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कृष्ण बिहारी मिश्र स्मृति शेष: आपको सदैव जीवंत रखेंगी आपकी रचनाएं

सार

कृष्ण बिहारी जी की पत्रकारिता पर 'जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण भूमि, 'बेहया का जंगल' और 'मकान उठ रहे हैं' जैसे ललित निबंध संग्रह समेत दस से अधिक रचनाएं प्रकाशित और प्रशंसित हो चुकी हैं।
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कृष्ण बिहारी मिश्र - फोटो : Twitter
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विस्तार
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यह एक अजीब संयोग है। फरवरी महीने के अंतिम सप्ताह में तय किया गया कि कृष्ण बिहारी मिश्र के गांव बलिहार (बलिया) में उनकी स्मृतयों को संजोने के लिए एक सभागार का निर्माण करवाया जाएगा। 2 मार्च को पटना में पत्रकार स्वमप्रकाश के घर पर कृष्ण बिहारी जी की रामकृष्ण परमहंस की जीवनी पर लिखी अनुपम कृति ' कल्पतरु की उत्सव लीला' पर कई मित्र चर्चा कर रह थे। सारनाथ में 4-5 मार्च को 'बुद्ध की धरती पर कविता' के अंतरराष्ट्रीय आयोजन के अंतिम दिन प्रोफेसर बलराज पांडेय, प्रोफेसर अवधेश प्रधान और बी.एच.यू के ही एक और अध्यापक डॉ विवेक सिंह के साथ कृष्ण बिहारी जी के स्वास्थ्य के बारे में हम बिना किसी प्रसंग के चर्चा कर रहे थे। स्वमप्रकाश पिछले ही महीने कृष्ण बिहारी जी से मिलकर लौटे थे। बता रहे थे कि अब उनका स्वास्थ्य उतना ठीक नहीं है। 

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डॉ.विवेक भी कोलकता के अपने एक मित्र के हवाले से बताए कि रह-रह कर कुछ नया करने का उत्साह तो अभी उनमें  दिखाई  देता है, पर थोड़े ही समय बाद वह  ठंडा पड़ जाता है। शरीर थक जाता है, जुबान लड़खड़ाने लगती है और स्मृति भी कभी-कभी साथ छोड़ने लगती है। पर हमें भरोसा नहीं था कि बलिहार के चौरासी दियर की 'जिवटी' काया की  इतनी जल्दी अपनी 'इह लीला' पूरी हो जायेगी। जी हां! पिछले 7 मार्च को कृष्ण बिहारी मिश्र इस नश्वर संसार से अनन्त की यात्रा पर निकल पड़े, अपने 'ठाकुर' यानी रामकृष्ण परमहंस की खोज में।

कृष्ण बिहारी जी की रचनाएं की जाती रहेंगी याद

वैसे कृष्ण बिहारी जी की पत्रकारिता पर 'जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य की निर्माण भूमि, 'बेहया का जंगल' और 'मकान उठ रहे हैं' जैसे ललित निबंध संग्रह समेत दस से अधिक रचनाएं प्रकाशित और प्रशंसित हो चुकी हैं। पर कृष्ण बिहारी मिश्र जी के ज्येष्ठ पुत्र कमलेश मिस्र जी बताते है कि

पिताजी खुद कहते है कि 'कल्पतरु की उत्सव लीला' से बेहतर कोई दूसरी कृति उनकी बन नहीं पायी। इसकी वजह वे बताते है कि जब भी वे उससे बेहतर रचने की कोशिश करते रामकृष्ण परमहंस जी उनके सामने खड़े हो जाते और उसके बाद कुछ सूझता ही नहीं है। खुद कृष्ण बिहारी जी ने लिखा है कि " श्रेयांसि बहु विघ्नानि।

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परमहंस श्री रामकृष्ण का जीवन जितना सहज था, उसे अक्षर में रूपायित करना उतना ही विकट चुनौती। पर जब लिखना शरू किया तो लगा जैसे ठाकुर अपनी सहज कौतुकी शैली में मुझसे बोल-बतिया रहे हैं। मुझे केवल लिपिक की भूमिका पूरी करनी है।"

इस पुस्तक को पढ़ने के बाद निश्चित तौर पर यह दावा किया जा सकता है कि- आप वह नहीं रहेंगे, जो आप इस पुस्तक के पढ़ने के पहले थे। एक साथ वेदांत दर्शन, उपनिषद, साहित्य साधना और ठाकुर के जीवन में संगीत के महत्व का पता तो चलेगा ही, साथ ही यह भी कि खुद रामकृष्ण परमहंस जी को असाध्य रोग से पीड़ित होने के बावजूद अपने 'नरेन'  (नरेन्द्र दत्त -संन्यास नाम विवेकानंद) को प्राप्त करने में किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। परमहंस जी को अपनी मां से आदेश मिला था इस नारायण रूप बालक को प्राप्त करने के लिए।

कल्पतरु की उत्सव लीला में ठाकुर अपने "माँ" को संबोधित कहते हुए आर्त्त स्वर में कहते हैं कि- रसे बशे राखिश मां!' तर्क बुद्धि मुझमें घुसी कि जीवन भूसा बन जाएगा।' जीवन के रहस्यों का एक सूत्र यहां मिलता है कि जीवन में आस्था-श्रद्धा का महत्व कितना बड़ा है? और केवल तर्क बुद्धि का जीवन में प्रवेश करते ही वह कितना नीरस और नारकीय हो जाता है। तर्कबुद्धि और श्रद्धा का समन्वय ही जीवन के लक्ष्य को साधने में  सहायक होता है।

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'मार्क्सवाद में रुचि, आस्था नहीं'

एक बार लेखक-साहित्यकार नीलाभ अपने मित्र इरफान के साथ कृष्ण बिहारी जी की कुटिया में पधारे थे। नीलाभ ने उनसे पश्न किया कि' पकी बातों से लगता है कि- मार्क्सवाद में आपकी रुचि नहीं है? कृष्ण बिहारी जी का जवाब था कि 'रुचि है,आस्था नहीं है'। रुचि न होती तो मार्क्सवादी साहित्य पढ़ता ही नहीं। अपनी सीमित बुद्धि से निष्कर्ष निकाला है कि जो विचार घृणा और हिंसा पर खड़ा है, वह मनुष्य के लिए विधायक नहीं हो सकता।

फिर इरफान का सवाल था कि आपकी बातों से लगता है कि आपमें ब्राह्मण संस्कार का आग्रह है। उनका जवाब- स्वाभाविक है कि ब्राह्मण कुल में जन्म हुआ है। मगर मेरा विश्वास है, कि-ब्राह्मण वही है जो ब्राह्मण और तथाकथित चांडाल में भेद नहीं देखता। संवेदना, करुणा और पुनीत आचरण को ही मैं ब्राह्मण का लक्षण मानता हूं। महज जनेऊ-टीका ब्राह्मण होने का प्रमाण नहीं हो सकता।

यही हाल उनके ठाकुर रामकृष्ण परमहंस जी (जिनका गृहस्थ नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था) का भी था। अपनी ब्राह्मण-ग्रंथि को कुचलने मिटाने के लिए ठाकुर ने नीरव रात में राश्के( मंदिर का सफाई कर्मी रसिक लाल हाड़ी) की कुटिया अपनी जटा से बुहारी थी और मंदिर परिसर में जूठे पत्तल चाटते हुए उन्हें लोक-लज्जा की तनिक चिन्ता नहीं थी।अपने ध्यानस्थ निजी सेवक लाटू को (छपरा निवासी- संन्यास नाम अद्भूतानन्द)  शिवरूप मानकर पंखा झलने में उन्हें कोई संकोच नहीं था।

कृष्ण बिहारी मिश्र जी के गांव बलिहार में भी उनकी लगभग यही छवि गांव के लोगों में आज भी जिंदा है। गांव के वीरेन्द्र गोड़ बताते है कि उनके मलिकार बड़ी-छोटी जाति के लोगों में कभी व्यवहार के स्तर पर भेद नहीं करते थे। पर उनके गांव का समाज उन जैसे देवता के लिए अब रहने लायक नहीं रहा। बहुत दिनों से अब वे गांव नहीं आते थे। हवेली नुमा घर और लगभग चलीस बीघा 'चौरासी दियर' की पक्की जमीन आज भी उनके नाम है।

जिस जमीन पर पुराने जमाने में लोगों की मान्यता है कि एक बीघे में चौरासी मन चने की पैदावार होती है, पर देखने वाला कोई नहीं। बगल में साहित्यकार केशव प्रसाद मिश्र जी का भी घर है। उनके लिखे उपन्यास 'कोहबर की शर्तें' को  आधार बनाकर 'नदिया के पार' जैसी यादगार फिल्म बनी।

उस गांव के बगल में ही वैद जी का गांव चौबेछपरा भी है। वह नदी, वह पेड़ और वह मंदिर भी है। वह सब कुछ जो इस फ़िल्म में है, लोगों की स्मृतियों में आज भी ताजा है। पर जो नहीं है-वह है कृष्ण बिहारी मिश्र जैसे महान विभूति की साहित्यिक उपस्थिति। उनके गांव के ही  साहित्यकार बद्री विशाल मिश्र बताते हैं-

सन् 1954 में उनसे पहली बार भेंट हुई थी। मैं जमीन पर बैठा था। उनके बैठने के लिए कोई दूसरा इंतजाम नहीं था। वे बद्री विशाल मिश्र के साथ जमीन पर ही बैठ गए। यह कहते हुए कि 'संत और साहित्यकार जमीन पर बैठकर ही साधना करते हैं। बद्री विशाल जी को उनकी यह सीख आज तक याद है। नए साहित्कारों के लिए भी उनकी यहीं सीख थी कि बिना यह चिंता किए कि वे कैसा लिख रहे हैं, उन्हें लगातार लिखते रहना चाहिए। थोड़े दिन के बाद उन्हें खुद पता चल जायेगा कि अब कैसे लिखना चाहिए।

'कल्पतरु की उत्सव लीला' की पृष्ठभूमि भूमि में भी बलिया के भोजापुर गांव निवासी उनकी स्वर्गीया पत्नी रही है। कृष्ण बिहारी मिश्र जी बताते है कि 'परमहंस देव के जगत में मेरा पहला यद्यपि अबोध प्रवेश मेरी दिवंगता गृहिणी ने  कराया था। मेरी पिता की इकलौती बहू के रूप में जब मेरे आंगन में पहुंची तो पहली भेंट में मुझे जो प्रीतिकर उपहार दिया था' भारत में विवेकानंद'  स्वामी विवेकानंद के व्याख्यानों का संकलन। यह पुस्तक लिखवाने वाले प्रेरणा पुरूष रहे हैं- पंडित विद्यानिवास मिश्र।

एक सुबह दक्षिणेश्वर मंदिर में पूजा करने के बाद परमहंस कक्ष के उत्तरी द्वार से बरामदे में पहुंचे। जाने किस प्रेरणा से पंडित विद्यानिवास मिश्र ने बड़े आत्मीय ढंग से कृष्ण बिहारी मिश्र को आदेश दिया कि- 'परमहंसदेव के लीला प्रसंग को उपजीव्य बनाकर एक पुस्तक रचो। तुम्हारी वही रचना मूल्यवान होगी। रामकृष्ण परमहंस की प्रासंगिकता आज बढ़ गई है। सचमुच कृष्ण बिहारी मिश्र जी के इस नश्वर संसार से विदा लेने के बाद वे अपनी इस अमूल्य धरोहर के लिए हमेशा याद किए जाएंगे।

कृष्ण बिहारी मिश्र की स्मृति को सत् -सत् नमन।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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