कोरोना वायरस के कारण 21 दिनों के लिए लगा लॉकडाउन और 19 दिन के लिए बढ़ गया है। 25 मार्च से घरों में बंद देश की जनता को तीन मई तक घरों में रहकर ही सांस लेना होगा। देश की सड़कें अभी और कुछ दिन पहियों के वजन के नीचे दबने से बचेंगी। रेलवे स्टेशन के पूछताछ केंद्रों पर सन्नाटा कुछ दिन और पसरा रहेगा। पटरियां कुछ और सप्ताह वीरानी में गुजारेंगी और बेफिक्र होकर चूहे प्लेटफॉर्म पर घूमेंगे।
कुछ और हफ्ते बनारस और प्रयागराज के रेलवे पूल से नदी में सिक्के नहीं उछाले जाएंगे, क्योंकि सब ठप है। हम आप घरों में बंद है, लेकिन इस देश का एक बड़ा तबका इस महामारी के दौर में भी अपनी भूख को मिटाने के लिए लड़ रहा है। वो देश के महानगरों में है, अपने साथियों के साथ तब वो पैदल इसलिए अपने गांव नहीं लौटा, क्योंकि उसे उम्मीद थी कि 21 दिनों के बाद फिर से सब सामान्य हो जाएगा। वो फिर से किसी के घर की ईंट जोड़ने में लग जाएगा या किसी होटल में फिर से पराठे सेंकने में व्यस्त हो जाएगा।
चाय की दुकान पर फिर से केतली गर्म होने लगेगी या फिर वो जिस कारखाने में काम करता था, वह फिर से चल पड़ेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अब वो जिंदगी की सिर्फ एक राह पर खड़ा है और वो रास्ता उसे अपने गांव की ओर ले जाता है।
एक बार फिर से वो अपनी उम्मीद को इस शहर की खामोशी में झोंक कर अपने घर निकलने के लिए सड़क पर उतर आया है। 14 अप्रैल मंगलवार की शाम मुंबई के बांद्रा में हजारों की भीड़ इकट्ठी हो गई, सूरत में भी दिहाड़ी मजदूर सड़कों पर उतर आए। अब वो भय में हैं। उनके पास अब इस शहर में रहने की ताकत नहीं बची। जितनी हिम्मत थी उन्होंने तीन सप्ताह डटकर अपने हालात से मुकाबला किया। जो भी जमा पूंजी थी वो सब खर्च हो गई।
अब वो सड़कों पर हैं और जिस सत्ता के कहने पर अब तक वो सब डटे रहे, वो सत्ता एक एलान कर एक बार फिर अपने घरों में बंद है। बिना इस बात की परवाह किए बगैर की अब इन प्रवासी मजदूरों का क्या होगा। राज्य सरकारें दावा कर रही हैं कि वो अपने यहां मौजूद लोगों की देखभाल कर रही है, लेकिन हालात कुछ और ही कह रहे हैं।
हम और आप ही तो थे जो कुछ सप्ताह पहले सोशल मीडिया पर इनके लिए भावुकता का सैलाब ले आए थे, जब वो पैदल ही अपने घरों के लिए जा रहे थे। अब एक बार फिर यही शुरू है, लेकिन दो वक्त की रोटी के लिए मीलों दूर आए इन मजदूरों को हमारी किसी संवेदना से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।
वो अब फिर से चलने को बेचैन हैं, पेट भूख से पीठ में धंसा जा रहा है, लेकिन वो चलेंगे। उन्हें अब किसी भी सत्ता और नेता से कोई उम्मीद नहीं। उनके बच्चों के होठों पर भूख और प्यास से पड़ती पपड़ी, उन्हें इस शहर से बाहर निकलने वाली सड़क पर दौड़ा देगी। हम और आप बस टीवी और तस्वीरों में देखते रहेंगे।
सरकारें दावा कर रही हैं कि हमनें सभी के लिए बेहतर प्रबंध किए हैं, कोई भूखे नहीं सोएगा, अगर वाकई उनके द्वारा इन मजदूरों की देखभाल के लिए कदम उठाए गए हैं, तो ऐसा क्यों है कि जहां भी घर लौटने की अफवाह उड़ती है, हजारों की संख्या में ये इकट्ठा हो जाते हैं। इसके तुरंत बाद ये कहा जाने लगता है कि लोगों को साजिश के तहत इकट्ठा किया गया।