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दीनदयाल उपाध्याय की विरासत को कितना सहेज पाई है भाजपा? इन मुद्दों पर फेल हो गई पार्टी?

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क्या भाजपा पंडित दीनदयाल के सिद्धांतों को अक्षरशः पालन कर रह है? - फोटो : pmindia.gov.in
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भारतीय जनता पार्टी का दावा है कि उसकी स्थापना भले ही 06 अप्रैल, सन् 1980 में हुई है, लेकिन वह उसी जनसंघ का विस्तार है जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव राव सदाशिव गोलवलकर की प्रेरणा से डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्टूबर, सन् 1951 को गठित किया था। भाजपा का यह भी दावा है कि उसके सिद्धांत, कार्यपद्धति और सांगठनिक संरचना ठीक उसी प्रकार के हैं, जिस प्रकार जनसंघ के हुआ करते थे। हालांकि जब भाजपा के नेताओं से जनसंघ के जीवित होने की बात कही जाती है तो वे कन्नी काट जाते हैं।

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दरअसल, भाजपा दावा करती है कि वह पंडित दीनदयाल के सिद्धांतों को अक्षरशः पालन करने वाली पार्टी है लेकिन क्या सचमुच भाजपा आज भी उसी राजनीतिक धरातल पर खड़ी है, जिसे दीनदयाल की जनसंघ ने तैयार किया था? 

क्या कहते हैं सिद्धांत? 
पंडित दीनदयाल उपाध्याय के भाषण और दैनिक डायरी पर आधारित कुछ किताबों के अध्ययन से साफ जाहिर होता है कि वे इस देश की सांस्कृतिक आत्मा के चिंतक थे। दीनदयाल महात्मा गांधी और डॉ. राममनोहर लोहिया के चिंतन का विस्तार हैं, लेकिन आज की भाजपा में दीनदयाल कहां खड़े हैं इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। दीनदयाल चिंतन के दो आधार हैं।
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पहला एकात्मवाद और दूसरा अंत्योदय। हालांकि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चिंतकों की ही उपज है, लेकिन दीनदयाल के चिंतन में इसकी चर्चा नहीं के बराबर है लेकिन इस उहापोह के बीच कई स्तरों पर विमर्श जारी है। यह विमर्श न केवल बाहरी लोगों के बीच हो रहा है अपितु संघ और भाजपा के अंदर भी इस बात को लेकर जबरदस्त बहस चल रही है। 

भाजपा आखिर किसकी विरासत का प्रतिनिधित्व करती है? - फोटो : ANI
क्या विरासत का साथ छोड़ रही है पार्टी? 
बहरहाल, भाजपा आखिर किसकी विरासत का प्रतिनिधित्व करती है इस विषय पर कई विद्वान के अलग-अलग मत हैं। प्रोफेसर देवेन्द्र स्वरूप बताते हैं कि सन् 1947 में देश का विभाजन हुआ तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी बुरी तरह प्रभावित हुआ। संघ के कुछ कार्यकर्ता चाहते थे कि संघ भी एक राजनीतिक दल की तरह काम करे, लेकिन संघ के तत्कालीन सरसंघचालक, माधवराव सदाशिव गोलवलकर इसके विरुद्ध थे।

वहीं उन दिनों संघ की दृष्टि से पूरा उत्तर भारत एक प्रांत हुआ करता था और उसके प्रांत प्रचारक वसंतराव कृष्णराव ओक हुआ करते थे। बसंत राव गोलवलकर के विचार से सहमत नहीं थे। हालांकि इसी असहमति के कारण उन्हें संगठन छोड़ना भी पड़ा था, लेकिन उनके संरक्षण में कई स्थानों पर संघ के स्वयंसेवकों ने जनसंघ नामक राजनीतिक दल का गठन कर लिया। इसका प्रभाव उत्तर प्रदेश के कई शहरों में व्यापक स्तर पर हुआ। 

बहरहाल, इतिहास को केंद्र में रखें और यदि हम यह मान लें कि भाजपा सचमुच जनसंघ की विरासत की पार्टी है, तो जिस स्थान से इसने अपनी यात्रा प्रारंभ की और यात्रा के समय जिन लक्ष्यों को प्राप्त करने का संकल्प लिया वह पूरा होता नहीं दिखता है।

दरअसल, इस समय डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की विरासत आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी और पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के पास है। जनसंघ के उन दो नेताओं के व्यक्तित्व के सामने ये दोनों कहां खड़े हैं यह सभी को पता है।

निःसंदेह भाजपा आज सबसे प्रभावशाली पार्टी बन गई है। - फोटो : PTI
शक्तिशाली पार्टी है भाजपा, लेकिन? 
निःसंदेह भाजपा आज सबसे प्रभावशाली पार्टी बन गई है। आज इस पार्टी के पास जितनी संपत्ति, संसाधन, कार्यकर्ता और ताकत है उतनी देश की किसी भी पार्टी के पास नहीं है। यह पार्टी अन्य पार्टियों की अपेक्षा ज्यादा संगठित और अनुशासित भी है, लेकिन चाल-चरित्र और चेहरे के मामले में क्या यह अन्य पार्टियों से अलग है? यह सवाल समय-समय पर उठते रहे हैं और भाजपा के भीतर भी इस पर चिंतन होता रहा है।

आज भाजपा के नेताओं को साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी इस विषय पर सोचना चाहिए कि वह जिस पार्टी को आजतक संरक्षण देती रही है वह समाज, देश एवं खुद संगठन के लिए कितना उपयोगी है? खुद संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं का मानना है कि सिद्धांत, कार्यपद्धति और नेताओं के व्यक्तित्व के मामले में भाजपा अब अन्य पार्टियों की तुलना में ज्यादा भ्रष्ट हो चुकी है। 

हिन्दुत्व, अन्त्योदय, सर्वांगिण विकास और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भी भाजपा का रवैया ढुलमुल रहा है। यही कारण है कि पांच साल तक पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने के बाद भी भाजपा अपने एक भी पारंपरिक मुद्दों को देश में स्थापित नहीं कर पाई। गौर से देखें तो नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार ने अपने सैद्धांतिक मुद्दों पर तीन साल तक कोई पहल करती नहीं दिखी। तीन साल के बाद मोदी सरकार ने समान नागरिक संहिता का आधा-अधूरा काम करने की सोची और तीन तलाक विल पर अध्यादेश लेकर आ गई। 
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क्या भाजपा ने अपने वादों को पूरा किया है? - फोटो : फाइल फोटो
किन मुद्दों पर कहां खड़ी है भाजपा? 
इधर, यही हाल धारा 370 और अनुच्छेद 35ए का भी है। खुद भाजपा के कार्यकर्ताओं का आरोप है कि राम जन्मभूमि मंदिर के मामले में भी नरेन्द्र मोदी की सरकार ने ठीक से पहल नहीं की। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर भाषण तो खूब दिए गए, लेकिन सैन्य टुकड़ियों के सशक्तिकरण पर पूरे पांच साल कोई ध्यान नहीं दिया गया। मोदी की सरकार ने देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बनाया और विदेशी संबंधों के मामले में भी महाशक्तियों से समान दूरी बनाने के अपने पारंपरिक सिद्धांत से अलग दिखी। 

यहां तक कि मोदी सरकार ने चीन के साथ गैरपारंपरिक तरीके से संबंध स्थापित करने की कोशिश की। ये तमाम चिंतन और कार्य जनसंघ के सिद्धांतों के इतर है। स्वदेशी, स्वावलंबन और सुरक्षा के मामले में भी मोदी सरकार समझौता करती दिखी। यदि सचमुच मोदी सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में सजग होती तो जम्मू-कश्मीर के हालात खराब नहीं होते। डोकलाम पर चीनी दबाव के सामने भारत की स्थिति बेहतर होती। माओवादी आतंकवाद पर लगाम लगता और पाकिस्तान की ओर से बढ़ रही चुनौतियों का सामना करने में भारत सक्षम होता, लेकिन आज के हालात पहले से अच्छे नहीं हैं। 

आर्थिक मोर्चे पर फेल है सरकार? 
आर्थिक मोर्चे पर भी देश की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती है। दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी के शासन काल में एक बार फिर से नौकरशाही की ताकत बढ़ गई है। कॉर्पोरेट लूट में कमी नहीं आई है। भ्रष्टाचार के मामले चल तो रहे हैं, लेकिन कम है फिर भी पांच सालों में एक भी भ्रष्ट व्यक्ति के खिलाफ बड़ी कार्रवाई नहीं हुई है।

यह सबकुछ साबित करता है कि दीनदयाल की विरासत काे पार्टी जनसंघ का प्रतिनिधित्व करती है तो यह सरासर गलत है। 

हां कुछ मामले में मोदी सरकार ने सकारत्मक पहल की है, जैसे सीटिजनसिप चार्टर का मामला। इस मामले में पहल तो की है लेकिन वह पहल भी राजनीतिक ही लगती है। वैसे ही जम्मू-कश्मीर में मोदी सरकार के द्वारा किए गए कार्य भी बहुसंख्यक ध्रुवीकरण का ही मामला लगता है, जबकि दीनदयाल और जनसंघ के चिंतन में यह कहीं नहीं दिखता है। कुल मिलाकर हम यही कह सकते हैं कि भाजपा चाहे कुछ भी दावा कर ले, लेकिन नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की भाजपा दीनदयाल के चिंतन से कोसों दूर हो चुकी है। 
  
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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