित्य सिंधिया इस तरह की सियासी दरियादिली में ज्यादा भरोसा नही करते हैं। वह खुलकर सियासत करते हैं। जब मप्र के मुख्यमंत्री के उनके दावे को खारिज कर दिया गया तो वे अपने पिता की तरह चुप नहीं बैठे, बल्कि मप्र में अपनी भूमिका औऱ भागीदारी के लिए तार्किक दबाव बनाने में लगे रहे। पिछले सवा साल से वह लगातार सक्रिय रहे। कमलनाथ सरकार की नीतियों पर प्रहार करते रहे।
इधर, लोकसभा चुनाव में अपनी अकल्पनीय पराजय को उन्होंने हल्के से नहीं लिया। वह जनता से जुड़ने के लिए ज्यादा जवाबदेही से काम करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन यह भी तथ्य था कि गवर्नेंस के मोर्चे पर जनता में बदलाव का कोई अहसास नहीं हो पा रहा था। पीसीसी चीफ औऱ राज्यसभा की सीट को लेकर उनके मामले में मुख्यमंत्री और 10 जनपथ का ठंडा रवैया भी उन्हें कांग्रेस के साथ अपने भविष्य पर पुनर्विचार के लिए विवश कर रहा था।
ज्योतिरादित्य सिंधिया राज्य की सियासत में
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ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने पिता के संकोची औऱ समावेशी स्वभाव के उलट कांग्रेस को सबक सिखाने का साहस दिखा दिया। वह एक मंझे हुए 'प्रोफेशनल निगोशिएटर' भी हैं। दूसरे अन्य नेताओं की तरह वह हड़बड़ी में बीजेपी में शामिल नहीं हुए। मौजूदा राजनीति की दो सबसे ताकतवर शख्सियत नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के साथ उन्होंने अपनी नई भूमिका को निर्धारित किया। तीन दिन तक वह राष्ट्रीय मीडिया की मुख्य सुर्खी बनें रहे।
जाहिर है ज्योतिरादित्य सिंधिया बिल्कुल खुली आंख से सियासत करना जानते है। उन्होंने जिस तरह से अपने समर्थक विधायकों को अंत तक अपने साथ जोड़े रखा है वह कांग्रेस में एक चमत्कार से कम नही है।
15 साल बाद आई सत्ता से छह कैबिनेट मंत्री औऱ 22 विधायक एक झटके में सब कुछ छोड़कर सिंधिया के साथ खड़े हो गए। यह सामान्य घटनाक्रम नहीं है ऐसा तमिलनाडु की राजनीति में जरूर देखने को मिलता है। लेकिन उत्तर भारत मे यह आपवाद ही है। जाहिर है सिंधिया अपने समर्थक नेताओं पर अकाट्य पकड़ रखते हैं।
नई भूमिका में सिंधिया न केवल अपने भविष्य के लिए सुरक्षित नजर आ रहे हैं बल्कि वे बीजेपी में केंद्रीय स्तर पर आर्थिक औऱ वाणिज्य जानकारों की कमी को भी पूरा कर सकते हैं। यह भी तथ्य है कि बीजेपी का केंद्रीय विकल्प फिलहाल नजर नहीं आता है और मप्र में उनके नेतृत्व की संभावनाएं सीमित हो गईं हैं।
ऐसे मे बीजेपी की केंद्रीय राजनीति में उनका समेकन ही सबसे बेहतरीन औऱ सामयिक रास्ता था। वैसे भी उनके पोलिटिकल डीएनए में बीजेपी मौजूद थी। प्रबन्धन शास्त्र औऱ राजनीति शास्त्र की तालीम में बड़ा बुनियादी अंतर होता है। इसे समझने के लिए हमें यह पता होना चाहिए कि स्व.माधवराव सिंधिया राजनीति शास्त्र औऱ ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रबन्ध शास्त्र में मास्टर डिग्रीधारी है।
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