मेरे पिताजी हर स्थिति में सबसे बुरे की कल्पना कर लेते हैं, चाहे वह वास्तविक हो या काल्पनिक। थेरेपिस्ट सोचने के इस तरीके को कैटास्ट्रोफाइजिंग (हर बात की सबसे बुरी कल्पना करना) कहते हैं। पिताजी घर आने पर हर चीज की बारीकी से जांच करते हुए गंभीर अंदाज में चेतावनी देते हैं। उनका एक पसंदीदा जुमला है, ‘यह तुम्हारा अंत साबित होगा।’ तनाव में मेरी भी चिंताएं बढ़ने लगती हैं, लेकिन मैं उन पर काबू पाने के लिए प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ. मार्टिन सेलिगमैन का तरीका अपनाती हूं।
डॉ. मार्टिन सेलिगमैन ने जीवन की कठिनाइयों को समझने के लिए तीन महत्वपूर्ण पहलू बताए हैं, स्थायित्व, व्यापकता और नियंत्रण क्षमता। दरअसल, हमारा दिमाग सकारात्मक घटनाओं की तुलना में नकारात्मक घटनाओं पर ज्यादा ध्यान देता है। इसलिए, परेशानियां लंबे समय तक याद रहती हैं और लगता है कि वे कभी खत्म ही नहीं होंगी। हाउ ए लिटल बिकम्स ए लॉट के लेखक एरिक जिमर कहते हैं कि कई बार एक गलती या बुरा अनुभव हमें महसूस कराता है कि हमारी पूरी जिंदगी बर्बाद हो गई है।
ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि मुश्किल वक्त में हम परेशानी पर इतना ध्यान देते हैं कि वह जटिल दिखाई देने लगती है, जबकि जरूरी यह है कि हम थोड़ा पीछे हटकर पूरी तस्वीर देखें। इस संदर्भ में, जिमर ने अपना उदाहरण देते हुए बताया कि पहले उनका व्यवसाय था, जो बाद में बंद हो गया। ऐसे में, उन्हें लगने लगा कि वह असफल इन्सान हैं। पर, जब उन्होंने खुद से पूछा कि क्या इससे उनका जीवन असफल हो गया, तो उन्हें एहसास हुआ कि असफल तो व्यवसाय हुआ है, न कि वह खुद। डॉ. सेलिगमैन भी कहते हैं कि किसी कठिन परिस्थिति को स्वीकार करने के बाद खुद से पूछना चाहिए कि मैं क्या कर सकता हूं? इसलिए, जो चीजें आपके नियंत्रण में हैं, उन्हें पहचानिए। ज्यादातर स्थितियों में कुछ न कुछ ऐसा जरूर होता है, जिसे आप ढूंढ सकते हैं। वहीं, जिमर कहते हैं कि किसी चुनौती को ‘पहेली’ की तरह देखें। इससे दिमाग को एहसास होता है कि उस समस्या का हल जरूर होगा, बस उसे खोजने की जरूरत है।
तनाव और चिंताओं से पूरी तरह बचना संभव नहीं है, लेकिन सही नजरिया अपनाकर हम इन्हें अपने ऊपर हावी होने से रोक सकते हैं। यदि हम खुद से सही सवाल पूछें, तो समझ सकते हैं कि कौन-सी चिंता वास्तव में गंभीर है और कौन केवल दिमागी डर। कई बार समाधान की शुरुआत सोच बदलने से ही शुरू हो जाती है।