यहाँ तक कि पेट्रोल व डीजल से चलने वाली कारोँ में भी सबसे अधिक प्रदूषण वो गाडियाँ फैलाती हैं जो 10 साल पुराने एमिशन स्टैंडर्ड पर चल रही हैं। मौजूदा बीएस 4 गाडियोँ को बीएस 6 के तहत लाने से भी हवा की गुणवत्ता में तुरंत काफी बदलाव लाया जा सकता है। कार निर्माताओँ के लिए बीएस-6 नॉर्म्स लागू होने से डीजल कारोँ से पीएम2.5 मैटर 80% और नाइट्रोजन ऑक्साइड 70% तक कम हो सकता है। अगर बीएस 6 नॉर्म्स लागू हो जाएँ तो पेट्रोल गाडियोँ से एनओएएक्स का एमिशन 25% तक कम हो जाएगा जबकि सल्फर एमिशन के 50 पार्ट्स प्रति मिलियन से 10 पीपीएम तक कम होने की सम्भावना है। पिछ्ले महीने सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को यह निर्देश दिया था कि यह वह यह सुनिश्चित करे कि देश में 1 अप्रैल 2020 के बाद से सिर्फ बीएस 6 स्टैंडर्ड की गाडियाँ ही बेची जाएँ। सरकार को इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए खुद को पूरी तरह से तैयार करना चाहिए, और इसे जल्द से जल्द लागू करने के लिए गाडियोँ का उत्पादन करने वाली कम्पनियोँ के उनकी तकनीकोँ को अपग्रेड करने हेतु इंसेंटिव और टैक्स ब्रेक आदि की सुविधा देनी चाहिए। ऐसा दावा किया जा रहा है कि नए नियमोँ को लागू करने हेतु तकनीकोँ को अपग्रेड करना होगा जिसपर करीब 0.013 ट्रिलियन यूएस डॉलर का के निवेश की जरूरत है। यद्यपि, अस्वस्थ्य नागरिकोँ के काम के घंटोँ का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को जो नुकसान हो रहा है वह 2.6 ट्रिलियन यूएसडी जीडीपी का 3% है, यानि कि खराब सेहत से होने वाला नुकसान तकनीकी अपग्रेडेशन के खर्च से कहीँ अधिक है।
जल्द विकसित होने वाले गैस आधारित ईंधन की ओर शिफ्टिंग
सिर्फ ईवी की तरफ शिफ्ट होने के लक्ष्य की ओर आगे बढने के बजाय-जिस प्रक्रिया को पूरा करने में कम से कम तीन से चार दशक का समय लगेगा-हमेँ कुछ ऐसे उपायोँ पर भी गैर करना होगा जिन्हेँ तुरंत लागू करना आसान है। वर्ष 2001 में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को पूरी तरह से सीएनजी पर शिफ्ट करने से शुरुआती सालोँ में दिल्ली की हवा की गुणवत्ता में काफी सुधार आया था। हालांकि यह सुधार प्राइवेट गाडियोँ की तेजी से बढी संख्या के पीछे कहीँ छिप गया। ऐसे में यह आवश्यक है बडी संख्या में निजी वाहनोँ को गैस आधारित ईंधन पर शिफ्ट किया जाए। ऐसा करते समय सिर्फ सीएनजी पर निर्भर हो जाना भी गलत होगा। ऑटो एलपीजी बही निजी वाहनोँ के लिए एक उपयुक्त ईंधन है, जिसे जल्दी से लागू किया जा सकता है। बल्कि ऑटो एलपीजी के सीएनजी की तुलना में कई अन्य लाभ भी हैं, क्योंकि इसके फ्यूल स्टेशन लगाने में सीएनजी की तुलना में 5-6 गुना कम खर्च आता है। साथ ही इससे इंजन के पर’फॉर्मेंस को भी कम नुकसान होता है। दुनिया भर में, पेट्रोल और डीजल के बाद सबसे अधिक ऑटो एलपीजी का इस्तेमाल ऑटोमोटिव फ्यूल के तौर पर होता है; और 10 सबसे बडे कार निर्माताओँ में से 7 एलपीजी पॉवर्ड कारेँ बनाते हैं। ऑटो एलपीजी कार बूट्स में कम जगह लेता है और दूर दराज के इलाकोँ में इसे तुरंत पहुंचाने के लिए सिलिंडर का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। इन दोनोँ फ्यूल पर गाडियोँ को शिफ्ट करना ईवी पर शिफ्ट होने से ज्यादा आसान है और यह जल्द हो सकता है और हवा की गुणवत्ता में इससे तुरंत सुधार लाया जा सकता है।
सरकार को उन वाहन मालिकों को भी छूट देनी चाहिए जो ऑटो एलपीजी और सीएनजी की ओर शिफ्ट हो रहे हैं। छुट ऐसे होने चाहिए जिसमेँ कंवर्जन चार्ज कम हो जाए और पर्मिट फ्री इस्तेमालकी अनुमति दी जाए जिससे लोग स्वच्छ ईंधन की ओर जल्दी से शिफ्ट होने के लिए प्रेरित होँ। नियम के स्तर पर एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव तुरंत किया जाना चाहिए, वह यह कि मौजूदा सिस्टम जिसमेँ एआरएआई जैसी एजेंसियोँ से टाइप अप्रूवल लेने की जरूरत में बदलाव किया जाना चाहिए। हर तीन साल में प्रोहिबिटिव अप्रूवल कॉस्ट 4 करोड रुपये तक है जो सीएन’जी और एलपीजी रेट्रो फिटमेंट इंडस्ट्री के लिए बेहद निराशाजनक है। टाइप अप्रूवल वैलिडिटी के मामले में युरोपियन नियमोँ को लागू करना चाहिए, क्योंकि इस बात का कोई मतलब नहीं है कि एक समान वाहन हर तीन साल में एक समान कॉस्ट प्रोहिबिटिव टेस्ट से गुजरे।
दो पहिया वाहनों पर भी दिया जाए ध्यान
इंडीयन इंस्टिट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटेरोलॉजी (आईआईटीएम), पुणे द्वारा मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंसेज की देखरेख में तैयार की गई एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, एनसीआर में वर्ष 2010 से 2018 के बीच ट्रान्सपोर्ट सेक्टर से होने वाले एमिशन में 40% की बढोत्तरी हुई है। खतरनाक पर्टिकुलेट मैटर पीएम 2.5 का कुल एमिशन इन आठ सालोँ में 15% बढ गया, जिसमेँ ट्रांसपोर्ट सेक्टर की हिस्सेदारी प्रति वर्ष 42.230 गीगाग्राम एमिशन की है। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि दिल्ली में वाहन संबंधी प्रदूषण का 40% हिस्सा दो पहिया वाहनोँ से आता है। देश भर में कुल वाहनोँ की संख्या में दो पहिया वाहनोँ की हिस्सेदारी 75% है। दुर्भाग्यवश, अधिकतर नियम सम्बंधी बदलावोँ में इस तथ्य की अनदेखी की जाती है। दो पहिया वाहनोँ से होने वाली प्रदूषण का समाधान ईवी से नहीं मिल सकता है, यहाँ तक दीर्घकाल में भी। चार-पहिया वाहनोँ की भांति हमेँ दोपहिया वाहनोँ को भी स्वच्छ ईंधन की ओर शिफ्ट करना चाहिए। इसके लिए भी सबसे उपयुक्त विकल्प है कंवर्जन किट, जो कि दोपहिया वाहनोँ के लिए 5000-5500 रुपये तक के खर्च में उपलब्ध है, जिसमेँ एलपीजी टैंक को साइड में फिट कर दिया जाता है।
स्वच्छ वाहन चालकों को मिले पुरस्कार
इसके सबसे रोचक उदाहरणोँ में शामिल हैं यूरोप के कई देश जैसे कि फ्रांस, बेल्जियम, लक्जमबर्ग और इटली जो साइकल से काम पर जाने वालोँ को टैक्स ब्रेक देते हैं। सस्टेनेबल कम्युटर्स को पुरस्कृत करने का आइडिया काफी काम आ सकता है। उदाहरण के तौर पर, 400,000 बेल्जियम निवासी अथवा देश के 9% वर्कफोर्स को साइकलिंग रीएम्बर्समेंट मिल चुका है जो कि काम पर जाने और वहाँ से लौटने के लिए साइकलिंग के किलोमीटर के आधार पर मिलता है। भारत भी इन सफल उदाहरणोँ से सीख लेअर उन नागरिकोँ को छूट दे सकता है जो ग्रीन ट्रांसपोर्ट के विकल्प अपना रहे हैं। इसके तहत इलेक्ट्रिक अथवा हाईब्रिड कारोँ को खरीदने के लिए इंटरेस्ट फ्री लोन की व्यवस्था और ऑटो एलपीजी अथवा सीएनजी में गाडियोँ को कंवर्ट करने के लिए छूट की व्यवस्था की जानी चाहिए। इससे निश्चित रूप से उपभोक्ताओँ में व्यावहारिक बदलाव आएगा।
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