ग्लैमर और राजनीति भारत में लंबे समय से एक दूसरे को सहयोग देते रहे हैं। दक्षिण भारत के राज्यों में ग्लैमर की राजनीति काफी पहले से है। तमिलनाडु में एम करुणानिधि, एमजी रामचंद्रन और जयललिता फिल्मों से जुड़े रहे और फिल्मों से जुड़े ये लोग लंबे समय तक तमिलनाडु की राजनीति में हावी रहे और यहां तक की तीनों ही प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।
80 के दशक में आंध्र प्रदेश के फिल्म स्टार एनटी रामाराव ने राजनीति में कदम रखा। वे भी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। लेकिन हिंदी पट्टी फिल्मी ग्लैमर की राजनीति से 90 के दशक तक मुक्त थी। लेकिन 2019 आते-आते राजनीतिक दलों पर ग्लैमर की राजनीति का खुमार चढ़ता रहा और इस समय तो मानों परवान पर है।
तमाम राजनीतिक दल प्रभाव बढ़ाने के लिए ग्लैमर को राजनीति में इस्तेमाल कर रहे हैं। दोनों राष्ट्रीय दल के साथ-साथ क्षेत्रीय दल भी जनता को लुभाने के लिए ग्लैमर का इस्तेमाल कर रहे हैं। अब फिल्म के साथ-साथ खेल जगत के ग्लैमर का भी इस्तेमाल राजनीति में हो रहा है। लेकिन राजनीति में एक और नया ट्रेंड नजर आया है। नौकरशाही का राजनीति में दखल, प्रवेश और नौकरशाहों का अच्छी संख्या में चुनाव मैदान में उतरना।
नौकरशाही का राजनीति में प्रवेश और समाजशास्त्री
समाजशास्त्री राजनीति में ग्लैमर के इस्तेमाल को अच्छा संकेत नहीं मानते हैं। समाजशास्त्री मानते हैं कि किसी भी पार्टी के ताकतवर समूह की राजनीति को ग्लैमर सूट करता है, क्योंकि ग्लैमर जनता के पक्ष में आवाज उठाने में फेल होता है।
पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ के समाजशास्त्र विभाग के प्रमुख रहे प्रोफेसर मनजीत सिंह कहते हैं- दक्षिण के राज्यों में फिल्मी ग्लैमर से राजनीति मे आए लोगों को समाज और राजनीति की अच्छी समझ थी। वो समाज से जुड़े थे, वे अपने राज्यों में जनता के लिए कई वेलफेयर स्कीम भी लेकर आए। लेकिन हिंदी पट्टी में ग्लैमर से राजनीति में आए लोगों को जमीन की समझ नहीं है। इन्हें राजनीतिक दल एक रणनीति के तहत चुनाव मैदान में उतारते हैं, ताकि युवा इनके ग्लैमर में बह जाए, बेरोजगारी, गरीबी आदि पर सवाल न पूछे।
चुनाव जीतने के बाद ये फिल्मी ग्लैमर चुनाव क्षेत्रों में जाते नहीं हैं। राजनीतिक दलों को फिल्मी ग्लैमर इसलिए पसंद है कि ये पार्टी के लिए वोट इकट्ठा करते हैं, साथ ही पार्टी में ताकतवर शख्सियत के इशारे पर काम करते हैं। पार्टी और सरकार की गलत नीतियों पर सवाल नहीं पूछते, क्योंकि जनता के हितों से इनका कोई सरोकार नहीं होता। जबकि जमीन से जुड़ा हुआ पार्टी वर्कर जब सांसद बनते हैं तो अपनी पार्टी की गलत नीतियों पर समय-समय पर सवाल खड़ा करते हैं। सांसद बनने के बाद भी फिल्म स्टार फिल्मों में व्यस्त हो जाते है। ये फुल टाइम सांसद भी नहीं होते। इसके अपवाद सिर्फ राज बब्बर और शत्रघ्न सिन्हा जैसे लोग हैं।
कांग्रेस ने की हिंदी पट्टी में फिल्मी ग्लैमर की शुरुआत
हिंदी पट्टी में फिल्मी ग्लैमर की पॉलिटिक्स सबसे पहले कांग्रेस लेकर आई। कांग्रेस ने 1984 के चुनाव में अमिताभ बच्चन को इलाहाबाद से चुनाव लड़ाया। 1984 में ही फिल्म अभिनेता सुनील दत्त मुंबई से लोकसभा चुनाव कांग्रेस की टिकट पर लड़े।
अमिताभ बच्चन राजीव गांधी के दोस्त थे, हिंदी फिल्मों के सुपरस्टार थे। सुनील दत की पहचान फिल्म स्टार के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी थी। अमिताभ बच्चन ने देश के एक बड़े नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा को चुनावों में शिकस्त दी। लेकिन वे ज्यादा दिन राजनीति में नहीं चले।
बोफोर्स घोटाले में नाम आने के बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास से ले लिया। हालांकि पीछे से उनकी राजनीति चलती रही। राजनेताओं से उनके संबंध बने रहे। समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह और अमर सिंह से उनके अच्छे संबंध थे। समाजवादी पार्टी ने उनकी पत्नी जया बच्चन को राज्यसभा में भेजा। भाजपा ने भी कांग्रेस के देखादेखी 90 के दशक में फिल्मी ग्लैमर की पॉलिटिक्स शुरू की। 1992 में नई दिल्ली लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार फिल्म स्टार राजेश खन्ना के खिलाफ भाजपा ने फिल्म स्टार शत्रुघ्न सिन्हा को चुनाव मैदान मे उतारा। शत्रुघ्न सिन्हा राजेश खन्ना से चुनाव हार गए थे।