'मार्क्सवाद में रुचि, आस्था नहीं'
एक बार लेखक-साहित्यकार नीलाभ अपने मित्र इरफान के साथ कृष्ण बिहारी जी की कुटिया में पधारे थे। नीलाभ ने उनसे पश्न किया कि' पकी बातों से लगता है कि- मार्क्सवाद में आपकी रुचि नहीं है? कृष्ण बिहारी जी का जवाब था कि 'रुचि है,आस्था नहीं है'। रुचि न होती तो मार्क्सवादी साहित्य पढ़ता ही नहीं। अपनी सीमित बुद्धि से निष्कर्ष निकाला है कि जो विचार घृणा और हिंसा पर खड़ा है, वह मनुष्य के लिए विधायक नहीं हो सकता।
फिर इरफान का सवाल था कि आपकी बातों से लगता है कि आपमें ब्राह्मण संस्कार का आग्रह है। उनका जवाब- स्वाभाविक है कि ब्राह्मण कुल में जन्म हुआ है। मगर मेरा विश्वास है, कि-ब्राह्मण वही है जो ब्राह्मण और तथाकथित चांडाल में भेद नहीं देखता। संवेदना, करुणा और पुनीत आचरण को ही मैं ब्राह्मण का लक्षण मानता हूं। महज जनेऊ-टीका ब्राह्मण होने का प्रमाण नहीं हो सकता।
यही हाल उनके ठाकुर रामकृष्ण परमहंस जी (जिनका गृहस्थ नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था) का भी था। अपनी ब्राह्मण-ग्रंथि को कुचलने मिटाने के लिए ठाकुर ने नीरव रात में राश्के( मंदिर का सफाई कर्मी रसिक लाल हाड़ी) की कुटिया अपनी जटा से बुहारी थी और मंदिर परिसर में जूठे पत्तल चाटते हुए उन्हें लोक-लज्जा की तनिक चिन्ता नहीं थी।अपने ध्यानस्थ निजी सेवक लाटू को (छपरा निवासी- संन्यास नाम अद्भूतानन्द) शिवरूप मानकर पंखा झलने में उन्हें कोई संकोच नहीं था।
कृष्ण बिहारी मिश्र जी के गांव बलिहार में भी उनकी लगभग यही छवि गांव के लोगों में आज भी जिंदा है। गांव के वीरेन्द्र गोड़ बताते है कि उनके मलिकार बड़ी-छोटी जाति के लोगों में कभी व्यवहार के स्तर पर भेद नहीं करते थे। पर उनके गांव का समाज उन जैसे देवता के लिए अब रहने लायक नहीं रहा। बहुत दिनों से अब वे गांव नहीं आते थे। हवेली नुमा घर और लगभग चलीस बीघा 'चौरासी दियर' की पक्की जमीन आज भी उनके नाम है।
जिस जमीन पर पुराने जमाने में लोगों की मान्यता है कि एक बीघे में चौरासी मन चने की पैदावार होती है, पर देखने वाला कोई नहीं। बगल में साहित्यकार केशव प्रसाद मिश्र जी का भी घर है। उनके लिखे उपन्यास 'कोहबर की शर्तें' को आधार बनाकर 'नदिया के पार' जैसी यादगार फिल्म बनी।
उस गांव के बगल में ही वैद जी का गांव चौबेछपरा भी है। वह नदी, वह पेड़ और वह मंदिर भी है। वह सब कुछ जो इस फ़िल्म में है, लोगों की स्मृतियों में आज भी ताजा है। पर जो नहीं है-वह है कृष्ण बिहारी मिश्र जैसे महान विभूति की साहित्यिक उपस्थिति। उनके गांव के ही साहित्यकार बद्री विशाल मिश्र बताते हैं-
सन् 1954 में उनसे पहली बार भेंट हुई थी। मैं जमीन पर बैठा था। उनके बैठने के लिए कोई दूसरा इंतजाम नहीं था। वे बद्री विशाल मिश्र के साथ जमीन पर ही बैठ गए। यह कहते हुए कि 'संत और साहित्यकार जमीन पर बैठकर ही साधना करते हैं। बद्री विशाल जी को उनकी यह सीख आज तक याद है। नए साहित्कारों के लिए भी उनकी यहीं सीख थी कि बिना यह चिंता किए कि वे कैसा लिख रहे हैं, उन्हें लगातार लिखते रहना चाहिए। थोड़े दिन के बाद उन्हें खुद पता चल जायेगा कि अब कैसे लिखना चाहिए।
'कल्पतरु की उत्सव लीला' की पृष्ठभूमि भूमि में भी बलिया के भोजापुर गांव निवासी उनकी स्वर्गीया पत्नी रही है। कृष्ण बिहारी मिश्र जी बताते है कि 'परमहंस देव के जगत में मेरा पहला यद्यपि अबोध प्रवेश मेरी दिवंगता गृहिणी ने कराया था। मेरी पिता की इकलौती बहू के रूप में जब मेरे आंगन में पहुंची तो पहली भेंट में मुझे जो प्रीतिकर उपहार दिया था' भारत में विवेकानंद' स्वामी विवेकानंद के व्याख्यानों का संकलन। यह पुस्तक लिखवाने वाले प्रेरणा पुरूष रहे हैं- पंडित विद्यानिवास मिश्र।
एक सुबह दक्षिणेश्वर मंदिर में पूजा करने के बाद परमहंस कक्ष के उत्तरी द्वार से बरामदे में पहुंचे। जाने किस प्रेरणा से पंडित विद्यानिवास मिश्र ने बड़े आत्मीय ढंग से कृष्ण बिहारी मिश्र को आदेश दिया कि- 'परमहंसदेव के लीला प्रसंग को उपजीव्य बनाकर एक पुस्तक रचो। तुम्हारी वही रचना मूल्यवान होगी। रामकृष्ण परमहंस की प्रासंगिकता आज बढ़ गई है। सचमुच कृष्ण बिहारी मिश्र जी के इस नश्वर संसार से विदा लेने के बाद वे अपनी इस अमूल्य धरोहर के लिए हमेशा याद किए जाएंगे।
कृष्ण बिहारी मिश्र की स्मृति को सत् -सत् नमन।
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