लॉरेंस ड्युरेल ने विभिन्न नामों तथा बिना नाम के भी खूब लेखन किया। एक दिन में वे दस पन्ने लिख सकते थे, इसीलिए कहानी उनसे नहीं सधती थी जबकि वे ओ. हेनरी की खूब प्रशंसा करते थे। उन्हें चालीस पन्ने लिखना सरल लगता था।
उनके लिए ‘टाइम्स’ का कॉलम लिखना भी मुश्किल काम होता था क्योंकि वे 1000 शब्द चाहते थे जो लॉरेंस के लिए कठिन काम था अत: वे पांच-आठ हजार शब्द लिखकर भेज देते और उन लोगों को मनमर्जी से उसकी काट-छांट करने की अनुमति भी दे देते। विदेश सेवा में सीनियर प्रेस ऑफ़ीसर थे, इस पद पर रहते हुए उन्होंने तमाम पत्राचार किए। यहां काम करते हुए उन्होंने संक्षिप्तता तथा डेडलाइन के दबाव पर काम करना सीखा।
वे सफलता-असफलता में भाग्य को एक प्रमुख तत्व को मानते थे। मजेदार बात यह है कि जिसके काम को इतने चाव से पढ़ा जाता है, वह खुद अपने काम को बिल्कुल पसंद नहीं करता है, दोबारा पढ़ना नहीं चाहता है। प्रूफ देखने के समय उसे मितली आती है और सिरदर्द के लिए वह दवा खाता है। एक बार लिखने के बाद वह उसे दोबारा देखना पसंद नहीं करता है।
वे अपने लेखन में बार-बार समान चरित्रों का प्रयोग करते हैं अत: उनके एक आलोचक के अनुसार, ड्युरेल अपने लेखन में कभी सही विभेद नहीं करते हैं, उनके लिखे में वास्तविक और काल्पनिक लोगों में कोई अंतर नहीं होता है। वैसे ड्युरेल का मानना है कि उसका लेखन आत्मकथात्मक नहीं है और न ही वे वास्तविक लोगों को अपने लेखन में लाते हैं।
लेखक के साथ चित्रकार भी
वे चित्रकार भी हैं मगर खुद को बहुत बुरा और भोथरा चित्रकार मानते हैं। आलोचकों की ओर ध्यान न देने वाले इस लेखक का मानना था यदि वे आलोचकों की बात पर कान धरने लगे तो उनका लिखना रुक जाएगा। वे मानते थे कि अच्छी-बुरी दोनों तरह की आलोचना लेखन में बाधा डालती है, कम-से-कम दो दिन काम रुक जाता है। और चूंकि वे आजीविका के लिए लिखने पर ही निर्भर थे, अत: इस तरह का खतरा मोल नहीं ले सकते थे।
वे जिसकी प्रशंसा करते थे उसकी नकल में उन्हें संकोच न था और खुद को चोर कहने से नहीं हिचकते थे। असल में प्रभाव को ही वे नकल मानते थे। जबकि वे जहां कुछ अच्छा देखते उसका अध्ययन करते और उसे पुनर्सृजित करने का प्रयास करते।
लॉरेंस ने अपनी शैली चेतन रूप से विकसित नहीं की बल्कि लेखन के साथ वह विकसित होती गई। वे कहते हैं लेखन खुद विकसित होता है और लेखन के साथ लेखक विकसित होता है।
वे लिखने के पहले बहुत कम कथानक बनाते हैं, उन्हें डर था कि यदि वे पहले से सब तय कर लेंगे तो यह लेखन यांत्रिक हो जाएगा। वे किताब को जीवंत रहने देना चाहते हैं और उसे स्वयं ही विकसित होने देते। एक तिहाई से अधिक प्लानिंग वे कभी नहीं करते। उन्हें पहले से मालूम नहीं होता है यह किस दिशा में जाएगा। नाटक के विषय में उनका मत था कि नाटककार को बेहतर नाटक लिख सकने के लिए अपना लिखा मंच पर प्रदर्शित होते अवश्य देखना चाहिए।
उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध कार्य ‘दि एलैक्जांड्रिया क्वार्टेट’ है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है यह चार किताबों (‘जस्टिन’, ‘बाल्थाज़ार’, ‘माउंटओलिव’ तथा ‘क्लेआ’) का समुच्चय है, जो 1957 से 1960 के बीच प्रकाशित हुआ। पहले तीन भाग द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले और उस काल में मिश्र के लोगों और घटनाओं का चित्रण है। चौथा भाग छ: साल बाद के काल पर आधारित है। स्वयं लेखक के अनुसार इनकी थीम पूर्व और पश्चिम की तत्वमीमांसा का मिलन है।
आलोचक इसकी शैली की शोभा, विविधता तथा चरित्रों की स्पष्टता, पर्सनल तथा पोलिटिकल के मध्य आवाजाही के लिए प्रशंसा करते हैं। द टाइम्स लिटरेरी सप्लिमेंट इसकी प्रशंसा में लिखता है, ‘अगर कभी किसी एक साहित्यिक कृति के प्रत्येक वाक्य में लेखक की तत्काल पहचान की मुद्रा है, तो वह यह है।’
यह चतुष्टय खूब चर्चित हुई और इसे इंग्लिश की 100 प्रमुख किताबों में स्थान मिलता है। लॉरेंस के अनुसार इन चारों को साथ-साथ पढ़ा जाना चाहिए। ‘दि एलैक्जांड्रिया क्वार्टेट’ के अलावा उन्होंने ‘पाइप्ड पाइपर ऑफ़ लवर्स’, ‘पैनिक स्प्रिंग’, ‘द ब्लैक बुक’, ‘द डार्क लैबिरिंथ’,‘व्हाइट इगल्स ओवर सर्बिया’, ‘जुडिथ’ जैसे उपन्यास, ‘ब्रोमो बमबास्टर्स’, ‘सैफो’, ‘एन आइरिश फ़ाउस्टस’ ‘एक्टे’ नाटक, तथा ‘स्टिफ़ अपर लिप’ जैसे हास्य लिखे। ढ़ेर सारा यात्रा विवरण और पत्र तो हैं ही। 1954 में उन्हें रॉयल सोसायटी ऑफ लिटरेचर का फेलो चुना गया। जब वे साइप्रस में रह रहे थे उन्होंने ‘बिटर लेमन्स’ लिखा, जिसे 1957 का डफ कूपर पुरस्कार मिला।