दलबदल कर चुनाव जीतने वाले कुछ नेता मंत्री पद का सुख भी भोग लेते हैं।
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टिकट की आस में पार्टी बदलते नेता?
दलबदल कर चुनाव जीतने वाले कुछ नेता मंत्री पद का सुख भोगने का सौभाग्य भी अर्जित कर लेते हैं क्योंकि दलबदल के समय उनकी शर्तो में कभी कभी यह भी शामिल रहता है। दलबदल को प्रोत्साहित करने में राजनीतिक दल भी कम जिम्मेदार नहीं है। ये दल मंत्रिपद का लालच देकर दलबदल कराने में संकोच नहीं करते। ऐसे उदाहरणों की भातीय राजनीति में कमी नहीं है और कोई भी दल इसका अपवाद नहीं है।
दरअसल, भारतीय लोकतंत्र की यह एक ऐसी खामी है, जिसपर नियंत्रण नहीं पाया जा सका है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कोई भी राजनीतिक दल इसे रोकने के लिए प्रभावी कानून बनाने में रुचि प्रदर्शित नहीं करता है। देश की राजनीति में ऐसे उदाहरणों की भी कमी नहीं है, जहां किसी दल के नेता ने अधिक बार दलबदल नहीं किया हो। ऐसे नेताओं की संख्या ढेरों है जो अपने इलाके में प्रभावशील होने के चलते जीतने वाले दल में शामिल हो जाते हैं और वहां इनकी ऐसी आवभगत् होती है कि उस पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता भी हैरान रह जाता है। ऐसे नेताओं को सरकार में भी महत्वपूर्ण पद पाने में कोई कठिनाई नहीं होती है।
आश्चर्य तो तब होता है जब दलबदल करने वाले नेताओं को नई पार्टी में एकदम क्लीन चिट दे दी जाती है और पार्टी उन्हें एक साफ सुथरी छवि वाले नेता के रूप में फिर जनता के सामने उतार देती है। दलबदल करने वाले नेताओं को अपनी पार्टी में तब ही खामियां नजर आने लगती है ,जब उन्हें टिकट नहीं मिलता है।
कई बार अपने दल के हारने की स्थिति में भी नेता दलबदल लेते हैं। दलबदल का कारण सत्ता की बेताबी को भी माना जाता है। सत्ता की ये बेताबी ही सिद्धांतविहीन गठबंधन को जन्म देती है। उत्तरप्रदेश में बना सपा-बसपा का गठबंधन इसका सबसे बड़ा उदहारण है। दोनों दलों के सुप्रीमों ने सत्ता की खातिर ही गठबंधन किया है। इस गठबंधन में सिद्धांत और नीतियों कोई जगह नहीं है।
नेता ही नहीं पार्टियां भी सहयोगी बदलती रहती हैं।
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कहानी दल-बदलने वाले नेताओं की
इधर, बिहार के मुख्यमंत्री ने दलबदल तो नहीं किया, लेकिन अपनी सुविधा अनुसार दूसरे दल का साथ लेते रहे हैं। गत् लोकसभा सहित बिहार विधानसभा के चुनाव भाजपा से अलग होकर लड़ने वाली जेडीयू ने कुछ समय बाद राजद को छोड़कर फिर भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया। दोनों दलों को यह गठबंधन इसलिए सहर्ष स्वीकार किया क्योंकि इसमें दोनों दलों का हित जुड़ा हुआ है।
इसी तरह राजग के सहयोगी रहे लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के मुखिया उपेंद्र कुशवाह ने वर्तमान लोकसभा चुनाव के कुछ समय पूर्व ही राजग से संबंध विच्छेद कर राजद के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा बनना केवल इसलिए उचित समझा क्योंकि राजग में रहकर उनके राजनीतिक हितों की पूर्ति नहीं हो पा रही थी। राजग के एक और सहयोगी लोजपा के अध्यक्ष रामविलास पासवान तो इस काम में माहिर माने जाते हैं।
भारतीय राजनीति में दलबदल के ऐसे अनेकों उदाहरण मौजूद हैं जो यह साबित करते है कि यह केवल अवसरों का लाभ लेने के लिए ही होते हैं। याद कीजिए कभी उत्तरप्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं रीता बहुगणा जोशी ने गत् विधानसभा चुनाव के पहले भाजपा का दामन इसलिए थाम लिया था जब पार्टी का सत्ता में आना सुनिश्चित हो गया था। उनका गणित ठीक बैठा और राज्य में भाजपा की सरकार बनने पर उन्हें मंत्रीपद से भी नवाज दिया गया।
इसी तरह मध्यप्रदेश में 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर जीते संजय पाठक को मंत्रिपद की लालसा भाजपा में खींच ले गई।
यद्यपि उन्होंने भाजपा में शामिल होने के बाद विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर पुनः चुनाव लड़कर एक अनुकरणीय उदाहरण जरूर प्रस्तुत किया, परन्तु जीत के बाद मिले मंत्रीपद से यह तो साबित होता ही है कि उन्होंने इसकी लालच में ही दलीय निष्ठा की उपेक्षा करना बेहतर समझा। पंजाब में कांग्रेस सरकार के बड़बोले मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू कभी भाजपा के मुखर नेता हुआ करते थे। वे गत विधानसभा चुनाव में दलबदल कर कांग्रेस में इसलिए शामिल हो गए कि उन्हें सरकार बनने पर मंत्रीपद का भरोसा दिया गया था। कभी कांग्रेस को जीभर के कोसने वाले अब उसी के गुण गाते थक नहीं रहे है।
दल-बदलते नेताओं की लंबी होती फेरहिस्त
कुछ दिनों पूर्व भाजपा के सांसद कीर्ति आजाद ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। भाजपा से चुनाव लड़ते रहे कीर्ति के पिता भगवत झा आजाद बिहार में कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे थे। इसके बाद भी उन्होंने भाजपा से चुनाव लड़ने में संकोच नहीं किया। अपने समय की चर्चित अभिनेत्री जयाप्रदा कभी तेलुगुदेशम पार्टी में थी फिर बाद में समाजवादी पार्टी में चलीं गई और मौजूदा लोकसभा चुनाव में वह भाजपा के टिकट पर रामपुर से लड़ रही हैं।
भाजपा के टिकट पर पटना साहिब से सांसद चर्चित अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा एक बार फिर पटना साहिब से चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन अब वे कांग्रेस से उम्मीदवार हैं।
भाजपा ने उन्हें 1996 में राज्यसभा मे भेजा था और वे वाजपेयी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री भी रह चुके हैं। वे पिछले कई दिनों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साध रहे थे। इसके बावजूद उन्हें लोकसभा में टिकट मिलने की उम्मीद थी, लेकिन जब उनकी उम्मीद पर पानी फिर गया तो उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया। अब वे भाजपा को वन मेन आर्मी बताने से भी नही चूक रहे हैं। अब उनकी राजद के साथ मित्रता हो गई है और उन्हें पूरी उम्मीद है कि वे राजद के सहयोग से चुनाव जीतने में सफल होंगे। यहां यह भी दिलचस्प है कि शत्रुघ्न की पत्नी पूनम सिन्हा ने विगत् दिनों समाजवादी पार्टी सदस्यता ग्रहण की है और वे केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के खिलाफ लखनऊ से चुनाव लड़ रही हैं।
कुल मिलाकर अवसरवादिता का यह सिलसिला भविष्य में थमें इसके आसार नही है लेकिन स्वस्थ लोकतंत्र के विकास में यह बाधा तो है ही। इसका हल तो निकलना ही होगा अन्यथा ऐसा भी दिन आ जाए जब मतदाता दलबदल करने वाले नेताओं को नोटा के बटन के लिए उपयुक्त मानने पर विवश हो जाए।
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