मुस्लिम समाज के सामने सबसे ज़्यादा समस्याए हैं।
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ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या मोदी सरकार का विरोध ही मुसलमानों का एकमात्र एजेंडा है? क्या मुस्लिम समाज के समक्ष मोदी विरोध के अलावा और कोई समस्या नहीं है? आख़िर मुस्लिम बुद्धिजीवी दूसरे ज़रूरी मुद्दों पर इतने सक्रिय क्यों नहीं हैं?
क्या कहती है मुसलमानों पर आईं सरकारों की रिपोर्ट?
दरअसल, इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए देश में मुसलमानों की हालत का अध्ययन करने के लिए गठित राजिंदर सच्चर कमेटी, रंगनाथ मिश्रा आयोग और महमूदुर रहमान समिति की रिपोर्ट पर गौर करना पड़ेगा। तीनों समितियों की रिपोर्टों का अध्ययन करने से पता चलता है कि आज की तारीख़ में मुस्लिम समाज के सामने सबसे ज़्यादा समस्याए हैं। कोई दूसरा समाज इतनी अधिक समस्याओं से दो-चार नहीं है। सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट की मुख्य बातों से सभी अवगत हैं। लेकिन महाराष्ट्र में मुसलमानों की हालत पर आई महमूदुर रहमान समिति की रिपोर्ट से लोग अनजान हैं।
विलासराव देशमुख ने किया था समिति का गठन
2006 में राजिंदर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट लोकसभा में पेश होने के बाद 2008 में महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने राज्य में मुसलमानों की शैक्षणिक,सामाजिक और आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए रिटायर्ड मुस्लिम ब्यूरोक्रेट डॉ. महमूदुर रहमान की अगुवाई में छह सदस्यीय समिति का गठन किया। उसे महमूदुर रहमान समिति कहा गया। समिति ने पांच साल के गहन अध्ययन के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार की। समिति की रिपोर्ट में टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस, एसएनडीटी वीमेन यूनिवर्सिटी की इकोनॉमिक्स फैकेल्टी और मुंबई यूनिवर्सिटी के निर्मला निकेतन कॉलेज ऑफ़ सोशल वर्क समेत, कुल सात विश्वसनीय संस्थानों के भरोसेमंद सर्वे और स्टडी का हवाला दिया गया है।
समिति ने अक्टूबर 2013 में कांग्रेस-एनसीपी सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी, लेकिन राज्य सरकार ने उसे सार्वजनिक नहीं किया। वह रिपोर्ट मीडिया में लीक हो गई। रिपोर्ट में मुसलमानों के बारे में कई हैरान करने वाले तथ्य सामने आए। महाराष्ट्र में देहात की बात छोड़ दें तो मुंबई जैसे महानगर में रहने वाले मुसलमानों की भी हालत एकदम पिछड़ी मानी जाने वाली अनुसूचित जाति और जनजाति से भी बदतर अवस्था में है। बैंक मुसलमानों को क़र्ज़ देने से कतराती हैं। इतना ही नहीं मुस्लिम बस्ती में घर लेने वाले गैरमुस्लिम को भी होमलोन देने में भी परहेज़ करती हैं।
देश में मुस्लिम समाज कई समस्याओं से जूझ रहा है।
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रिपोर्ट सामने लाती है सच्चाई?
रिपोर्ट के मुताबिक़ महाराष्ट्र में 1.20 करोड़ मुसलमान हैं, जिनमें 15 साल तक की आबादी 37 फ़ीसदी है। पुरुष मुखिया वाले हर मुस्लिम परिवार में औसतन 6.1 सदस्य हैं जबकि महिला मुखिया वाले परिवार में 4.9 सदस्य हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि ग़रीबी और उचित मेडिकेयर के अभाव में मुस्लिम 60 साल की अवस्था पार करने के बाद जल्दी मर जाते हैं, इसलिए 60 साल या उससे ज़्यादा उम्र के मुस्लिम लोगों की आबादी महज़ 6.6 फ़ीसदी है। यह भी बहुत सीरियस और भयावह निष्कर्ष है। लिहाज़ा इस पर बहुत गंभीर शोध की ज़रूरत है, ताकि वृद्ध मुसलमानों को असामयिक मौत से बचाया जा सके।
बहरहाल, समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़ राज्य में केवल 10 फ़ीसदी मुसलमान अपने खेत में खेती करते हैं। क़रीब 60 फ़ीसदी मुस्लिम आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे गुज़र बसर करने को मजबूर है जबकि पूरे देश में 34.4 फ़ीसदी मुसलमान ग़रीब या ग़रीबी रेखा से नीचे हैं। राज्य में 20 फ़ीसदी मुसलमानों के पास राशन कार्ड नहीं है। इसी तरह 59 फ़ीसदी मुसलमान स्लम और बहुत गंदी बस्तियों में रहते हैं। जहां रहना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जाता है। झुग्गियों में रहने वालों में भी केवल 18 फ़ीसदी लोगों के घर पक्के हैं।
ऐसे ही राज्य में बहुत बड़ी तादाद में मुस्लिम युवक बेरोज़गार हैं। 32.4 फ़ीसदी मुसलमान छोटे-मोटे काम करते हैं। 45 फ़ीसदी मुसलमानों की पर कैपिटा आमदनी महज़ 500 रुपए ही है जबकि 34 फ़ीसदी मुसलमानों (आबादी का एक तिहाई) की मासिक आमदनी 10 हज़ार रुपए से भी कम है। 24 फ़ीसदी 10 से 20 हज़ार रुपए महीने कमाते हैं, जबकि 20 से 30 हज़ार रुपए कमाने वाले मुसलमानों की तादाद 3.8 फ़ीसदी है। 30 से 40 हज़ार रुपए कमाने वाले मुसलमानों की तादाद केवल 1.0 फ़ीसदी है। यह रिपोर्ट देश में मुसलमान नागरिकों की विपन्नता दिखाती है।
महमूदुर रहमान की रिपोर्ट और महाराष्ट्र के पूर्व सीएम विलासराव देशमुख
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क्या कहती है महमूदुर रहमान कमेटी की रिपोर्ट?
महमूदुर रहमान की रिपोर्ट यह भी कहती है कि मुस्लिम समाज में सभी ग़रीब नहीं है। इस समाज में काफ़ी संपन्न लोग भी हैं। देश के बाक़ी समुदायों की तरह मुसलमानों में भी मुट्ठी भर लोग ही बेहतर जीवन जीते हैं। यानी केवल 6.0 फ़ीसदी मुसलमानों की मासिक आय 50 हज़ार रुपए या उससे अधिक है। शिक्षा के क्षेत्र में महमूदुर रहमान की रिपोर्ट तक़रीबन सच्चर कमेटी जैसी ही है।
शिक्षा में मुसलमानों की दशा बहुत दयनीय है। देश में साक्षरता की दर 74 फ़ीसदी है, लेकिन मुस्लिमों की साक्षरता मात्र 67.6 फ़ीसदी हैं। महाराष्ट्र में यह 65.5 फ़ीसदी से भी नीचे है। यह गौर करने वाली बात है कि प्राइमरी स्तर पर मुस्लिम बच्चों की संख्या हिंदुओं से ज़्यादा होती है। उदाहरण के लिए अगर हिंदुओं के 38 फ़ीसदी बच्चे प्राइमरी तक पहुंचते हैं, तो मुसलमानों के 47 फ़ीसदी बच्चे स्कूल तक पहुंचते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में 33 फ़ीसदी बच्चे उर्दू पढ़ते हैं, तो शहरों में क़रीब आधे (49 फ़ीसदी) बच्चे उर्दू पढ़ते हैं। 96 फ़ीसदी स्टूडेंट्स जनरल स्टडी करते हैं। महज़ 4 फ़ीसदी ही तकनीकी संस्थानों में जाते हैं। वोकैशनल एजुकेशन का परसेंटेज 0.3 फ़ीसदी यानी नहीं के बराबर है। आमतौर पर 14 साल की उम्र में मुस्लिम बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं और बाल मज़दूर के रूप में काम करने लगते हैं। आर्थिक तंगी इसकी मुख्य वजह होती है। सेकेंडरी यानी 12वीं तक केवल 4.2 फ़ीसदी बच्चे पहुंच पाते हैं। उच्च शिक्षा का मुस्लिमों का आंकड़ा भयावह है। महज़ 3.1 युवक स्नातक तक पहुंचते हैं। ज़ाहिर है, इसीलिए उच्च कक्षाओं में मुसलमान दिखते ही नहीं।
रिपोर्ट के मुताबिक़, राज्य में मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा का आंकड़ा तो और ज़्यादा निराश करने वाला है। महज़ एक फ़ीसदी लड़कियां कॉलेज पहुंचती हैं। उच्च शिक्षा हासिल न कर पाने के कारण वे नौकरी वगैरह नहीं कर पातीं और मजबूरी में घर और बाहर पुरुषों का अत्याचार सहती हैं। उनके शौहर उनके विरोध के बावजूद एक से ज़्यादा निकाह कर लेते हैं।
2006 की थर्ड नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वें के मुताबिक़, 3 फ़ीसदी मुस्लिम महिलाओं के पतियों के पास एक से अधिक पत्नियां हैं। मुस्लिम जमात में दूसरे समुदायों की तुलना में अविवाहितों, तलाकशुदा और विधवाओं की संख्या बहुत ज़्यादा है। राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिमों में मैरिटल स्टेटस महज़ 29 फ़ीसदी है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि सरकारी ही नहीं, निजी क्षेत्र में भी मुसलमानों को बहुत कम नौकरियां मिलती हैं। सरकारी नौकरी में केवल 4.5 फ़ीसदी मुस्लिम हैं।
मुस्लिम समाज आज ग़रीबी, अशिक्षा, कुपोषण, बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है।
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बहरहाल, मीडिया में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व की बात करें तो उर्दू मीडिया को छोड़ दें तो बाक़ी मीडिया जैसे बौद्धिक संस्थानों में भी इक्का-दुक्का मुस्लिम पत्रकार देखने को मिलते हैं। महमूदुर रहमान कमेटी का साफ़ निष्कर्ष है कि महाराष्ट्र में वाक़ई बहुमत में मुसलमानों की हालत बहुत दयनीय है। कमोबेश यही तर्क देते हुए सच्चर कमेटी ने भी मुस्लिम समाज के विकास पर ख़ास ध्यान देने की बात कही थी। संभवतः इसी तरह की रिपोर्ट के आधार पर 2007 की रंगनाथ मिश्रा कमेटी ने नौकरी में मुसलमानों को 10 फ़ीसदी आरक्षण देने की पैरवी की थी।
आखिर देश के मुसलमानों की असली समस्या क्या है?
इन रिपोर्टों के आधार पर कहा जा सकता है कि मुस्लिम समाज आज ग़रीबी, अशिक्षा, कुपोषण, बेरोजगारी और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्या का सामना कर रहा है। लेकिन कोई मुस्लिम बुद्धिजीवी इन ज्वलंत समस्याओं को नहीं उठा रहा है। सभी एक पार्टी और एक व्यक्ति के विरोध में लगे हैं।
अहम बात है कि मुसलमानों का मोदी विरोध 2014 चुनाव में भी ऐसा ही था। मोदी का विरोध तब से हो रहा है जब उन्हें सितंबर 2013 में भाजपा ने प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया। कोई मोदी के सिर इनाम रख रहा था, तो कोई गला काटने की बात कर रहा था। कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने तो मोदी को बोटी-बोटी काट डालने की धमकी दे डाली थी। लोग ऐसी हवा बना रहे थे कि मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो मुसलमानों की शामत आ जाएगी। यह विरोध अभियान नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए वरदान साबित हुआ। मुसलमानों के विरोध के बावजूद भाजपा को 284 सीटें मिलीं और मोदी प्रधानमंत्री बनने में सफल रहे।
यह भी गौर करने वाली बात है कि पिछले पांच साल के दौरान मुसलमानों के अहित को लक्ष्य करके मोदी सरकार ने कोई भी फ़ैसला नहीं लिया। मोदी सरकार ने ट्रिपल तलाक़ विरोधी अध्यादेश जारी किया, केंद्र के उस क़दम को मुस्लिम विरोधी कतई नहीं कहा जा सकता। ऐसे में अध्यादेश समय की मांग था।
देश के मुसलमानों को इस बात को भी समझना होगा कि वे केवल वोटबैंक नहीं है बल्कि भारत के नागरिक हैं और उन्हें बदलते भारत में प्रगति करने, शिक्षित होने और अपने नागरिक अधिकारों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करने का अधिकार है। उन्हें ये समझना होगा कि कहीं वे बौद्धिक रूप से राजनीतिक एजेंडें का तो शिकार नहीं हो रहे हैं और अपनी मूलभूत समस्याओं से नजरे तो नहीं फिरा रहे हैं।
मुसलमान सालों से भारतीय संस्कृति और देश का हिस्सा हैं और उन्हें अपने विकास के लिए इन जमीनी समस्याओं से अपनी आने वाली पीढ़ी को निजात दिलानी होगी। सरकारों की ओर से उनकी सामाजिक, आर्थिक स्थिति की पड़ताल समस्याओं को सुलझाने के लिए की गई है ना की राजनीतिक औजार के रूप में उनका इस्तेमाल करने के लिए। बेहतर होगा कि देश के मुसलमान अपनी समस्याओं को आगे आकर समझें और उसका समाधान निकालें।
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