मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह लगता है कि उनकी आवाज़ में जो एक बेस क्वालिटी थी, वह मन्द्र सप्तक पर उनसे सोज़ भरे गीतों को गवाने की एक बड़ी कैफ़ियत के रूप में उभरी। उसका असर यह रहा कि उनके गाए फ़िल्म गीतों में भी एक अलग तरह की शान्ति और उदात्तता का मामला उभर आया, जिससे उन गीतों का मेयार भी कुछ अलग ढंग से कर्णप्रिय बन सका।
उदाहरण के तौर पर जयदेव के संगीत निर्देशन में जयशंकर प्रसाद की रचना ‘तुमुल कोलाहल कलह में मैं हृदय की बात रे मन’ और उन्हीं के द्वारा कम्पोज़ की गई अद्भुत ग़ज़ल ‘कभी शाख ओ सब्जा ओ बर्ग पर’ के अलावा गुलाम अली के साथ ‘सलोना सा सजन है और मैं हूं’ याद किए जा सकते हैं। कितनी प्रशान्त गायिकी और उसी क्षण उसमें से उठता हुआ पीड़ा का संयत भाव...
इसी के दूसरे छोर पर वसन्त प्रभु के संगीत निर्देशन में मराठी के ढेरों प्रभात गीतों को भी याद किया जा सकता है, जिसमें ‘उठि गोविन्दा उठि गोपाला’ को भला कौन भूल पायेगा?
आशा भोसले अपनी हरफनमौला गायिकी के लिए भी एक ऐसा माइलस्टोन बन चुकी हैं, जिनका कवर या काॅपी करना पूरी तरह से संगीत के व्याकरण में फिट नहीं बैठेगा। कारण यह कि उन्होंने अपने गायन को सिर्फ़ साधा या तराशा ही नहीं, बल्कि वैचारिक ढंग से आगे बढ़ाया। उस विचार को स्वायत्त किया, जहां एक ओर ओ.पी. नैय्यर का पंजाबी रिद्म पैटर्न पर ढला नाल और ढोलक वाला संगीत था, तो दूसरी ओर पंचम के साथ संगीत में गहराई का मामला, जिनकी स्वयं की नींव में उस्ताद अली अकबर ख़ां से सीखा हुआ सरोद और पण्डित सामता प्रसाद ‘गुदई महाराज’ की सोहबत शामिल थी। उन्होंने युवा दिनों में ब्रिजेन बिस्वास से तबले की बारिकियां भी सीखी थीं, जो बाद में आशा जी की संगति में भी उनके व्याकरण को मदद देने में काम आया। ताल और रिद्म को आत्मसात करने का एक प्रभावी अनुभवी।
आशा भोसले जैसे कलाकार शताब्दियों में एक बनते हैं, उनके गीतों की चर्चा तो हर समय कलाकारों के बीच, संगीत के शोधार्थियों और गायक गायिकाओं के मध्य, सोशल मीडिया के ढेरों प्लेटफार्मों पर होती ही रहेगी। प्ले लिस्ट ढूंढ़-ढूंढ़ कर सुनी ही जाएगी, मगर इस बात की तह तक कौन जाएगा कि ऐसी आवाज़ को सत्तर साल तक बरक़रार रखने की जद्दोजहद में आशा भोसले कितना तपी हैं? उन्होंने ऐसा क्या चख लिया था, जिस अमृत को हम सभी ख़ुद के लिए पाना चाहते हैं।
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