उत्तराखण्ड का 84.37 प्रतिशत क्षेत्र पहाड़ी है जहां प्रदेश की 48 प्रतिशत जनसंख्या रहती है।
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छोटे संसदीय क्षेत्र का व्यापक प्रभाव
भौतिक आकार के हिसाब से देखा जाए तो हरिद्वार संसदीय क्षेत्र राज्य का सबसे छोटा संसदीय निर्वाचन क्षेत्र है जिसका क्षेत्रफल मात्र 3114.6 वर्ग किमी है जबकि 18,40,732 मतदाताओं वाला यह क्षेत्र मतदाताओं की दृष्टि से राज्य का सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र है। जब सबसे छोटे निर्वाचन क्षेत्र में राज्य के सबसे अधिक मतदाता हों और वहां का मतदान प्रतिशत भी सबसे अधिक मतदान में दूसरे स्थान पर हो तो कल्पना की जा सकती है कि मतदाताओं का हल्का सा भी झुकाव किसी भी राजनीतिक दल के लिए बहार ला सकता है।
आकार में 17820.9 वर्ग किमी वाला पौड़ी गढ़वाल सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र है जबकि वहां मतदाताओं की संख्या हरिद्वार से कहीं कम 13,55,776 ही है। अल्मोड़ा में राज्य के सबसे कम 13,37,803 मतदाता है जबकि उसका क्षेत्रफल 14,536.61 वर्ग किमी है। उत्तराखण्ड का 84.37 प्रतिशत क्षेत्र पहाड़ी है जहां प्रदेश की 48 प्रतिशत जनसंख्या रहती है।
इसी तरह प्रदेश का 15.63 प्रतिशत भाग मैदानी है जहां प्रदेश की 52 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। लोकतंत्र बहुमत के आधार पर चलता है और इस हकीकत को ध्यान में रखते हुए पहाड़ और मैदान में राजनीतिक शक्ति के सन्तुलन का आकलन सहज ही किया जा सकता है।
टिहरी और नैनीताल में भी मैदान भारी
उत्तराखण्ड के जो संसदीय क्षेत्र पहाड़ी नजर आ रहे हैं वहां भी राजनीतिक सन्तुलन मैदान की ओर झुका हुआ है। अक्सर पहाड़ और मैदान के मतदाताओं के मिजाज में अन्तर आ जाता है। मसलन पहाड़ सैन्य बाहुल्य होने के कारण इस चुनाव में वहां राष्ट्रवाद और देश की सुरक्षा के नाम पर मोदी लहर चली जबकि मैदानी इलाके में सोशियल इंजिनीयरिंग और अल्पसंख्यक वौट बैंक भुनाने का प्रयास हुआ, इसलिए कांग्रेस ने कम से कम नैनीताल और टिहरी क्षेत्र से उम्मीद बांधी हुई थी।
नैनीताल संसदीय क्षेत्र का नाम सुनते ही इस निर्वाचन क्षेत्र के इतिहास भूगोल से अनभिज्ञ लोगों के दिलो दिमाग में नीली खूबसूरत पहाड़ी झीलें और सुरम्य वादियां तैरती होंगी, लेकिन इसका अधिकांश भाग मैदान में ही है। इस क्षेत्र की असली राजनीतिक शक्ति हल्द्वानी, जसपुर, काशीपुर, बाजपुर, गदरपुर, किच्छा, सितारगंज, नानकमत्ता एवं खटीमा जैसे अधिक मतदाताओं वाले मैदानी विधानसभा क्षेत्रों में निहित है। कांग्रेस के हरीश रावत इन्हीं बहुजातीय एवं बहुधर्मी विधानसभा सीटों के बलबूते हरिद्वार छोड़ कर नैनीताल सीट पर पहुंचे थे।
लोकसभा चुनाव 2019 (फाइल फोटो)
यह वही संसदीय क्षेत्र है जहां से 1991 में नारायण दत्त तिवारी चुनाव हार गये थे और इस हार के कारण देश के प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए थे। उस समय इसमें बहेड़ी विधानसभा क्षेत्र भी था जो कि अब यूपी के बरेली जिले में है। इस हार का तिवारी जी को शेष जीवनभर मलाल रहा।
टिहरी संसदीय क्षेत्र भी कहने को तो पहाड़ी लगता है, लेकिन इस सीट पर सारा दारोमदार देहरादून जिले विकासनगर, सहसपुर, रायपुर, देहरादून कैंट एवं मसूरी विधानसभा क्षेत्रों पर निर्भर माना जाता है। वर्ष 2007 के उप चुनाव में तथा 2009 के आम चुनाव में विजय बहुगुणा देहरादून की इन्हीं विधानसभा सीटों पर बढ़त के चलते चुनाव जीते थे। इस बार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह को इसी गणित के आधार पर इस निर्वाचन क्षेत्र से लड़ाया गया। उनके लिए विधानसभा की उनकी अपनीे विधानसभा सीट चकराता तथा जौनसारी जनसंख्या बाहुल्य विकासनगर को बोनस के तौर पर कांग्रेस ने माना था।
Lok Sabha Election 2019
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पहाड़ों से राजनीतिक शक्ति का क्षरण
आजादी के बाद देश में विधानसभा एवं लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों का भारत में पहला परिसीमन 1951 में हुआ था। उसके बाद 1962, 1973 और 2006 में परिसीमन हुआ। नवीनतम 2006 का परिसीमन परिसीमन अधिनियम 2002 के तहत गठित जस्टिस कुलदीप सिंह आयोग द्वारा किया गया।
उत्तराखण्ड इतिहास में पहला उदाहरण है जहां एक साल के अंतर में दूसरी बार निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन का निर्णय लिया गया। नवम्बर 2000 में इस राज्य के अस्तित्व में आने के बाद पहला चुनाव कराने के लिए यहां 2001 में परिसीमन हुआ था, जिसके आधार पर राज्य के पहले विधानसभा चुनाव 2002 में कराए गए। लेकिन उसी दौरान संसद में परिसीमन आयोग के गठन के लिए परिसीमन अधिनियम 2002 पारित हो गया जिसमें उत्तराखण्ड को भी शामिल कर दिया गया जबकि प्रदेश की जनता इसके खिलाफ थी।
वर्ष 2001 का परिसीमन 1971 की जनगणना के आधार पर हुआ था और 2002 में गठित आयोग ने 2006 में 2001 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कर दिया। जनसंख्या के आधार पर परिसीमन से पलायन के कारण पहाड़ की सीटें घटनीं ही थीं।
जस्टिस कुलदीप सिंह आयोग ने पहाड़ की विशिष्ट परिस्थितियों को देखते हुए उस समय की 84 लाख जनसंख्या के आधार पर एक विधानसभा क्षेत्र के लिए 1,21,276 जनसंख्या का आधारभूत पैमाना तय करने के बाद पहाड़ के लिए 10 प्रतिशत जनसंख्या कम कर वहां के लिए एक विधानसभा सीट के लिए कम से कम 1,09,148 मतदाताओं का और मैदान की सीटों के लिए 10 प्रतिशत बढ़ाकर कम से कम 1,33,404 मतआताओं की एक सीट का पैमान तय किया। लेकिन इसके बावजूद पहाड़ से 6 सीटें घट गईं जो कि मैदान के खाते में आ गईं। इस प्रकार पहाड़ में विधानसभा की 34 और मैदान में 36 सीटें आ गईं।
परिसीमन में चमोली, पिथौरागढ़, बागेश्वर एवं अल्मोड़ा जिले में 1-1 सीट तथा पौड़ी जिले में में 2 सीटें घट गयीं। जबकि मैदान में देहरादून तथा नैनीताल (मैदानी क्षेत्र में) 1-1 तथा उधमसिंहनगर और हरिद्वार में 2-2 सीटें बढ़ गयीं। अब 2026 में परिसीमन होना है और जनसंख्या के आधार को शिथिलता नहीं दी गयी तो पहाड़ की राजनीतिक शक्ति का और अधिक क्षरण हो जायेगा तथा वहां विधानसभा सीटों की संख्या 27 और मैदान में 41 हो जाएगी
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