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ओडिशा से ग्राउंड रिपोर्टः क्या चुनाव जीतने के मास्टर प्लान में सफल होंगे मोदी-शाह?

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ओडिशा में चुनावी जंग सिर्फ दिल्ली के लिए नहीं भुवनेश्वर के लिए भी लड़ी जा रही है। - फोटो : अमर उजाला
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भारत के पूर्वी राज्य ओडिशा में चुनावी जंग सिर्फ दिल्ली के लिए नहीं भुवनेश्वर के लिए भी लड़ी जा रही है। खनिज संसाधनों से भरपूर इस अमीर राज्य में भाजपा, बीस सालों से सता पर काबिज बीजू जनता दल को कड़ी टक्कर दे रही है। ओडिशा के लोग सिर्फ नरेंद्र मोदी के भाग्य का फैसला नहीं कर रहे, बल्कि नवीन पटनायक के भाग्य का भी फैसला करने वाले हैं। वे मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री दोनों के लिए वोट कर रहे हैं। 

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कहां है मोदी लहर और भाजपा? 
ओडिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ और भी बढ़ा है। ग्रामीण इलाकों में मोदी और शंख (बीजू जनता दल के चुनाव चिन्ह) की बात हो रही है। हालांकि प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद के लिए अभी भी नवीन पटनायक ही जनता की पहली पसंद है। निश्चित तौर पर भाजपा मजबूती से विधानसभा औऱ लोकसभा लड़ रही है और पार्टी को कोई चमत्कार होने की उम्मीद है। हालांकि विधानसभा में पटनायक परंपरा को मात देना मुश्किल है। हालांकि कांग्रेस की अपनी चमक है लेकिन वैसी नहीं है जैसी हाल ही में गुजरात, मप्र और छत्तीसगढ़ या राजस्थान जैसे चुनावों में थी। 

ओडिशा में क्या है सीटों की स्थिति?  क्यों बढ़ा है बीजेपी का आत्मविश्वास? 
प्रदेश की जनता चार चऱणों में 147 विधानसभा और 21 लोकसभा क्षेत्रों में अपने प्रतिनिधियों को चुनने के लिए वोटिंग कर रही है। इस समय प्रदेश के 147 सदस्यों वाली विधानसभा में बीजू जनता दल के पास 117 सीटें है। प्रदेश में बहुमत के लिए 74 सीटों की जरूरत होती है। जबकि 2014 में हुए लोकसभा चुनवों में प्रदेश की कुल 21 सीटों में से 20 सीटें बीजू जनता दल ने जीतीं थीं। जबकि 1 सीट भाजपा ने जीती थी।
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दरअसल, 2017 में हुए पंचायत चुनावों में भाजपा के 300 से ज्यादा सीटें जीतने के बाद भाजपा का मनोबल बढ़ा हुआ है। पार्टी को लगता है कि प्रदेश के ग्रामीण इलाको में भाजपा की पकड़ पहले से मजबूत हो गई है।

दो परिवारों का पिछले पचास सालों से वर्चस्व
ओडिशा की राजनीति काफी दिलचस्प है और यहां  बेशक बीजू जनता दल, भाजपा और कांग्रेस का नियंत्रण दिखाई देता है। राज्य की राजनीति पर लंबे समय से कुछ परिवारों का कब्जा है और उसमें बीजू पटनायक के परिवार का असर आज भी है। वहीं विपक्ष की राजनीति करने वाली कांग्रेस भी कुछ परिवारों के प्रभाव में रही है। कांग्रेस में लंबे समय तक प्रभावी रहे स्वर्गीय जानकी वल्लभ पटनायक के परिवार का दबदबा आज भी ओडिशा में है। उनके दामाद सौम्य रंजन पटनायक बीजू जनता दल के साथ हैं।

बता दें कि सौम्य रंजन पटनायक एक बड़ा अखबार निकालते हैं और उनके भाई निरंजन पटनायक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं। भाजपा फिलहाल परिवारों की राजनीति से मुक्त है, पर इसमें बीजू जनता दल के कुछ मजबूत अमीर राजनेता प्रवेश कर गए हैं। बीजद के मजबूत उद्योगपति नेता विजयंत पंडा भाजपा की टिकट पर केंद्रपाड़ा से चुनाव लड़ रहे हैं। जबकि भाजपा के ओडिशा से सबसे बड़े चेहरे धर्मेंद्र प्रधान की स्थिति प्रदेश में काफी कमजोर है। ओडिशा के लोग कुछ राजनीतिक परिवारों को अपना भगवान मानते रहे हैं। इन राजनीतिक परिवारों में कुछ लोग राजघरानों से भी संबंध रखते रहे हैं। 

ओडिशा की राजनीति पर दो पटनायक परिवारों का कब्जा लंबे समय तक रहा। - फोटो : Twitter
क्या है नवीन पटनायक की स्थिति? 
ओडिशा की राजनीति पर दो पटनायक परिवारों का कब्जा लंबे समय तक रहा। नवीन पटनायक बीस साल से लगातार मुख्यमंत्री हैं। उनके पिता बीजू पटनायक कई साल तक उड़ीसा के मुख्यमंत्री रहे। वहीं कांग्रेस नेता स्वर्गीय जानकी वल्लभ पटनायक 14 सालों तक ओडिशा के मुख्यमंत्री रहे।

बीजू पटनायक के बेटे नवीन पटनायक अभी भी उड़ीसा की जनता में लोकप्रिय हैं, हालांकि वे ठीक से उड़िया नहीं बोल पाते हैं। अभी भी वे प्रदेश विधानसभा के चुनाव में मजबूत दिख रहे हैं। बेशक लोकसभा की सीटों पर नरेंद्र मोदी का असर दिख रहा है, पर विधानसभा की सीटों पर नरेंद्र मोदी समर्थक भी नवीन पटनायक को अपनी पहली पसंद बता रहे हैं। मुख्यमंत्री के तौर पर नवीन पटनायक ही उड़ीसा की जनता की पहली पसंद हैं। उडिया लोगों का एक ही तर्क है, अगर दिल्ली में नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है तो उडीसा में भी नवीन पटनायक का कोई विकल्प नहीं है।

भाजपा क्यों चाहती है ओडिशा को जीतना?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा का फोकस फिलहाल ओडिशा पर बहुत ज्यादा है। भाजपा को आशंका है कि 2019 लोकसभा चुनावों में हिंदी भाषी राज्यो में भाजपा को नुकसान होगा। भाजपा इस घाटे की पूर्ति ओडिशा और बंगाल से करना चाहती है, लेकिन भाजपा की बेचैनी विधानसभा में बहुमत को लेकर भी है। भाजपा मोदी के सहारे विधानसभा पर भी कब्जा चाहती है। विधानसभा में कब्जे को लेकर भी भाजपा ने पूरा जोर लगा दिया है। 

ओडिशा में जातीय समीकरण और राजनीति
ओडिशा में जाति और धर्म राजनीति में महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि प्रदेश की 94 प्रतिशत आबादी हिंदू है। 2 प्रतिशत आबादी मुस्लिम और 3 प्रतिशत आबादी ईसाई है। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी ओडिशा में प्रचार के दौरान पिछड़ेपन और गरीबी पर बात करते-करते आतंकवाद और बालाकोट की बात करने लगते हैं। हालांकि वे ओड़िशा की खराब स्वास्थ्य सेवाएं और खराब सड़कों, गरीबी और भुखमरी से हुई मौतों का जिक्र भी करते हैं। 

ओडिशा उन राज्यों में शामिल है, जहां 40 प्रतिशत एससी और जनजातीय आबादी का निवास है, लेकिन प्रदेश की राजनीति पर 5 प्रतिशत ब्राह्मणों और पटनायकों (करण-कायस्थ) का लंबे समय से कब्जा है। यहां की राजनीति में सामाजिक न्याय का प्रभाव अभी तक नहीं दिखा है। यहां सत्ता में पिछ़ड़ों और एससी की भागीदारी की बात चुनावों में नहीं होती। जबकि ओड़िशा के नजदीकी राज्य बिहार में लोकसभा और विधानसभा में सामाजिक न्याय, के मुद्दों को अपनी रैलियों में उठा रहे हैं। वे राज्य में पिछ़ड़ों की सत्ता में हिस्सेदारी की बात 1990 से हो रही है।

यहां के पिछड़े और वंचित आज भी कुछ राजनीतिक परिवारों के जबरदस्त प्रभाव में हैं जिनका कब्जा राजनीति और औद्योगिक जगत में है। ओड़िशा में बिहार और यूपी की तरह जाति की संख्या देख उम्मीदवार तय नहीं किए जाते हैं जबकि यहां कि सामान्य सीटों पर ब्राह्मणों और करण जाति का राज है। सामान्य कुल 14 सीटों पर दोनों प्रमुख दल भाजपा और बीजद ने ब्राह्मणों और करण जाति पर खासा भरोसा किया है। 

इसका सबसे अच्छा उदाहरण खुद भाजपा है, जिसने लोकसभा चुनाव में 8 ब्राह्मणों को टिकट दिया है। भुवनेश्वर, केंद्रपाड़ा, बालासोर, ढेनकनाल, कालाहांडी, बरगढ़ और कटक लोकसभा सीट से भाजपा ने ब्राह्मणों उम्मीदवार उतारे हैं। यही नहीं इसके अलावा पार्टी ने भुवनेश्वर से पूर्व आईएएस अपराजिता मिश्रा सारंगी, कटक से पूर्व डीजीपी प्रकाश मिश्रा और केंद्रपाड़ा से मशहूर उद्योगपित विजयंत पंडा को चुनाव मैदान में उतारा है। बीजद ने भी तीन ब्राह्मण और दो करण उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं।

दिलचस्प बात है कि प्रदेश की पिछड़ी, एससी आबादी वोट डालते हुए जाति की सोच से मुक्त है। जबकि सामाजिक जीवन में यही जातियां सामाजिक भेदभाव की भारी शिकार हैं।  प्रदेश के ग्रामीण इलाकों खासकर तटीय ओड़िशा के ग्रामीण इलाकों में छुआछूत आज भी बड़े पैमाने पर मौजूद है। लेकिन राजनीतिक फैसलों में इस सामाजिक भेदभाव का प्रभाव उड़ीसा में एकदम नजर नहीं आता।  
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ओडिशा में विधानसभा और लोकसभा चुनावों में रोजगार एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। - फोटो : फाइल फोटो
रोजगार संकट और गुजरात से कनेक्शन
ओडिशा में विधानसभा और लोकसभा चुनावों में रोजगार एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। नरेंद्र मोदी उड़िया लोगों के दूसरे राज्यों में रोजगार की तलाश में जाने को मुद्दे को लगातार उठा रहे हैं। 16 अप्रैल को भुवनेश्वर में मोदी ने प्रभावी रोड शो किया। शाम को एक अच्छी रैली भुवनेश्वर में की। रैली में उन्होंने कई मुद्दों पर नवीन पटनायक की सरकार को घेरने की कोशिश की। सिंचाई, स्वास्थ्य, किसान संकट, बेरोजगारी, भुखमरी पर उन्होंने बात की। हालांकि उनके चेहरे पर एक साफ तनाव था। उनके भाषण में न जोश था, न ओज था। 

दरअसल, नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात में 5 लाख से ज्यादा उड़िया कामगार काम करते हैं। गुजरात के टेक्सटाइल इंडस्ट्री को सबसे ज्यादा श्रमिक ओड़िशा से ही मिलते हैं। राज्य में रोजगार के अभाव में उड़िया आबादी केरल, तामिलनाडु और गुजरात जैसे राज्यों में रोजगार के तलाश में जा रही है। जबकि प्रदेश में बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों का भारी निवेश है।

मोदी से ज्यादा प्रभावी हैं पटनायक? 
हालांकि मोदी के तमाम आरोपों के बीच नवीन पटनायक के वेलफेयर स्कीम की चर्चा  गांव के ग्रामीण इलाकों में है। गरीब परिवारों को प्रति व्यक्ति एक रुपये किलो के हिसाब से प्रति माह पांच किलो चावल दिए जाने की योजना का प्रभाव उड़ीसा की जनता पर है। लड़कियों को पढ़ाई के लिए राज्य सरकार की तरफ मिलने वाली स्कॉलरशिप का भी प्रभाव स्थानीय आबादी पर है। लेकिन बेरोजगारी को लेकर उड़ीसा में खासा असंतोष है। इस असंतोष के कारण प्रदेश में पढ़े-लिखे युवाओं का एक तबका भाजपा की तरफ रुख कर गया है। बेरोजगारी के लिए काफी हद तक स्थानीय युवा नवीन पटनायक को दोषी ठहरा रहे हैं। 
क्या कहते हैं स्थानीय पत्रकार और लोग 
ओडिशा के स्थानीय पत्रकारों के अनुसार पड़ोसी राज्यों से लाए गए अन-स्किल्ड वर्कर कंपनियों की मनमानी शर्तों पर 12 से 15 घंटे तक काम करते हैं। वे कम वेतन पर भी काम करने को तैयार रहते हैं। स्थानीय आबादी को कार्पोरेट घराने हंगामा मचाने के बहाने नौकरियां देने से मुकर जाते हैं। यही नहीं जिन इलाकों में कॉर्पारेट घरानों के निवेश है, उस इलाके के सांसद और विधायक भी कार्पारेट घरानों को स्थानीय आबादी के रोजगार दिए जाने को लेकर बोलने से डरते हैं।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
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