माना जाता है कि पसमांदा समाज के लोग देश के लगभग 18 राज्यों में हैं।
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क्या है इतिहास?
पसमांदाओं के लिए सामाजिक न्याय हासिल करने के लिए आंदोलन, आजादी से पहले की अवधि में ही शुरू हो चुका था। उस समय जुलाहा (बुनकर) समुदाय से आने वाले अब्दुल कय्यूम अंसारी और मौलाना अली हुसैन असीम बिहारी इस आंदोलन के अग्रणी नेता थे और इन्होंने मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक राजनीति का विरोध किया था। इसकी शुरुआत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जिन्ना के ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ का विरोध करने के लिए मोमिन कांफ्रेंस बनाकर की गई थी।
इसके बाद, 1980 के दशक में, महाराष्ट्र के अखिल भारतीय मुस्लिम ओबीसी संगठन ने इस समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी थी। इसी के बाद महाराष्ट्र में अधिकांश पसमांदा मुस्लिमों को ओबीसी सूची में शामिल किया गया था। 90 के दशक में डॉक्टर एजाज अली (आल इंडिया बैकवर्ड मुस्लिम मोर्चा), अली अनवर (आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज), और शब्बीर अंसारी ने अपने-अपने संगठनों के माध्यम से इस आंदोलन को बल दिया था।
क्या हैं राजनीतिक मायने?
माना जाता है कि पसमांदा समाज के लोग देश के लगभग 18 राज्यों में हैं। यूपी, बिहार, राजस्थान, तेलगांना, कर्नाटक, मध्य प्रदेश में इनकी संख्या अधिक है। सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश में है। हर विधानसभा सीट पर इनकी उपस्थिति अच्छी खासी संख्या में है, जिनमें करीब 44 जातियां जैसे राइनी, इदरीसी, नाई, मिरासी, मुकेरी, बारी, घोसी शामिल हैं।
आंकड़ों के हिसाब से यह वोट बैंक लोकसभा की सौ से अधिक सीटों पर अपना प्रभाव रखता है। जनसंख्या के आधार पर देखें, तो असम और बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या 25-30 प्रतिशत, बिहार में करीब 17 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में करीब 20 प्रतिशत, दिल्ली में भी 10-12 प्रतिशत, महाराष्ट्र में करीब 12 प्रतिशत है, केरल में 30 प्रतिशत संख्या मुस्लिम समुदाय की है। बीजेपी मुस्लिम समुदाय के उस वर्ग पर फोकस करने की कोशिश कर रही है जो आमतौर पर विपक्षी दलों का वोट बैंक है।
बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में दूसरी बार सत्ता में आने के बाद पसमांदा मुसलमान दानिश अंसारी को जगह देकर इसके संकेत भी दिए। यही नहीं, इसके बाद, मोदी कैबिनेट के बड़े मुस्लिम चेहरे मंत्रिमंडल से गायब हो गए और उन्हें दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा गया।
गौरतलब है कि यूपी-बिहार के विधानसभा चुनाव में सोशल एक्सपेरिमेंट के जरिए जिस तरह से बीजेपी ने गैर-यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों के बीच घुसपैठ की थी उसी के तहत एक कोशिश यहां भी बीजेपी करती दिख रही है।
इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि जैसे योगी सरकार से मिले लाभों की वजह से देवबंद जैसी सीटों पर कुछ मुस्लिम वोट भी बीजेपी को मिले हैं। बीजेपी की पूरी कोशिश है कि समुदाय के एक बड़े हिस्से का वोटबैंक हासिल किया जाए।
क्या है पसमांदा समुदाय की मांग?
देशभर के पसमांदा मुसलमानों के संगठन ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज ने प्रधानमंत्री मोदी को एक चिट्ठी लिखकर क़रीब दर्जन भर ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति का दर्ज़ा देने की अपनी पुरानी मांग को दोहराया है। उनकी यह मांग पुरानी है लेकिन बीजेपी के पसमांदा मुसलमानों के बीच पैठ बनाने की कोशिशों को देखते हुए उन्होंने एक बार फिर इस मांग को उठाया है.उनका दावा है कि अगर सरकार की दिलचस्पी वाकई पसमांदा मुसलमानों का भला करने में है तो उनकी पुरानी मांग को माना जाए।
उन्होंने कहा है कि उन्हें एससी का दर्जा मिले क्योंकि उनका पेशा वही है जो हिंदू दलितों का है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के ताजा आंकड़ों के मुताबिक लगभग 45 फ़ीसदी मुसलमानों को ओबीसी का लाभ मिलता है.जानकारों की मानें तो बिना इस मांग को स्वीकार किए।
पसमांदा मुसलमानों का बीजेपी के साथ जाना थोड़ा मुश्किल है। वहीं, बीजेपी के कुछ नेता यहां तक कह रहे हैं कि पसमांदा को एससी का दर्जा दे देने पर एससी-एसटी एक्ट के मामले बढ़ सकते हैं। वे दबी जुबान में यह बात भी कह रहे हैं कि कुछ जातियों को एससी का स्टेटस देने पर धर्म-परिवर्तन के मामले भी बढ़ सकते हैं।
बीजेपी के बड़े नेताओं की मानें तो इस समुदाय को साथ लाना बीजेपी के लिए राजनीतिक मजबूरी नहीं बल्कि सशक्त भारत के उसके संकल्प के लिए जरूरी है। एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है जब देश का कोई भी तबका वंचित न रहे और पसमांदा के विकास पर जोर देना, ‘सबका साथ-सबका विकास’ वाली रणनीति का ही हिस्सा है।
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