भाजपा और आरएसएस ने बीते तीन दशकों से विभिन्न जातियों में हिंदू एकता का जो नरेटिव बनाया है, उसकी विपक्षी दलों के पास एक ही काट है कि हिंदू समाज को जाति विभाजन के मुद्दे पर लौटाया जाए।
- फोटो : Amar Ujala
जाति का मुद्दा और चुनावी सियासत
तीसरा और बड़ा गेमचेंजर मुद्दा जातिगणना का है। यह मु्ख्य रूप से पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के तहत आने वाली जातियों से सम्बन्धित है और इससे मिलने वाले आंकड़े सीधे तौर पर आरक्षण व्यवस्था को प्रभावित करेंगे। इस देश में ओबीसी की सही-सही संख्या कितनी है, यह अभी भी बहस का विषय है। क्योंकि पिछली जनगणनाओं में ओबीसी की गिनती अलग से नहीं की गई थी।
भाजपा और आरएसएस ने बीते तीन दशकों से विभिन्न जातियों में हिंदू एकता का जो नरेटिव बनाया है, उसकी विपक्षी दलों के पास एक ही काट है कि हिंदू समाज को जाति विभाजन के मुद्दे पर लौटाया जाए। इसकी शुरुआत बिहार से जाति सर्वे के रूप में हो चुकी है। कहने को यह ‘सर्वे’ है, लेकिन वास्तव में जातिगणना ही है। इसका मूल मकसद आरक्षण की राजनीति को फिर से केन्द्र में लाना है, जिसे धार्मिक ध्रुवीकरण ने पीछे ठेल दिया था।
अगर ओबीसी की संख्या कुल हिंदू समाज की पचास फीसदी या उससे अधिक पाई गई तो देश में नौकरी व शिक्षण संस्थाओं में ओबीसी के लिए आरक्षण की सीमा 27 फीसदी से ज्यादा करने तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए अधिकतम 50 फीसदी आरक्षण के फैसले को पलटवाने की रणनीति पर काम होगा। जिससे अगड़ी जातियों की राजनीतिक, सामाजिक हिस्सेदारी और कम होगी। जातीय हितों का संघर्ष और तेज होगा। हालांकि, बीते तीन दशकों में ओबीसी जातियों के संदर्भ में दो उल्लेखनीय पैटर्न देखने में आए हैं।
पहला तो यह कि ओबीसी अब हिंदुत्व की सबसे बड़ी झंडाबरदार हैं और दूसरा ये कि ओबीसी में भी कम पिछड़े, अति पिछड़े का ध्रुवीकरण तेजी से हो रहा है। जस्टिस रोहिणी आयोग की रिपोर्ट बता ही चुकी है कि पिछड़ों में चंद जातियों ने आरक्षण का सर्वाधिक लाभ उठाया है। इसका एक अर्थ यह है कि ये चुनिंदा जातियां सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और राजनीतिक रूप से वो अगड़ी जातियों के समकक्ष आ गई हैं। ऐसे में भविष्य में इन जातियों को आरक्षण के दायरे से बाहर करने की मांग भी उठ सकती है।
इस बीच भाजपा और आरएसएस ने विभिन्न राज्यों में अति पिछड़ी जातियों को नए सिरे से गोलबंद किया है। सत्ता संघर्ष में इनमें से ज्यादातर भाजपा के साथ खड़ी होंगी। यानी कि जाति संघर्ष का तीसरा दौर शुरू होगा। कुछ ऐसी ही स्थिति दलितों में भी बन रही है। जहां आरक्षण के बावजूद हाशिए पर रही जातियां नए सिरे अपने अधिकारों को लेकर लामबंद हो रही हैं।
कांग्रेेस की दशा और दिशा क्या होगी?
इस दृष्टि से कांग्रेस के पास कोई ठोस रणनीति नहीं है। कभी वह जातिगणना के साथ है तो कहीं देश जोड़ने की बात करती है। कभी वह आम आदमी के मुद्दे उठाती है तो कभी खुद को असली हिंदू बताने लगती है। हालांकि, राहुल गांधी जो संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं, वो सौजन्य, संवाद और निरअंहकारिता का है। लेकिन चुनाव में इन मुद्दों की भूमिका सीमित है। वैसे विपक्षी पार्टियों को लगता है कि देश में जातिगणना की मांग उठाकर वो भाजपा के हिंदुत्व के अस्त्र की धार को भोंथरा कर सकती हैं। भाजपा भी इस मुद्दे की नजाकत को समझ रही है। यही कारण है कि जातिगणना पर एकाधिकार का अपना स्टैंड केन्द्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट में बदलना पड़ा।
मोदी सरकार के दूसरे हलफनामे में कहा गया कि ‘अनजाने’ में पहले हलफनामे में लिखा गया कि जातिगणना केन्द्र सरकार का अधिकार है। यानी राज्य भी ऐसा कर सकते हैं। बिहार के बाद अब दूसरे गैर भाजपा शासित राज्यों में भी चुनावी वादे के रूप में यह मुद्दा उठ रहा है। आश्चर्य नहीं कि लोकसभा चुनाव के पहले खुद प्रधानमंत्री ही पूरे देश में जातिगणना का एलान कर दें। अगर ऐसा हुआ तो विपक्ष के हाथ से एक मुद्दा और निकल जाएगा। अभी तक के घटनाक्रम से एक बात साफ है कि भाजपा को दूसरो के मुद्दे हाईजैक करने में कोई संकोच नहीं है। अगर मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनावों की ही बात करें तो कांग्रेस ने पहले 5 गारंटियों से चुनाव अभियान की शुरुआत की थी।
उनमें ज्यादातर को कमोबेश भाजपा ने अपनी घोषणाओं और फैसलों में शामिल कर लिया है। अब फर्क केवल वादे और उस पर अमल का रह गया है। कांग्रेस अब 11 वचनों की बात कर रही है तो सत्तारूढ़ शिवराज सरकार ने घोषणाओं पर अमल शुरू कर घर घर तक रेवड़ी बांटना शुरू भी कर दिया है। पार्टी का मानना है कि पैसा मिलने का वादा और हाथ में पैसा आने में जमीन आसमान का फर्क है। लोग किस पर ज्यादा भरोसा करेंगे, देने के वादे पर या देने वाले पर?
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।