मप्र की सबसे बड़ी सियासी ताकत इस समय दिग्विजय सिंह के पास है और कमलनाथ ने उनके साथ आरम्भ से ही बेहतरीन युग्म बना रखा है।
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मप्र की सबसे ताकतवर शख्सियत हैं दिग्विजय सिंह
इधर, वस्तुतः मप्र की सबसे बड़ी सियासी ताकत इस समय दिग्विजय सिंह के पास है और कमलनाथ ने उनके साथ आरम्भ से ही बेहतरीन युग्म बना रखा है। अक्सर सरकार के ऊपर होने वाले सभी नीतिगत हमलों को दिग्विजय सिंह ही फेस करते हैं। उनके समर्थक विधायक और मंत्री संख्या में सबसे अधिक हैं और कभी भी उनके द्वारा कमलनाथ की सम्प्रभुता को चैलेंज नहीं किया जाता है।
दूसरी तरफ सिंधिया समर्थक मंत्री अक्सर अफ़सरशाही,वचन-पत्र से लेकर प्रदेश अध्यक्ष जैसे विषयों पर कमलनाथ के लिए मुश्किलें खड़ी करते रहे हैं।
मप्र के सियासी समीकरण में सबसे अहम फैक्टर दिग्विजय सिंह हैं और यह सर्वविदित है कि कमलनाथ को सीएम की कुर्सी सिंधिया के नाम पर दिग्विजय के वीटो से ही मिल सकी है। सिंधिया और दिग्विजय सिंह की राजनीतिक अदावत दो पीढ़ी पुरानी है।
ग्वालियर अंचल में सिंधिया परिवार के दो राजघरानों की सभ्य और संसदीय अदावत में दिग्विजय सिंह सदैव बीस साबित हुए हैं। मप्र की मौजूदा लड़ाई असल में कांग्रेस की जन्मजात गुटीय लड़ाई का ही एक पड़ाव है। कमलनाथ कभी मप्र की राजनीति में उस तरह सक्रिय नहीं रहे हैं जैसे दिग्विजय या सिंधिया।न ही उनका वैसा कोई जमीनी और कैडर आधरित जनाधार है।
राजनीतिक परिस्थितियों के चलते दिग्विजय सिंह कमलनाथ के साथ हैं और इसकी एक वजह सिंधिया को रोकना भी है। असल में सिंधिया जिस शाही आवरण के साथ सियासत करते हैं वह मप्र के दूसरे सियासी क्षत्रपों को रास नहीं आती है।
अपने पिता के उलट उनके राजनीतिक विरोधी प्रतिक्रियात्मक धरातल पर उनसे मुकाबले के लिए खड़े हो जाते हैं। गुना लोकसभा में उनकी अप्रत्याशित पराजय ने उन्हें मप्र में सत्ता विमर्श के केंद्र से बाहर सा कर दिया है, इसीलिए उनके समर्थक जिन्हें उनकी भी सहमति होती है पार्टी लाइन से परे जाकर प्रदेश अध्यक्ष के लिए लाबिंग करते रहे हैं।
सिंधिया औऱ उनके समर्थकों को लगता है की आलाकमान ने कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर गलत किया है।
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किस तरफ चल रही है प्रदेश की सियासी हवा
मप्र में इस बार कांग्रेस की वापसी में ग्वालियर चंबल की उन 34 सीटों का निर्णायक योगदान है जिनमें से 26 पर पार्टी को जीत मिली है। सिंधिया इसी इलाके का प्रतिनिधित्व करते हैं। और विधानसभा चुनावों की पूरी कैम्पेन 'अबकी बार सिंधिया सरकार' के साथ हुई थी।
ऐसे में सिंधिया औऱ उनके समर्थकों को लगता है की आलाकमान ने कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाकर गलत किया है। इस बीच लोकसभा चुनाव में हुई हार ने माहौल को औऱ खराब कर दिया है।
पिछले 7 महीने से सिंधिया अक्सर सरकार के कामकाज को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। किसान कर्जमाफी,को लेकर उनके बयान विपक्षियों की भाषा और लहजे की प्रतिध्वनि करते हैं। ताजा क्लेश अथिति शिक्षकों के नियमितीकरण का है जिसे लेकर सिंधिया ने सरकार के विरुद्ध सड़कों पर उतरने की धमकी दी।
उन्होंने पार्टी के वचनपत्र को लेकर भी कमलनाथ को कटघरे में खड़ा कर दिया। मुख्यमंत्री ने जिस तल्खी के साथ पहली बार सिंधिया को जवब दिया है वह बताता है कि पार्टी में अब गुटबाज़ी नियंत्रण से परे हो चली है।
प्रदेश के सहकारिता मंत्री गोविन्द सिंह ने तत्काल सिंधिया को सरकार के खाली खजाने का अवलोकन करने की सलाह दे डाली। इस बयान को दिग्विजय कैम्प का जवाब भी कहा जा रहा है। वहीं सिंधिया समर्थक मंत्री गोविंद राजपूत ने सागर में एक दिन पहले कर्जमाफी न कर पाने पर सिंधिया की मौजूदगी में अफसोस जताया था।
यानी मप्र में सरकार सामूहिक जिम्मेदारी के साथ भी नही चल रही है। दूसरी तरफ दिग्विजय और कमलनाथ की कैमेस्ट्री अभी भी बेहतरीन मिली हुई है। मार्च में प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों पर भी मतदान होना है।
एक सीट पर दिग्विजय सिंह का जाना तय है दूसरी पर सिंधिया की दावेदारी रोकने के लिए अब आदिवासी या ओबीसी कार्ड भी चला जा सकता है। मुख्यमंत्री नहीं चाहते हैं कि सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर सत्ता का समानान्तर केंद्र विकसित किया जाए।
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