एनआरआई महिलाएं सोशल साइट्स पर बहुत एक्टिव हैं।
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क्या कहती हैं स्वीडन की महिलाएं?
10 साल पहले स्वीडन आकर बस चुकी उर्वशी कहती हैं- आज हमारे यहां महानगरों में भी महिलाएं अंधेरे में घर से बाहर अकेली निकलने में कतराती हैं। ज्यादा ज़रूरी हुआ तो उन्हें घर के किसी पुरुष या विश्वासपात्र जानने वाले का सहारा लेना पड़ता है। वे कहती है कि सालों से यहां बराबरी के हक के साथ रह रही हैं। कभी अंधेरे सुनसान जगह या सड़कों पर मर्दों की टोली से डर नहीं लगा। लेकिन भारत में तो स्थिति इतनी बदतर हो गई है कि लोग राह चलते,भरे बाज़ार में महिलाओं की इज़्ज़त को तार तार कर देते हैं और प्रशासन कुछ नहीं कर पाता।
यह भी मैंने एक न्यूज़ वेबसाइट पर ही पढ़ा है। वे कहती हैं कि वतन से दूर अपनी तीन बेटियों के साथ यहां रहना कई मौक़ों पर खलता है। लेकिन जैसे हालात रोज़ पढ़ने और सुनने के मिलते हैं उससे वहां जाकर उनकी परवरिश करने में जोखिम ज्यादा लगता है। क्या पता कब कोई अनहोनी घटना हो जाए ? कम से कम यहां आज़ादी और समान हक के साथ लड़कियां अपने लिए रास्ता तो तैयार कर पा रही हैं।
एनआरआई महिलाएं मानती हैं कि बेशक भाजपा सरकार ने अपने कार्यकाल में दूसरे मुद्दों पर ध्यान दिया और बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन महिलाओं की सुरक्षा और समानता को लेकर पिछली सरकार का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है।
ज़्यादातर महिलाओं ने मोदी सरकार की औसत रेटिंग की है।
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क्या रही मोदी सरकार के बारे में राय?
इस आधार पर ज़्यादातर महिलाओं ने मोदी सरकार की औसत रेटिंग की है। उन्होंने मांग किया है कि अगर भाजपा को दोबारा केंद्र में आने का मौक़ा मिले तो वे इस मुद्दे को गंभीरता से लें। जबकि महिला सुरक्षा का मुद्दा केंद्र में आने वाली किसी भी पार्टी की प्राथमिकता में होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए असुरक्षित माहौल केकारण उनमें से ज़्यादातर महिलाओं को देश में अकेली सफ़रकरने से डर लगता है। एक अधेड़ उम्र की भारतीय महिला ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि भले ही उनकी उम्र ज्यादा हो चुकी है, लेकिन राजधानी दिल्ली में अकेले रहने और रात में अकेली सफ़र करने के बारे में सोचना भी मुश्किल लगता है। इस वजह से वे अपनी 18वर्षीय बेटी को अकेली भारत घूमने नहीं जाने दे रही हैं।
वे मानती है कि राजनीतिक दल आम जनता से वादे तो बहुत करते हैं लेकिन उसे ईमानदारी से पूरा नहीं करपाते। ज़्यादातर महिलाओं ने कहा कि मोदी सरकार में महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे को छोड़ दिया जाए तो दूसरे वादों को 60 फ़ीसदी तक निभाया है। लेकिन 40 फ़ीसदी काम अधर में ही रह गए। अल्पसंख्यक औरएलजीबीटीक्यू के लिए अब भी देश में माहौल बेहतर नहीं हुआ है।जिनपर ध्यान देना सामाजिक समानताके लिहाज़ से ज़रूरी है।
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