मैंने उस दौर में विज्ञान की दहलीज पर कदम रखा था, जब एक अश्वेत महिला का इंजीनियर बनना महज एक सपना नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ खुली बगावत थी। जब मैंने ‘नेशनल एडवाइजरी कमेटी फॉर एयरोनॉटिक्स (नाका, वर्तमान में नासा) की दुनिया में कदम रखा, तो मेरे चारों तरफ केवल संख्याएं, डाटा और जटिल गणनाएं थीं। मेरा काम था हवा के रहस्यों को सुलझाना और इन्सानी उड़ानों को नई ऊंचाई देना।
बतौर इंजीनियर मेरे लिए गणित सिर्फ कागज पर लिखे अंक नहीं, बल्कि कुदरत की वह गुप्त जुबान थी, जिसमें हवाएं बात करती हैं और आसमान अपने रहस्य खोलता है। पर, एक कड़वा सच भी मेरे सामने था। मैं मशीनों को तो आसमान की ऊंचाइयां छूना सिखा रही थी, लेकिन समाज ने मेरे ही रास्ते में कई अदृश्य दीवारें खड़ी कर रखी थीं।
जब मुझे 60,000 हॉर्सपावर वाली सुपरसोनिक विंड टनल में प्रयोग करने की जिम्मेदारी मिली, तो मैंने ध्वनि की गति से भी तेज भागती हवा के मिजाज को परखा। पर, हवा के प्रचंड वेग को नापते हुए मैंने एक गहरा सच भी जाना कि तकनीक का कोई भी चमत्कार तब तक बेमानी है, जब तक वह समाज की संकीर्ण सोच को पीछे न छोड़ दे। मेरे लिए विज्ञान का मतलब सिर्फ रॉकेटों को अंतरिक्ष में भेजना कभी नहीं था।
मेरे लिए उसका असली मतलब था, उन दीवारों को पहचानना और तोड़ना, जिन्हें इन्सानों ने खुद अपने साथी इन्सानों के लिए बनाया है। सुपरसोनिक विमान आसमान की हदों को चुनौती दे सकते हैं, डाटा हवा के रुख को नाप सकता है, पर समाज में न्याय, बराबरी और गरिमा कायम करने के लिए सिर्फ दिमाग नहीं, अथाह साहस चाहिए।
मशीनें उड़ान का रास्ता तराश सकती हैं, पर उस खुले आसमान में उड़ने का हक हर एक इन्सान को बराबरी से मिले, यह तय करना सिर्फ और सिर्फ हमारे हाथों में है।