कमलनाथ खुद सिंधिया को तो उपमुख्यमंत्री बनाने पर राजी थे लेकिन...
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क्या भाजपा में पहली दफा एमपी में उप मुख्यमंत्री बनेंगे?
कांग्रेस की तरह जाहिर तौर पर चिन्हित गुटबाजी न होते हुए भी भाजपा में हमेशा दो गुट बने रहने का एमपी में इतिहास है। कभी पटवा-सारंग गुट हुआ करता तो उमा भारती-कैलाश जोशी गुट भी हाेता था। मप्र में जनता सरकार में मुख्यमंत्री रहे वीरेंद्र कुमार सखलेचा का राजनीतिक पराभव और वर्तमान में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष पूर्व मंत्री विक्रम वर्मा का सियासी पराभव भी भाजपा की गुटबाजी का ही परिणाम रहा है।
ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं फिर भी भाजपा में गुटबाजी उतनी मुखर और प्रभावी नहीं रही जितनी कांग्रेस मं रहती आई है। लेकिन सियासत में मूलत: कांग्रेसी ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में आने और उनके साथ 22 विधायकों का भी विधायकी त्यागकर भाजपा मेंं आना, जिनमें आधा दर्जन पूर्व मंत्री भी शामिल हैं, जो दशकों से कांग्रेस में थे, भाजपा में वर्तमान में स्पष्ट रूप से सिंधिया गुट के रूप में सामने है। माना यह जा रहा है कि सिंधिया कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद जिस बात पर अड़े थे और जिसकी पूर्ति नहीं होने पर अंतत: 14 महीने बाद कमलनाथ सरकार का पतन हो गया, वे भाजपा में भी वही मांग पूरी करवाने के लिए बजिद हैं।
कमलनाथ खुद सिंधिया को तो उपमुख्यमंत्री बनाने पर राजी थे लेकिन वे उनके किसी समर्थक विधायक को डिप्टी सीएम बनाने पर तैयार नहीं हुए और कांग्रेस ने कमलनाथ की मान ली थी, सिंधिया डिप्टी सीएम बनने राजी नहीं हुए तो उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी नहीं बनाया गया। इसे उन्होंने अपमान की तरह लिया और करीब सवा साल बर्दाश्त भी किया। तो क्या भाजपा सिंधिया के किसी समर्थक पूर्व मंत्री को शिवराज का डिप्टी सीएम बनाने पर राजी होगी? यही वो सवाल है जिसके जबाव में मंत्रिमंडल का गठन अटका हुआ है।
क्या शिवराज इस पर राजी होंगे?
अगर शिवराज को यह मानने के लिए राजी होना पड़ा तो भाजपा एक और डिप्टी सीएम बनाने पर विचार कर सकती है लेकिन क्या शिवराज इस पर राजी होंगे? अगर हो भी गए थे तो वह कौन होगा? इसे लेकर भी पार्टी के अंत:पुर से लेकर कोरोना संकट से सन्नाटे में डूबे सियासी गलियारों में राजनीतिक प्रेक्षक कयासबाजी के कंकड़ फेंककर हलचल पैदा कर रहे हैं। कमलनाथ सरकार के वक्त में नेता प्रतिपक्ष रहे भाजपा के वरिष्ठतम विधायक पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव, शिवराज सरकार में हमेशा संकटमोचक की भूमिका में रहे और भाजपा विधायक दल के मुख्य सचेतक, कमलनाथ सरकार के तख्ता पलट के प्रमुख सूत्रधार नरोत्तम मिश्रा के नाम इस दूसरे डिप्टी सीएम की संभावना में लिए जा रहे हैं।
अगर ऐसा हुआ तो शिवराज के दो संभावित डिप्टी में यह दूसरा नाम ही पहली पायदान पर होगा। सिंधिया गुट से चर्चा में वही नाम है जो कमलनाथ को रास नहीं आया था, पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तुलसीराम सिलावट। सिलावट सिंधिया के खास सिपहसालार तो हैं ही भाजपा के अखंड 15 साल के दौरान भी विधायक रहे और महज सवा साल ही मंत्री रह सके।
देखना यह है कि मंत्रिमंडल के गठन में क्या फार्मला काम करता है, सिंधिया के समर्थक छह पूर्व मंत्री जो अब विधायक तक नहीं हैं, उनमें से कितने मंत्री शामितल होंगे? डिप्टी सीएम पद मिला तो कितने? नहीं मिला तो कितने? अधिकतम तीस मंत्री बनने की गुंजाइश के बावजूद कोरोना काल में फिलहाल कितने मंत्री होंगे और बाद में विस्तार की कितनी गुंजाइश रखी जाएगी। अब तक की शिवराज सिंह चौहान की कार्यशैली और संतुलन की उनकी कोशिश से ऐसा लगता है कि वे अपने लिए सुभीते का फैसला करवाने में सफल होंगे।
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