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दो चरणों की वोटिंग का गणित और भाजपा-कांग्रेस के लिए संकेत, क्या ये मुकाबला कांटे का है?

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भारत में लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। इसका गवाह देश में चल रहा है चुनाव भी है। - फोटो : PTI
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भारत में लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। इसका गवाह देश में चल रहा है चुनाव भी है। हालांकि राजनीतिक गलियारे में तूफान के पहले वाली शांति है। पारंपरिक रूप से मान्यता यह है कि यदि मतदान प्रतिशत में इजाफा होता है यानी मतदाता पूरे उत्साह से मतदान करते हैं तो इसका संकेत बदलाव का होता है। ठीक कुछ वैसा ही जैसा 2014 में हुआ था। तब नौ चरणों में 66.38 प्रतिशत मतदान हुआ था।

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औसत मतदान का यह उच्चतम आंकड़ा था। उसके पहले 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में भी इंडिया शाइनिंग और फील गुड के नारों के बीच मतदाताओं ने उत्साह दिखाया था और बदलाव हुआ था। लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं है। अबतक हुए दो चरणों के मतदान में वोटों के प्रतिशत से कोई बड़ी तस्वीर बनती नहीं दिख रही है। यानी यह कहा जा सकता है कि भाजपा और कांग्रेस या कह लें विपक्ष दोनों बराबरी पर चल रहे हैं।

पहले चरण का मतदान और हिसाब-किताब 
सबसे पहले 18 अप्रैल के मतदान पर नजर डालते हैं। 18 अप्रैल 2019 को दूसरे चरण का मतदान संपन्न हुआ। 11 राज्यों के 95 सीटों के लिए हुआ। इनमें 38 सीटें अकेले तामिलनाडु की थीं और वहां 70.9 फीसदी मत पड़े। अब 2014 में तामिलनाडु में हुए मतदान प्रतिशत को देखें। वहां 72.70 प्रतिशत मत पड़े थे। अब दक्षिण भारत के एक दूसरे राज्य कर्नाटक को देखें। यहां के 28 में से 14 सीटों के लिए दूसरे चरण में मतदान हुआ। औसत मतदान का प्रतिशत 67.5 फीसदी रहा। जबकि 2014 में 67.7 फीसदी मतदान हुए थे।
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चलिए अब मध्य भारत के राज्य महाराष्ट्र पर नजर डालते हैं। पहले चरण के दौरान यहां 7 सीटों के लिए 56 फीसदी मतदान दर्ज किया गया। जबकि दूसरे चरण में 10 सीटों पर मतदान हुआ और वोटरों का टर्नआउट 63 फीसदी रहा। वहीं 2014 में महाराष्ट्र में औसत मतदान 60.36 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार भी मतदान प्रतिशत इसी आंकड़े के आसपास रहने की संभावना है।

अब बात उस राज्य की करते हैं जहां सबसे अधिक 80 सीटें हैं। पिछली बार इसी राज्य में मिली बंपर जीत ने भाजपा को सत्ता के सातवें आसमान पर पहुंचा दिया था। इस साल पहले चरण में यहां 8 सीटों के लिए मतदान हुआ और वोट प्रतिशत 63.69  रहा। जबकि 18 अप्रैल को दूसरे चरण में भी 8 सीटों पर मतदान हुआ और वोट प्रतिशत 62.3 रहा। इस बार उत्तर प्रदेश के मतदाताओं का रुख समझने के लिए 2014 में हुए मतदान प्रतिशत को देखें। तब यहां 58.3 प्रतिशत था। जैसा कि पारंपरिक मान्यता यह है कि यदि वोट प्रतिशत बढ़ते हैं तो इसका संकेत जीतने वाली पार्टी के लिए नकारात्मक होता है। पिछली दफा भाजपा ने 80 में से 71 सीटें जीती थी। 

 

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बिहार में पहले चरण में 4 सीटों पर मतदान हुआ था और 50 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था। - फोटो : अमर उजाला
क्या है बिहार की कहानी? 
बिहार की कहानी भी उत्तर प्रदेश की कहानी से अलग नहीं है। यहां भी मतदाताओं में 2014 वाला उत्साह नहीं है। इस बार पहले चरण में यहां 4 सीटों पर मतदान हुआ था और 50 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था। हालांकि 18 अप्रैल को जब यहां दूसरे चरण के दौरान 5 सीटों पर हुए मतदान में वोटों का प्रतिशत 62.5 फीसदी दर्ज किया गया। 2014 से तुलना करें तो हम पाते हैं कि इस बार भी मत का प्रतिशत कमोबेश 56.28 प्रतिशत के आसपास रहने की संभावना है।

पश्चिम बंगाल की राजनीतिक तस्वीर इस बार भी कमोबेश वैसी ही है जैसी पिछली बार थी। पिछली बार यानी 2014 में यहां के मतदाताओं ने जबरदस्त उत्साह दिखाया था और 82.16 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था। इस साल पहले चरण में यहां 2 सीटों पर 81 फीसदी मतदान हुआ जबकि 18 अप्रैल के दूसरे चरण में 3 सीटों पर हुए मतदान में वोट प्रतिशत 76 फीसदी रहा।

वैसे कुल मिलाकर देखें तो इस बार मतदान के प्रतिशत से बहुत अधिक उतार-चढ़ाव वाले संकेत नहीं मिलते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि मतदाताओं में कंफ्यूजन की स्थिति है। वे भाजपा के पांच सालों का न तो हिसाब मांग रहे हैं और न ही कांग्रेस के द्वारा उठाए जा रहे मुद्दों को नकार रहे हैं। 

बहरहाल, अभी तो दूसरा चरण ही संपन्न हुआ है। चरण-दर-चरण मतदान में यदि कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आता है तब 23 मई को जो परिणाम आएंगे, उसका फैसला जनता ही करेगी। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
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