अखिलेश यादव भी डॉ. अंबेडकर के सम्मान में बिछे-बिछे जा रहे हैं।
- फोटो : फोटोः कमाण्डर अर्जुन सिंह भदौरिया की आत्मकथा नींव के पत्थर से साभार
प्रतीकात्मक राजनीति का दौर और माया-अखिलेश
बहरहाल, चूंकि यह प्रतीकात्मक राजनीति का दौर है और ऐसे में अगर मायावती "जय भीम-जय लोहिया" कर रही हैं और डॉ. अंबेडकर को कथित तौर पर अपरोक्ष रूप से भूमाफिया कहने वाले मोहम्मद आजम खां के बयान का “महापुरुषों के ठेकेदार हर तरफ घूम रहे हैं” कहकर बचाव करते अखिलेश यादव भी डॉ. अंबेडकर के सम्मान में बिछे-बिछे जा रहे हैं, तो इसे आप राजनीति की मजबूरी कह सकते हैं, लेकिन इस मजबूरी की तुलना भाजपा-पीडीपी गठबंधन से नहीं कर सकते।
सपा-बसपा गठबंधन की घोषणा के बाद कहीं कोई खबर पढ़ी थी, जिसका तात्पर्य था कि जिस गठबंधन को करने से डॉ. लोहिया और डॉ. अंबेडकर चूक गए थे उसे माया-अखिलेश ने किया है। तो यहां यह बताना जरूरी हो जाता है कि डॉ. लोहिया का पूरा प्रयास था कि राष्ट्रीय स्तर पर डॉ. अंबेडकर की रिपब्लिकन पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी का संयुक्त मोर्चा बन जाए, परंतु डॉ. अंबेडकर के निधन के कारण यह मोर्चा परवान न चढ़ सका था न कि किसी विवाद के कारण।
डॉ. लोहिया ने रिपब्लिकन पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी का संयुक्त मोर्चा बनाने की दिशा में काम करने के लिए बाकायदा अपने दो अनन्य सहयोगियों मधु लिमये और कमाण्डर अर्जुन सिंह भदौरिया को नियुक्त किया था। कमाण्डर अर्जुन सिंह भदौरिया ने अपनी आत्मकथा नींव के पत्थर में विस्तार से इस पर चर्चा की है।
डॉ. लोहिया और डॉ. अंबेडकर में पत्र व्यवहार होता रहा।
- फोटो : पीटीआई
एक किताब करती है तस्दीक
नींव के पत्थर में कमाण्डर अर्जुन सिंह भदौरिया पृष्ठ 111 पर लिखते हैं– “डॉ. लोहिया का 1952 तक पार्टी पराजय के बाद से ही प्रयास था कि डॉ. अंबेडकर भारतीय राजनीति से जुड़कर सामाजिक परिवर्तन की संपूर्ण शक्तियों का नेतृत्व करें। डॉ. लोहिया का प्रयत्न और प्रयास था कि डॉ. अंबेडकर किसी एक जाति विशेष (शूद्रों) के नेता न रहकर संपूर्ण समाज का नेतृत्व करें।”
वह लिखते हैं, “हैदराबाद से डॉ. लोहिया ने डॉ. अंबेडकर को 10 सितंबर 1955 को मैनकाइण्ड मासिक पत्रिका में लिखने तथा साथ में ही सोशलिस्ट पार्टी के सम्मेलनों में विशेष आमंत्रित सदस्य की हैसियत से सम्मिलित होने का आग्रह किया।
डॉ. लोहिया और डॉ. अंबेडकर में पत्र व्यवहार होता रहा, लेकिन जब बात की, तब तक डॉ. अंबेडकर का 1956 में निधन हो गया।” कमाण्डर साहब लिखते हैं कि यदि डॉ. अंबेडकर जीवित रहते तो दो महापुरुषों की यह जोड़ी अगले दस वर्षों में भारतीय राजनीति की धारा किधर मोड़ देती इसकी कल्पना मुश्किल है।
साथियों के साथ डॉ. लोहिया।
- फोटो : फाइल फोटो
अपनी आत्मकथा में कमाण्डर साहब ने हैदराबाद से 1 जुलाई 1957 को मधु लिमये को लिखे पत्र को भी शामिल किया है। इस पत्र में लोहिया लिखते हैं,
“मैं हमेशा भारत के हरिजनों से एक जरूरी बात करने की कोशिश करता रहा हूं जो मेरे लिए बुनियादी बात है। डॉ. अंबेडकर और जगजीवनराम दो अलग तरह के हिन्दुस्तानी हरिजन हैं। डॉ. अंबेडकर पढ़े-लिखे थे, वह ईमानदार थे, साहसी और स्वतंत्र नेता थे। उन्हें दुनिया के सामने आधुनिक भारत की एक शख्सियत के तौर पर पेश किया जा सकता था, लेकिन वह कटुता और अकेलपन से ग्रस्त हो गए थे। वह गैर-हरिजनों के नेता बनने को तैयार ही नहीं थे।”
लोहिया का पत्र और समाजवाद
इसी पत्र में डॉ. लोहिया लिखते हैं-
“मैं, 5 हजार वर्ष की पीढ़ी को समझ सकता हूं और हरिजनों पर उसके प्रभाव को। मैं सोचता था कि एक दिन डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महान भारतीय इस स्थिति के ऊपर अवश्य उठ जाएंगे, लेकिन मृत्यु ने उन्हें जल्दी घेर लिया।” पत्र के अंत में डॉ. लोहिया लिखते हैं, “मेरी इच्छा है कि भारत की अनुसूचित जातियां भारतीय राजनीति के पिछले चालीस चालों का जायजा ठीक से लें। मैं चाहता हूं कि वह आदरणीय प्रतीक के रूप में अपने सामने डॉ. अंबेडकर को रखें और उनका अनुसरण करें, उनके स्वतंत्र चेतन से प्रेरणा लें, लेकिन उनकी कटुता को छोड़ दें ताकि डॉ. अंबेडकर को समूचे भारत के नेता के तौर पर याद किया जाए, सिर्फ हरिजनों के नहीं।”
हालांकि पंडित नेहरू के व्यक्तिगत विरोध में डॉ. लोहिया जिस गैर-कांग्रेसवाद के ध्वजवाहक बने उस गैर-कांग्रेसवाद ने सबसे ज्यादा ऊर्जा संघ परिवार को दी और सबसे ज्यादा अहित वंचितों-पिछड़ों का ही किया। गैर-कांग्रेसवाद के नाम पर जनसंघ से डॉ. लोहिया के मेलमिलाप के मधु लिमये घोर विरोधी रहे।
डॉ. अंबेडकर के बाद भी सोशलिस्ट पार्टी का पिछड़े वंचितों के लिए संघर्ष जारा रहा।
- फोटो : अमर उजाला
डॉ. अंबेडकर के बाद भी सोशलिस्ट पार्टी का पिछड़े वंचितों के लिए संघर्ष जारी रहा। राजस्थान के सीकर में गनेश्वर तालाब में एससी के लोगों के स्नान पर प्रतिबंध था। कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया ने 12 सितंबर 1961 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को पत्र लिखकर कहा कि हरिजनों पर इस तालाब में लगा प्रवेश पर लगा प्रतिबंध देश के संविधान के विरुद्ध और मानवता के लिए कलंक है।
आप अपने प्रधानमंत्रित्व काल में इस कलंक को गांधी जयंती के पर्व पर 2 अक्टूबर 1961 को बाबू जगजूवनराम वरिष्ठ मंत्री तथा राजस्थान के कुछ हरिजनों को लेकर गनेशवर तालाब में स्नान करके मानवता पर लगे इस कलंक को धो डालिए।
कमांडर साहब स्वयं रामसेवक यादव (सांसद और लोहिया जी के नजदीकी) के साथ दो अक्टूबर 1961 को गनेश्वर तालाब पहुंचे और वंचितों और शोषित समुदाय से आने वाले लोगों के साथ स्नान किया। बाबू जगजीवनराम ने कमांडर साहब को पत्र लिखकर कहा कि आप वास्तव में किसी दल विशेष के कमांडर नहीं, बल्कि सही अर्थों में संपूर्ण शोषित, एससी समाज के कमाण्डर हैं।
बाद में अपनी आत्मकथा लिखते वक्त जब 1993 में कमांडर साहब ने पुराने दस्तावेजों को इकट्ठा किया तब मालूम पड़ा कि पं.नेहरू ने 2 अक्टूबर 1961 को गनेश्वर तालाब पर सभी सुरक्षा के आदेश राजस्थान सरकार को दिए थे और 7 किलोमीटर के भीतर सभी हथियार जमा करा लिए गए थे।
मुलायम सिंह यादव और अर्जुन सिंह भदौरिया
बहरहाल, प्रसंग से हटकर इस घटना का उल्लेख इसलिए कि एससी समाज को मुख्यधारा में बराबरी का स्थान मिले इसके लिए सरकारी स्तर पर सभी बंदोबस्त भले ही कांग्रेस ने किए, लेकिन जमीन पर मोर्चा डॉ. लोहिया के साथियों ने ही लिया।
यहां यह बताना भी जरूरी है कि मुलायम सिंह यादव को राजनीति में लेकर आने का श्रेय डॉ. लोहिया के इन्हीं साथी कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया को जाता है। पहली बार जब इटावा से कांशीराम, मुलायम सिंह यादव के सहयोग से सांसद बने तब कहीं न कहीं मुलायम सिंह के मन-मस्तिष्क में अपने राजनैतिक गुरु कमाण्डर साहब की सीख भी रही होगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.