मनुष्य अपने को स्वतंत्र समझता है। उसे लगता है, वही सब कुछ तय करता है कि उसे क्या चाहिए, कहां जाना है और किस चीज के पीछे अपना जीवन लगाना है। लेकिन अगर हम अपनी इच्छाओं पर जरा गौर करें, तो एक विचित्र बात सामने आती है कि हमारी बहुत-सी इच्छाएं उतनी हमारी नहीं होतीं, जितना कि हम समझते हैं। हम किसी वस्तु को इसलिए नहीं चाहते कि वह मूल्यवान है।
कई बार हम उसे सिर्फ इसलिए मूल्यवान समझने लगते हैं, क्योंकि किसी दूसरे को उसके पीछे भागते देखते हैं। किसी दूसरे की उपलब्धि हमारे भीतर ऐसी इच्छा पैदा कर देती है, जिसका हमें कल तक पता भी नहीं था। यहीं से जीवन धीरे-धीरे प्रतिस्पर्धा बन जाता है और अपनी दिशा खोने लगता है। जिस व्यक्ति को हमने कभी अपना आदर्श माना था, वही धीरे-धीरे हमारा प्रतिद्वंद्वी बन जाता है। हम उसकी नकल करते हैं, उसकी उपलब्धि को अपनी उपलब्धि का पैमाना बना लेते हैं। लेकिन जैसे-जैसे हम उसके करीब पहुंचते हैं, हमारी इच्छा और तीव्र हो जाती है। तब हमें वस्तु से अधिक उस व्यक्ति पर विजय चाहिए होती है।
यह मनुष्य की इच्छा का विचित्र खेल है। हम सोचते हैं कि हमें बड़ा घर चाहिए, पर उससे भी अधिक हमें यह चाहिए कि दूसरे हमें सफल समझें। यही वह क्षण है, जब जीवन प्रतिस्पर्धा बन जाता है। प्रतिस्पर्धा का सबसे बड़ा खतरा यह नहीं कि कोई हमसे आगे निकल जाएगा।
बड़ा खतरा यह होता है कि तब हम यह भूल जाते हैं कि हमारी अपनी दिशा क्या थी। यदि सामने कोई दूसरा धावक न हो, तो शायद हमें पता ही न चले कि हमें कितनी तेज दौड़ना है। ऐसे में हम दौड़ तो रहे होते हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि जाना कहां है। इसलिए अपने जीवन में कभी-कभी दूसरों की आवाज से दूर होकर अपने भीतर लौटना बहुत जरूरी होता है। जीवन कोई ऐसी दौड़ नहीं, जिसमें सबको एक ही अंतिम रेखा पार करनी है।
किसी के लिए सफलता का मतलब धन-दौलत हासिल करना है, तो किसी के लिए स्वतंत्रता, किसी के लिए ज्ञान, तो किसी के लिए शांति। यदि हम अपनी सफलता की परिभाषा दूसरों से उधार लेते रहेंगे, तो संभव है कि हम ऐसी मंजिल तक पहुंच जाएं, जिसे हमने कभी सचमुच चाहा ही नहीं था। मनुष्य के लिए सबसे कठिन और सबसे सुंदर काम यही है कि दूसरों की इच्छाओं के शोर में अपनी इच्छा की धीमी आवाज सुन लेना।
तब जीवन प्रतियोगिता नहीं रह जाता। वह आत्म-पहचान की यात्रा बन जाता है। तब इस यात्रा में प्रश्न यह नहीं होता कि मैं दूसरों से कितना आगे हूं, तब प्रश्न यह होता है कि मैं अपने जीवन के कितना निकट हूं। यही वह प्रश्न है, जो हमें भीड़ से अलग और तुलना से मुक्त करता है और धीरे-धीरे हमारी अपनी राह की ओर ले जाता है।
सूत्र: अपनी राह पहचानें
जीवन की असली सफलता दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि अपनी राह पहचानने में है। हर व्यक्ति की मंजिल अलग होती है, इसलिए दूसरों की उपलब्धियों को अपनी इच्छाओं का पैमाना बनाना स्वयं से दूर जाना है। कभी ठहरकर अपने भीतर की आवाज सुनिए और पूछिए कि आप सच में क्या चाहते हैं।