इस बार न तो जयललिता चुनाव लड़ रही हैं और न करुणानिधि हैं।
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बता दें तमिलनाडु में भाजपा ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम के साथ गठबंधन करके कुल 5 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। हालांकि इस चुनाव में दक्षिण के सुपरस्टार अभिनेता रजनीकांत सीधे तौर पर तो नहीं उतरे हैं, लेकिन उन्होंने अपनी प्रकृति के अनुकूल एआईएडीएमके-भाजपा गठबंधन को अपना मौन समर्थन दिया है। लिहाजा दक्षिण के इस अति प्रभावशाली राज्य में एनडीए का पलड़ा भारती लगता है।
यहां लोकसभा की कुल 39 सीटें हैं और 38 सीटों पर चुनाव कराए जा रहे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि कम से कम 18 से लेकर 20 सीटों पर एनडीए गठबंधन की जीत होगी जबकि भाजपा 5 सीटों में से 3 सीटों पर विजयी हो सकती है।
क्यों रोचक है तमिलनाडु की लड़ाई?
तमिलनाडु में इस बार का चुनाव इसलिए भी रोचक है क्योंकि यहां इस बार न तो जयललिता चुनाव लड़ रही हैं और न करुणानिधि हैं। दोनों नेताओं की मृत्यु हो चुकी है। दोनों ही नेता चमत्कारी व्यक्तित्व के लिए जाने जाते थे। दोनों की पृष्टभूमि एक ही राजनीतिक चिंतन की थी, लेकिन एक-दूसरे के खिलाफ जिंदगीभर राजनीति में वे उलझे रहे। अब दोनों के रिक्त स्थानों को उनके समर्थक भरने का प्रयास कर रहे हैं।
एक ओर जहां करुणानिधि के योग्य पुत्र स्टालिन ने पिता के विरासत को संभाल लिया है तो दूसरी ओर जयललिता की विरासत में अभी तक कोई कद्दावर नेता नहीं मिल पाया है जो अम्मा की जमीन को बचाकर रख सके। इसलिए ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही है कि आने वाले समय में इस कमी को रजनीकांत जैसे चमत्कारी अभिनेता पूरी कर सकें।
दक्षिण में कर्नाटक को छोड़कर किसी भी राज्य में भाजपा की स्थिति अच्छी नहीं है
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कर्नाटक के अलावा कहां है भाजपा?
वैसे दक्षिण में कर्नाटक को छोड़कर किसी भी राज्य में भाजपा की स्थिति अच्छी नहीं है और 20 फीसद वोट के आंकड़े से भाजपा बहुत दूर है। बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा को केरल में 10.30 फीसद, तमिलनाडु में 5.50 फीसद, आंध्र प्रदेश में 8.50 फीसद और तेलंगाना में 8.50 फीसद वोट मिले थे। इन चारों राज्यों में लोकसभा की 101 सीटें हैं और भाजपा को मात्र 3-4 सीटें मिली थीं। केरल में भाजपा का खाता तक नहीं खुला था, जबकि आंध्र प्रदेश व तेलंगाना में उसका तेलुगू देशम के साथ व तमिलनाडु में छोटे क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन से चार सीटें मिल पाईं थीं।
इस बार भाजपा ने तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक व अन्य दलों के साथ मजबूत गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ रही है, लेकिन वह 5 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है। आंध्र प्रदेश व तेलंगाना में भाजपा अकेले दम पर चुनाव लड़ रही है। बीते चुनाव में दोनों राज्यों में भाजपा को 10 फीसद से भी कम वोट मिलने से पार्टी को इस बार मजबूत क्षेत्रीय दलों ने भी ज्यादा अहमियत नहीं दी है। केरल में भाजपा ने स्थानीय दलों से गठबंधन किया है, लेकिन राज्य के दो मजबूत गठबंधनों, यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) एवं सत्तारूढ़ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) के बीच एनडीए को जगह बनाने में थोड़ी कामयाबी मिलती दिख रही है।
केरल में अन्य दक्षिण के प्रांतों के विपरीत भाजपा को पिछले चुनाव में 10.30 प्रतिशत वोट मिले थे। इस बार भाजपा के नेताओं का दावा है कि उसने केरल में त्रिकोणीय संघर्ष की पृष्टभूमि तैयार कर दी है। भाजपा के नेताओं का दावा है कि केरल के कुल 20 संसदीय सीटों में से कम से कम एनडीए 5 पर अपनी जीत दर्ज कराएगी। भाजपा के दावों में कितना सच है यह तो समय बताएगा लेकिन भाजपा और उसके गठबंधन दलों ने प्रदेश में एक नए प्रकार के समीकरण का निर्माण तो कर ही दिया है।
सरकार बनाने में दक्षिण की भूमिका
कुल मिलाकर देखें तो लोकसभा चुनाव 2019 से पहले के तमाम सर्वेक्षणों ने यही माना है कि केंद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश और बिहार में उतनी सीटें नहीं मिल पा रही है जितनी सीटें 2014 के चुनावों में वह जीती थी। साथ ही उन राज्यों में भी बीजेपी को शत-प्रतिशत सीटें नहीं मिलने की संभावनाएं जताई जा रही हैं जहां उसने 2014 में सभी सीटों पर अपनी जीत का परचम लहराया था।
ऐसे में 23 मई को लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आने के बाद यदि किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला तो केंद्र में सरकार के गठन को लेकर देश के तीन अलग अलग राज्यों के तीन नेता बड़ा किरदार निभा सकते हैं। जिसकी पृष्ठभूमि तैयार होने लगी है।
विधायकों की संख्या मे कांग्रेस से आगे रही भाजपा (फाइल फोटो)
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ये नेता हैं ओड़िसा के नवीन पटनायक, आन्ध्र प्रदेश के जगन मोहन रेड्डी और तेलंगाना के केसीआर। दो नेता दक्षिण के प्रांतों के हैं जबकि एक पश्चिमी भारत के महत्वपूर्ण राज्य से आते हैं। आपको बता दें कि आंध्र प्रदेश में कुल 25 हैं जबकि तेलंगाना में लोकसभा की 17 सीटें हैं। स्थितियां ऐसी बन रही है कि इन दोनों राज्यों से अच्छी संख्या में ऐसे सांसद चुनकर आ रहे हैं जो एनडीए की मनोवृति के अनुकूल साबित होंगे। ऐसे में नरेन्द्र मोदी का प्लान भी सफल होता दिख रहा है।
लिहाजा चुनाव के बाद यदि किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिला तो 17वीं लोकसभा का गठन बहुत हद तक दक्षिण के सांसदों पर निर्भर करेगा। लोकसभा चुनाव 2019 में अब तक बीजेपी, कांग्रेस और राज्य स्तर पर बने महागठबंधन (अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों का गठजोड़) के बीच मुकाबला दिख रहा है, लेकिन ये तीन दल अब तक किसी भी धड़े के साथ नहीं खड़े हुए हैं।
याद रहे जब इस साल के जनवरी महीने में ममता बनर्जी ने महागठबंधन के दलों का कोलकाता में शक्ति प्रदर्शन किया था तो उस समय भी ये तीन नेता कन्नी काट गए थे। ऐसे में चुनाव परिणाम बाद एनडीए में कुछ और दलों के प्रवेश की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। साथ ही इस सत्र में दक्षिण का वर्चश्व बढ़ने की पूरी संभावना है।
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