जवाहरलाल नेहरू ने जेल से बेटी को इंदिरा को खत लिखे
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बेटी इंदिरा को खत
तुमने हिंदुस्तान और इंग्लैंड का कुछ हाल इतिहास में पढ़ा है। लेकिन इंग्लैंड केवल एक छोटा-सा टापू है और हिंदुस्तान, जो एक बहुत बड़ा देश है, फिर भी दुनिया का एक छोटा-सा हिस्सा है। अगर तुम्हें इस दुनिया का कुछ हाल जानने का शौक है तो तुम्हें सब देशों का और उन सब जातियों का जो इसमें बसी हुई हैं का ध्यान रखना पड़ेगा, केवल उस एक छोटे-से देश का नहीं जिसमें तुम पैदा हुई हो।
मुझे मालूम है कि इन छोटे-छोटे खतों में बहुत थोड़ी-सी बातें ही बता सकता हूं। लेकिन मुझे आशा है कि इन थोड़ी-सी बातों को भी तुम शौक से पढ़ोगी और समझोगी कि दुनिया एक है और दूसरे लोग जो इसमें आबाद हैं हमारे भाई-बहन हैं। जब तुम बड़ी हो जाओगी तो तुम दुनिया और उसके आदमियों का हाल मोटी-मोटी किताबों में पढ़ोगी। उसमें तुम्हें जितना आनंद मिलेगा उतना किसी कहानी या उपन्यास में भी न मिला होगा।
खत जो बताते हैं कि नेहरु क्या थे
इन खतों से पं.नेहरू की रचनाधर्मिता और कल्पनाशीलता की गहराई का अंदाजा लगता है। वो कितने सादगीपूर्ण और ऊंची सोच वाले व्यक्ति थे। 14 नवम्बर को उनका जन्मदिन है। आज के समय में किसी को बिना ठीक से जाने बकवास करने के बजाय नेहरू को समझना चाहिए। नेहरू का व्यक्तित्व अपने आप में किसी ग्रंथ से कम नहीं हैं। दरअसल, जिसने भी नेहरू को ठीक से समझ लिया उसके जीने के अंदाज बदल जाएगा।
इंदिरा को लिखे अपने खत के सहारे नेहरू ने एक प्रसंग में बताया है कि संसार के देशों का इतिहास पढ़ने लगोगी तो तुम्हें उन बड़े-बड़े कामों का हाल मालूम होगा जो चीन और मिस्रवालों ने किये थे। उस समय यूरोप के देशों में जंगली जातियां बसती थीं। तुम्हें हिंदुस्तान के उस शानदार जमाने का हाल भी मालूम होगा जब रामायण और महाभारत लिखे गए और हिंदुस्तान बलवान और धनवान देश था।
आज हमारा मुल्क बहुत गरीब है और एक विदेशी जाति हमारे ऊपर राज्य कर रही है। हम अपने ही मुल्क में आजाद नहीं हैं और जो कुछ करना चाहें नहीं कर सकते। लेकिन यह हाल हमेशा नहीं था और अगर हम पूरी कोशिश करें तो शायद हमारा देश फिर आजाद हो जाए, जिससे हम गरीबों की दशा सुधार सकें और हिंदुस्तान में रहना उतना ही आरामदेह हो जाए, जितना कि आज यूरोप के कुछ देशों में है।
देश के पहले प्रधानमंत्री को बच्चे चाचा नेहरू पुकारा करते थे।
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खतों में बातें बेटी इंदिरा से
आज के हालात में देश को नेहरू जैसे नेता की जरूरत है। अफसोस कि यह संभव नहीं है। तकलीफ तो तब होती है, जब नेहरू के पासंग में भी नहीं समाने वाले नेता उन पर कमेंट करते हैं। उन्हें समझना चाहिए कि नेहरू की दूरदृष्टि ही है जो आज देश इस मुकाम पर खड़ा है। वरना दशा कुछ और ही होती। आज के कुछ नेता नेहरू को अहंकारी और घमंडी तक बताते हैं। लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि नेहरू जैसा बनने में उन्हें कितनी मेहनत करनी होगी। नेहरू के सचिव रहे एमओ मथाई ने अपनी किताब 'रेमिनिसेंसेस ऑफ़ नेहरू एज' में लिखते हैं कि नेहरू इतने सुसंस्कृत थे कि अहंकारी हो ही नहीं सकते थे। लेकिन ये सही है कि उनमें धीरज नहीं था और वो बेवकूफ़ों को बर्दाश्त नहीं कर पाते थे।
नेहरू के किस्से
नेहरू के ग़ुस्से के बाबत पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने एक क़िस्सा सुनाया था कि एक बार नेहरू उनसे इस बात पर बहुत नाराज़ हो गए कि उन्होंने उनके नेपाल नरेश को लिखे गए पत्र को विदेश मंत्रालय के सेक्रेट्री जनरल को न दिखाकर अपनी अलमारी में रख लिया था। उस ज़माने में नटवर सिंह सेक्रेट्री जनरल के सहायक हुआ करते थे। वो याद करते हैं, "शाम साढ़े छह बजे नेहरू का नेपाल नरेश महेंद्र को लिखा पत्र मेरे पास आया। मैंने सोचा कि सुबह इसे पढ़ूंगा। सुबह मैं सेक्रेट्री जनरल को छोड़ने हवाई अड्डे चला गया जो सरकारी यात्रा पर मंगोलिया जा रहे थे। वहां उनका विमान लेट हो गया।"
नेहरू के राष्ट्रपिता गांधी से वैचारिक मतभेद रहे।
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राजेंद्र माथुर की किताब में जिक्र
अपने जमाने के शानदार संपादक रहे राजेन्द्र माथूर ने ”बगावती शिष्यतंत्र” शीर्षक से लिखा है कि नेहरू जैसा सिपाही यदि गांधी को आज़ादी के आंदोलन में नहीं मिलता तो 1927-28 के बाद भारत के नौजवानो को अपनी नाराज़ और बगावती अदा के बल पर गांधी के सत्याग्रही खेमे में खींच-खींच कर लाने वाला कौन था?
नेहरू ने उन सारे नौजवानो को अपने साथ लिया जो गांधी के तौर तरीको से नाराज़ थे। उन्होंने तीस की उस पीढ़ी को जबान दी जो बोल्शेविक क्रांति से प्रभावित होकर कांग्रेस के बेजुबान लोगो को लड़ाकू हथियार बनाना चाहती थी, लेकिन यह सारा काम उन्होंने कांग्रेस की केमिस्ट्री के दायरे में किया और उसका सम्मान करते हुए किया। यदि वे 1932 -33 में सनकी लोहियावादियो की तरह बर्ताव करते और अपनी अलग समाजवादी पार्टी बनाकर गांधी से नाता तोड़ लेते तो सुभाषचन्द्र बोस की तरह कट कर रह जाते। उससे समाजवाद का तो कोई भला होता नहीं। हां गांधी की फ़ौज़ जरूर कमजोर हो जाती।
गांधी से असहमत होते हुए भी नेहरू ने गांधी के सामने आत्मसमर्पण किया,
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गांधी से असहमति के बाद भी साथ
गांधी से असहमत होते हुए भी नेहरू ने गांधी के सामने आत्मसमर्पण किया, क्योंकि अपने को समझ न आने वाले जादू के सामने अपने बिछा देने वाला भारतीय भक्तिभाव नेहरू में शेष था। अपने अक्सर बिगड़ पड़ने वाले पट्ट शिष्य को लाड़ करना गांधी को आता था।
बहरहाल, उक्त सारे प्रसंग इसलिए यहां उद्धृत कर रहा हूं कि नेहरू के बारे में जानने की लोगों में जिज्ञासा बढ़े। मौजूदा राजनीतिज्ञों के बकवासबाजी से नेहरू के प्रति गलत धारणा न बना लें। नेहरू को समझें। जानें।
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