यदि हम अपने संकल्पों को गंभीरता से नहीं लेंगे, तो उन्हें पूरा करने का समय कभी नहीं मिलेगा, क्योंकि हम हमेशा किसी न किसी काम में व्यस्त ही रहते हैं। इसलिए, प्रतिबद्धता के बिना किसी भी प्रयास में सफलता मुश्किल है।
व्यक्ति के मानसिक सुधार के लिए सबसे पहली जरूरत है, किसी कार्य को लेकर गंभीरता और संकल्प। प्रतिबद्धता के बिना कोई भी प्रयास करना मुश्किल है। मैं कई बार टाल-मटोल की समस्या के संदर्भ में लोगों को एक कहानी सुनाता हूं। एक लामा ने अपने शिष्यों को प्रेरित करने के लिए उनसे वादा किया था कि वह उन्हें एक दिन घुमाने ले जाएगा। इस बात का बच्चों पर असर पड़ा और वे उस वादे को सच मानकर अपने अध्ययन में लगे रहते थे। लेकिन काफी समय बाद भी जब वह लामा उन बच्चों को घुमाने नहीं ले गया, तो उनमें सबसे छोटे शिष्य ने अवसर देखकर अपने गुरु को उसका वादा याद दिलाया। तब लामा ने कहा कि वह बहुत व्यस्त है, इसलिए थोड़ी और प्रतीक्षा करनी होगी। कुछ और समय बीता तथा गर्मियों के बाद सर्दी का मौसम भी शुरू हो गया।
एक बार फिर शिष्य ने लामा को याद दिलाते हुए पूछा, ‘हम घूमने कब जाएंगे?’ लामा ने फिर वही उत्तर दिया, ‘मैं थोड़ा व्यस्त हूं।’ कुछ समय बाद लामा ने बच्चों में कुछ हलचल देखी, तो पूछा, ‘यह क्या हो रहा है?’ उसने देखा, किसी मृत व्यक्ति का शव ले जाया जा रहा था। एक शिष्य ने कहा, ‘बेचारा गरीब आदमी घूमने जा रहा है!’ इस कहानी का आशय यही है कि यदि हम अपने संकल्पों को गंभीरता से नहीं लेंगे, तो उन्हें पूरा करने का समय कभी नहीं मिलेगा, क्योंकि हम हमेशा किसी न किसी काम में व्यस्त ही रहते हैं।
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मैं सावधान करना चाहता हूं कि व्यक्ति जब शुरुआत में ध्यान लगाता है, तो उसे पता चलता है कि उसका मस्तिष्क जंगली घोड़े जैसा है। जंगली घोड़े को जिस तरह अपने घुड़सवार के साथ तालमेल बिठाने में थोड़ा समय लगता है, ठीक उसी तरह मस्तिष्क को साधने में भी थोड़ा वक्त लगता है। लंबे समय तक लगातार अभ्यास के बाद ही हमें ध्यान का वास्तविक लाभ नजर आता है। मानसिक प्रशिक्षण के किसी अल्पकालिक कार्यक्रम के लिए कुछ दिन निकालना ठीक है, लेकिन उसके परिणामों से तुरंत किसी निष्कर्ष पर पहुंचना गलत है, क्योंकि इसमें समय लगता है। इसका पूर्ण लाभ मिलने में कई महीने या कई वर्ष भी लग सकते हैं।
इसलिए, मस्तिष्क की प्रक्रिया को समझना चाहिए, जिसे शांत भाव से ही किया जा सकता है। शुरू में हताशा जरूर हो सकती है, मगर निराश न होना बेहद जरूरी होता है। ध्यान की प्रक्रिया के आरंभ में इसके लाभ पर विचार करना जरूरी है। महज इसी अभ्यास से हमें तत्काल चिंता और भटकाव से मुक्ति मिलने लगती है। यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। इससे विवेक जागृत होता है और भावी परेशानियों से निपटने की समझ भी विकसित होती है। ध्यान न करने से हम विनाशकारी भावनाओं और विचारों का शिकार हो जाते हैं और हमारी मानसिक शांति नष्ट हो सकती है। -बियॉन्ड रिलिजन: एथिक्स फॉर ए होल वर्ल्ड के अनूदित अंश
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सूत्र- टाल-मटोल करना छोड़ें
जीवन में शांति पाने के लिए सबसे जरूरी है-दृढ़ संकल्प, निरंतर अभ्यास और टाल-मटोल से बचना, क्योंकि बिना प्रतिबद्धता के कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता। ध्यान की शुरुआत में मन भटकता है, लेकिन लगातार प्रयासों से धीरे-धीरे मन शांत होने लगता है, जिससे चिंता कम होती है और विवेक जागृत होता है।