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1 मई मजदूर दिवसः अधिकार और न्याय की जंग में कब होगी जीत?

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मजदूरों का किसी भी देश के विकास एवं उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान होता है। - फोटो : अमर उजाला
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मजदूरों का किसी भी देश के विकास एवं उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान होता है। मजदूरों के बिना किसी भी देश में औद्योगिक ढांचे के निर्माण की कल्पना करना संभव नहीं है। मजदूर सभी कामों की धुरी होने के साथ मानवीय श्रम का आदर्श उदाहरण भी होते हैं।

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मजदूर कड़कड़ाती सर्दी, भीषण गर्मी व मूसलाधार बरसात जैसे कठिन से कठिन हालात में पसीना बहाते हैं और अपना श्रम बेचकर न्यूनतम मजदूरी प्राप्त करते हैं। मजदूरों के हिस्से में कभी कोई छुट्टी नहीं होती। रोज कुआं खोदकर प्यास शांत करना ही उनका नित्य क्रम है। एक तरह से मेहनत का नाम ही मजदूर है। 

मजदूरों के संघर्ष की कहानी 
मजदूरों का यह संघर्ष हमें 1886 को अमेरिका में देखने को मिलता है। जहां के मजदूरों ने संगठित होकर काम की अधिकतम समय सीमा 8 घंटे तय करने की मांग की थी। अपनी यह मांग मनवाने के लिए उन्होंने हड़ताल का सहारा लिया और इसी हड़ताल के दौरान एक अज्ञात शख्स ने शिकागो के हेय मार्केट में बम फोड़ दिया। पुलिस ने गलतफहमी में मजदूरों पर गोलियां चला दीं जिसके कारण 7 मजदूरों की जान चली गई।
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इस रक्तरंजित घटना के बाद मजदूरों की मांग मान ली गई और उनके काम की समय सीमा अधिकतम 8 घंटे तय कर दी गई। इस ऐतिहासिक विजय की याद एवं अपने हक के लिए कुर्बान हुए मजदूरों के स्मरण में हर साल 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जाता है। इसे मई दिवस भी कहा जाता है। इन सब के साथ यह दिवस मजदूरों की निष्ठा, लगन, परिश्रम व कर्तव्यपरायणता को दर्शाता है।

मजदूरों के साथ शोषण और अन्याय की घटनाएं ब्रिटिश काल की यातनाओं से कम तकलीफदेह नहीं है।
भारत में कब हुई मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत 
भारत में मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत 1 मई 1923 को चेन्नई में हुई थी। साल 2012 के आंकड़ों के अनुसार भारत में मजदूरों की कुल संख्या 4 करोड़ 87 लाख है, जिनमें 94 प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र के हैं।

देश में मजदूरों की बड़ी संख्या जाहिर करती है कि मशीनी क्रांति के बाद भी मजदूरों की महत्ता कम नहीं हुई है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि आज भी भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में मजदूरों के लिए काम करने की अधिकतम 8 घंटे की समय सीमा का कानूनी प्रावधान लागू होने के बाद भी मजदूरों के साथ शोषण और अन्याय की घटनाएं ब्रिटिश काल की यातनाओं से कम तकलीफदेह नहीं है।

संगठित और असंगठित क्षेत्र के मजदूर 
इसका कारण है कि देश में संगठित क्षेत्र के मुकाबले असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की संख्या अधिक होने के कारण कोई भी इनका शोषण कर लेता है। ज्यादातर मजदूर अनपढ़ और आर्थिक रूप से असक्षम होने के कारण अपने शोषण व अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के बजाय जो हो रहा है उसे चुपचाप सहन कर लेते हैं। 

ग्रामीण अंचलों में देहाती मजदूर से 12 घंटे तक काम करवाया जाना देश में मजदूर संबंधित कानून का हनन है और 12 घंटे काम के बदले केवल 8 घंटे की मजदूरी देना मजदूरों के साथ खुल्लम खुल्ला अन्याय है। ऐसे हालात में मजदूरों को बहुत ही बेकार जिंदगी जीने को विवश होना पड़ता है, उनके बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और पूरी तरह से बालिग होने से पहले ही अपने अभिभावकों के साथ मजदूरी के कामों में हाथ बटाने लग जाते हैं। यहीं से बाल मजदूरी की शुरुआत होती है, जो कि एक जघन्य अपराध के दायरे में आती है।

न्याय और अधिकार की जंग में जीत की आस 
भले ही देश में संविधान का अनुच्छेद-23 भारत के प्रत्येक नागरिक को शोषण और अन्याय के खिलाफ लड़ने का अधिकार देता हो व बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम 1976 कमजोर वर्गों के आर्थिक एवं वास्तविक शोषण को रोकने की वकालत करता हो, लेकिन हकीकत यह है कि पर्याप्त जागरूकता के अभाव में देश में बंधुआ मजदूरी व मजदूरों के साथ शोषण का दौर अभी थमा नहीं है। 
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आज भी 1500 से 2000 रुपए के मासिक वेतन पर मजदूरों का शोषण किया जाता है। - फोटो : अमर उजाला
आज भी 1500 से 2000 रुपए के मासिक वेतन पर मजदूरों का शोषण किया जाता है। ये सही है कि प्रधानमंत्री जन-धन योजना की शुरुआत होने के बाद नरेगा जैसी सरकारी योजनाओं का वेतन सीधे खाते में आने के कारण बिचौलियों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है, लेकिन असंगठित क्षेत्र में अभी भी ऐसी पहल का इंतजार है।

हमें सोचना होगा कि अंतरिक्ष में छलांग लगाने वाले भारत जैसे देशों में आज भी मजदूर भूखे, नंगे और बेहाल जिंदगी जीने को मजबूर हैं तो यह हमारे लिए बेहद ही शर्मनाक है। आवश्यकता है कि सरकार को मजदूरों के शोषण के खिलाफ कानून के क्रियान्वयन और उल्लंघन को लेकर कार्रवाही में तेजी लानी होगी। 

बंधुआ व बाल मजदूरी के अभिश्राप से समाज को मुक्त कराने के लिए निर्णायक भूमिका का निर्वहन करना होगा, जो आज समय की मांग है। मजदूरों को शोषण के खिलाफ लड़ने और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए जागरूक ही नहीं करना होगा बल्कि उन्हें यह विश्वास दिलवाना होगा कि ऐसा करने से उनके रोजगार पर किसी भी तरह का विपरीत असर नहीं पड़ेगा। 
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
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