प्रकृति का सबसे अद्भुत गुण उसकी विविधता है। कोई भी जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होता। वहां हर पत्ती, हर कीट, हर पक्षी और हर जीव अपने ढंग से उस व्यवस्था का हिस्सा होता है, जो दिखाई भले न दे, पर निरंतर काम करती रहती है। मनुष्य ने अपनी प्रगति की कहानी ऊंची इमारतों और चौड़ी सड़कों से लिखी है, लेकिन प्रकृति अपनी कहानी मौन संतुलन से लिखती है। वहां कोई प्रतिस्पर्धा दिखाई नहीं देती, फिर भी तेज गति से विकास होता रहता है। वहां कोई स्वयं को सबसे बड़ा सिद्ध करने में नहीं लगा, फिर भी सबका जीवन आगे बढ़ता रहता है।
जंगल का सबसे विशाल वृक्ष भी उस मिट्टी पर निर्भर है, जिसे असंख्य सूक्ष्म जीव हर दिन जीवित रखते हैं। यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि कोई भी सफलता अकेले संभव नहीं होती। जितना हम दूसरों पर निर्भर हैं, उतना ही वे हम पर। जीवन की वास्तविक शक्ति प्रभुत्व में नहीं, परस्पर सहयोग में छिपी होती है। इस बात को गांठ बांध लें कि जिस समाज में पक्षियों का गीत कम होने लगे, नदियों का जल मटमैला हो जाए व जंगलों की नीरवता समाप्त होने लगे, वहां केवल पर्यावरण नहीं बदलता, मनुष्य का मन भी बदलने लगता है। बाहरी संसार की उजाड़ता धीरे-धीरे भीतर भी उतर आती है।