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मप्र झाबुआ उपचुनावः बीजेपी की अंतर्कलह और कांति लाल भूरिया की जीत

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झाबुआ विधानसभा सीट के उपचुनाव की जीत मप्र की कमलनाथ सरकार के लिए संजीवनी बूटी बनाकर आई है। - फोटो : Amar Ujala
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झाबुआ विधानसभा सीट के उपचुनाव की जीत मप्र की कमलनाथ सरकार के लिए संजीवनी बूटी बनाकर आई है। स्पष्ट बहुमत के लिए एक-एक अंक के लिए तरसती कांग्रेस को इस एक सीट से बड़ी राहत मिलने वाली है। यह तय है कि कांतिलाल भूरिया की जीत से कमलनाथ सरकार के चेहरे पर कांति बढ़ेगी। उधर, कमलनाथ सरकार को गिराने के तमाम जतन करती रही बीजेपी के लिए ये हार कुछ दिन तक चुपचाप बैठने का जनादेश जैसा है।

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नवंबर 2018 के विधानसभा चुनाव में कांतिलाल भूरिया के बेटे डॉ विक्रांत भूरिया चुनाव हार गए थे। उन्हें बीजेपी के गुमान सिंह डामोर ने हराया था। तब कांग्रेस से बगावत करके जेवियर मेड़ा मैदान में थे जो विक्रांत की हार का सबब बने। उन्हें 30 हज़ार से ज्यादा वोट मिले थे। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार ज़रूर बनी, लेकिन मई में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी चारो खाने चित्त हो गई।
 

डामोर के सांसद बनने पर हुए उपचुनाव में कांति लाल फ़िर भाग्य आजमाने उतरे। - फोटो : PTI
खुद कांतिलाल झाबुआ से लोकसभा चुनाव हार गए। यह हार उन्हीं गुमान सिंह डामोर के हाथों हुई जिन्होंने विधानसभा में कांति लाल के बेटे को हराया था। भूरिया परिवार और कांग्रेस की परम्परागत सीट पर लगातार हार ने कांग्रेस और भूरिया दोनों के हौसले पस्त कर दिए थे। डामोर के सांसद बनने पर हुए उपचुनाव में कांति लाल फ़िर भाग्य आजमाने उतरे।

इस दफा बीजेपी ने अपेक्षाकृत नया चेहरा भानू भूरिया पर दांव लगाया। 'भूरिया वर्सेस भूरिया' के इस संग्राम में बड़े भूरिया का पूरा राजनैतिक जीवन दांव पर लगा था। इस दफ़ा हार जाते तो शायद उनके करियर पर ब्रेक लग जाता। 

अक्टूबर '19 में झाबुआ का चुनावी नज़ारा नवंबर '18 की सर्दियों से बिल्कुल उलट था। तब कांग्रेस के बागी जेवियर मेड़ा ताल ठोककर कांग्रेस के पंजे को मरोड़ रहे थे तो इस बार बीजेपी के बागी कल्याण सिंह डामोर कमल की पंखुडियां नोंच रहे थे। जेवियर को कांग्रेस ने मना लिया सो इस बार वे कान्तिलाल के साथ रहे लेकिन कल्याण को बीजेपी नहीं मना सकी। वैसे कल्याण सिंह नाममात्र के ही वोट पा सके।
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झाबुआ में सिर्फ छह महीने में विधानसभा और लोकसभा दोनो जीतने वाली बीजेपी इस बार बड़े फासले से हार गई है। - फोटो : Facebook
शीर्ष नेताओं में अंतर कलह से हारी बीजेपी
झाबुआ में सिर्फ छह महीने में विधानसभा और लोकसभा दोनो जीतने वाली बीजेपी इस बार बड़े फासले से हार गई है। कमलनाथ सरकार बनने के अगले दिन से ही उसे गिराने में जी जान से जुटी बीजेपी के लिए यह करारा झटका है। पिछला चुनाव हारने के बाद से ही बीजेपी में गुटबाजी तेजी से उभरी है। शिवराज सिंह विरोधी खेमा उन्हें हर मौके पर हाशिए पर ठेलने की कोशिश करता है।

यही नहीं पार्टी कमलनाथ सरकार के खिलाफ आंदोलन तक में पार्टी एकजुट नहीं दिखाई देती। झाबुआ में प्रचार के दौरान भी नेता अपनी ढपली अपना राग से बाज नहीं आए। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने झाबुआ में कह दिया कि यहां जीतते ही शिवराज फ़िर मुख्यमंत्री बन जाएंगे। इस पर उन्हें आला कमान की फटकार भी पड़ी।

कुल मिलाकर बीजेपी अब तक नवंबर 2018 की हार को पचा नहीं पाई है। सबल विपक्ष की भूमिका में आने की बजाए सरकार बनाने की कोशिशों में लगी पार्टी को इस हार के बाद अपने तौर-तरीकों पर भी विचार करना होगा।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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